सत्तावन के बाद पहली चिनगारी-4

  • 2012-11-16 13:57:56.0
  • उगता भारत ब्यूरो
सत्तावन के बाद पहली चिनगारी-4

गतांक से आगे.....
तीन वर्ष पहले उस महान क्रातिकारी की आत्मा जेल के सींखचों से ऊब गयी थी। उसे शिवाजी का स्मरण हो आया, उसे भगवान कृष्ण का स्मरण हो आया। जिन्होंने जेल के बंधन को तोड़, अपने जीवन के मार्ग को प्रशस्त किया था। तब उसके हृदय ने उससे पूछा था, क्या मेरा जन्म जेल के इन सींखचों में सड़ सड़कर मरने के लिए हुआ है? और फिर एक रात उसने भी जन्माष्टमी मनाई। जेल के कड़े पहले की आंखों में धूल झोंककर ऊंची दीवार फांदकर मुक्ति का वह अग्रदूत बंधन को दूर छोड़कर भाग निकला।
भागता ही गया, बहुत भागा। लगभग 17 मील अपने बीमार हड्डियों के ढांचे के शरीर के साथ वह भागता ही रहा। पर फटे पुराने कपड़ों में उसका शक्तिहीन शरीर इतनी लंबी दौड़ के बाद लड़खड़ा गया। पुलिस पीछा कर ही रही थी। वह फिर पकड़ा गया और तब से जेल के अधिकारियों की आंखों का वह तिनका बन गया। घोर पाशविक अत्याचारों तथा रोज के पीडऩ से उसका शरीर जवाब दे गया और तभी आज जेल आंगन में रह गयी उसकी अकेली लाश!
वासुदेव के बारे में अमृत बाजार पत्रिका ने लिखा था-वासुदेव हिमालय जैसा एक महान व्यक्तित्व था। उसमें कुछ ऐसे गुण थे, जो महान कार्य करने वाले महापुरूर्षों में होते हैं एक डाकू के नाते उसे अपराधी कहा जाएगा, लेकिन फिर भी वह एक पवित्र आत्मा थी। उसका हृदय भारत के प्रेम से ओत-प्रोत था। कौन भारतीय उसके उपेक्षा करेगा? एक क्षण के लिए भूल जाओ कि फड़के एक डाकू था, तो तुम्हारी आंखों के सामने मनुष्यों के साधारण जमघट से बहुत ऊंचे हिमालय का सा महान व्यक्तित्व दिखाई देगा।
जस्टिस रानाडे ने भी लिखा-हमें डाकुओं के नेता वासुदेव बलवंत का बड़ा शोक है। एक देश भक्त के नाते हम उस चिर स्मरणीय नेता को अपनी श्रद्घा अर्पित करते हैं। क्योंकि अपने डाकुओं के से मार्ग पर चलते हुए भी उसने देश की बलिवेदी पर अपने जीवन के सर्वस्व का बलिदान किया।
वासुदेव भारत में जनतंत्र स्थापित करने की घोषणा करने वाला 1857 के बाद पहला देश भक्त था। 1857 के बाद वह पहला राजनीतिक बंदी तथा क्रांति मार्ग का उद्गाता था। अंग्रेजी साम्राज्य के क्रूर हाथों ने उससे सेनानी को अपने वतन से कोसों दूर घुट घुटकर प्राण त्यागने पर विवश किया। अपने ही देशवासियों ने उसे डाकू कहकर उसे गालियां देनी चाहीं, परंतु वासुदेव क्रांति के पराक्रमी सेनानी की तरह अपने जीवन के रक्त का अघ्र्य चढ़ा गये। उनके रक्त के छींटे जो अदन की धरती पर गिरे, बाद में भारत के स्वतंत्रता संग्राम की लंबी लड़ाई में ज्वालामुखी बनकर फूटे। उनके पदचिन्हों पर चलने वाले क्रांतिवीरों की गोलियों और बमों के धमाके से अंग्रेजी साम्राज्य की दीवारें, यहां तक कि लंदन का सिंहासन भी कंपायमान हो उठा। बाद के लंबे क्रांतिकारी संघर्ष के वे मार्गदर्शक बने।