स्वतंत्रता की 65वीं वर्षगांठ पर बाबा रामदेव ने जलाई क्रांति की मशाल

  • 2012-08-16 00:00:58.0
  • राकेश कुमार आर्य

राकेश कुमार आर्य
अमरीका के एक प्रसिद्घ नाटककार ने महात्मा बुद्घ पर एक नाटक का फिल्मांकन करना चाहा, जिसके लिए उसने अखबारों में विज्ञापन दिया कि सिद्घार्थ के चरित्र के फिल्मांकन के लिए उसे योग्य व्यक्ति की आवश्यकता है। नाटककार के पास बहुत से नाम आये, जिस व्यक्ति का नाम उस नाटक के लिए चयनित किया गया, उससे नाटककार ने उसकी योग्यता पूछी तो उसने जवाब दिया-कि मैं भूखा रह सकता हूं, मैं प्रतीक्षा कर सकता हूं, मैं चुप रह सकता हूं।भारतीय संस्कृति में व्यक्तित्व निर्माण के लिए प्रत्येक व्यक्ति के भीतर यदि ये तीनों गुण हैं तो वह निश्चय ही अपने लक्ष्य में सफल हो सकता है। भूखा रहने, प्रतीक्षा करने और चुप रहने का अर्थ है-जीवन में तप को धारण करना, समय से पहले न कुछ बोलना न कुछ कहना। आवश्यकता से अधिक भी न बोलना और न कुछ कहना। आज के बाबा रामदेव पर यदि इन तीनों बातों को लागू करके देखा जाए तो बाबा की इस सफलता के पीछे और उन्होंने जिस बुलंदी को प्राप्त किया है उसकी कहानी के पीछे ये तीनों बातें ही खड़ी दिखाई देती हैं। बाबा रामदेव भूखे रहे, उन्होंने अनशन किया-इस तथ्य को आज सारी दुनिया जानती है। बाबा रामदेव लगभग एक साल पहले दिल्ली से अपमानित होकर भागे थे, अपने अपमान के उस घूंट को पीकर उन्होंने अपने आपको साबित करने के लिए एक वर्ष से अधिक समय तक प्रतीक्षा की। इस प्रतीक्षा का उन्होंने किस प्रकार सदुपयोग किया, यह तथ्य भी अब लोगों की समझ में आ गया है। साथ ही बाबा रामदेव ने अपनी रणनीति की अंतिम क्षणों तक गोपनीयता बनाये रखकर भी यह सिद्घ कर दिया कि वह चुप भी किस सीमा तक रह सकते हैं?

बाबा रामदेव के सामने अन्ना टीम की फजीहत एक नसीहत के रूप में सामने खड़ी थी। सरकार के रणनीतिकार दिग्गी जैसे लोगों को अहंकार था कि जो हश्र अन्ना हजारे का किया गया है वही हश्र बाबा रामदेव का किया जाएगा। बहुत छोटे स्तर की टिप्पणियां सलमान खुर्शीद जैसे लोगों की ओर से आईं-उन्होंने कहा कि रामलीला मैदान में हर वर्ष रामलीला होती है। एक ये रामलीला भी हो रही है। जो कि होगी और खतम हो जाएगी। ये टिप्पणी बड़े लोगों की छोटी सोच को झलका रही थी। बाबा ने धैर्य रखा और उन्हें जवाब दिया कि इस बार रामलीला नहीं बल्कि रामदेव लीला हो रही है। बाबा ने अंतिम क्षणों में अपने आंदोलन को जिन ऊंचाईयों तक पहुंचाया पूरा राष्ट्र उसी ऊंचाई की कामना कर रहा था। ईश्वर ने शासक वर्ग की तानाशाही के खिलाफ जनता के भीतर मच रही क्रांति को भारत की परंपरागत अहिंसा पूर्ण शैली से बाबा के माध्यम से प्रकट कराया। सारा संसार आश्चर्य चकित रह गया, बाबा रामदेव ने भारत की स्वतंत्रता की 65वीं वर्षगांठ के अवसर पर नई क्रांति की मशाल जला दी। बाबा ने नारा दिया कांग्रेस हटाओ-देश बचाओ।  यह कितना दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य है कि जो कांग्रेस देश को आजाद कराने का सेहरा अपने ऊपर बांधती थी और 1984 में कांग्रेस लाओ-देश बचाओ के नारे के माध्यम से जिसने लोकसभा में प्रचण्ड बहुमत प्राप्त किया था, यदि आज उसी कांग्रेस के बारे में जनमानस की नब्ज पर हाथ रखकर देखा जाए तो देश की तमाम जनता ने बाबा के नारे पर मुहर लगा दी है।लगता है कि कॉंग्रेस के रहने से देश को खतरा है । 1942 में कांग्रेस ने भारत छोड़ो आंदोलन का शुभारंभ 9 अगस्त से किया था, जिसे इतिहास में अगस्त क्रांति के नाम से जाना जाता है, बाबा ने भी उसी दिन महात्मा गांधी की समाधि राजघाट पर जाकर बापू को नमस्कार कर अपनी अगस्त क्रांति का सूत्रपात किया। बापू की क्रांति कितनी सफल रही कितनी असफल रही यह सब तो अब इतिहास की बात बन चुकी है, उस पर यहां टिप्पणी करना अप्रासंगिक होगा, लेकिन बाबा की क्रांति एक सच्चाई के रूप में हमारे सामने खड़ी है। बाबा ने अपनी सदाशयता दिखाते हुए सभी राजनीतिक दलों, समाजसेवी संगठनों और अन्य समाज सेवी लोगों से अपील की कि हमारा कोई राजनीतिक एजेण्डा नही है, कोई राजनीतिक महत्वाकांक्षा नही, हम जो कर रहे हैं राष्ट्र के लिए कर रहे हैं। बाबा ने कहा इस राष्ट्र के लिए किये जा रहे इस यज्ञ में जो लोग भी आकर अपनी आहुति डालना चाहें उनका स्वागत है। बाबा की अपील पर भाजपा प्रणीत, राजग और मुलायम सिंह यादव की सपा व मायावती की बसपा सहित कितने ही राजनीतिक दलों, समाजसेवी संगठनों और व्यक्तियों ने आनन-फानन में निर्णय लिया और चल दिये बाबा के आह्वान पर राष्ट्र यज्ञ में अपनी आहुति देने के लिए। यह अपील बाबा के मनोबल और आत्मबल को दर्शा रही थी। जिसे देखकर शासक वर्ग को पसीना आ गया है।
महर्षि दयानंद को उनके गुरू ब्रजानंद ने आदेश दिया कि जाओ और देश में वेदों की सत्य विद्या के प्रचार प्रसार के लिए काम करो। महर्षि दयानंद ने जनता के बीच जाकर वेदों की सत्य विद्या के प्रचार प्रसार के लिए काम करना शुरू किया और मूर्ति पूजा को जब वेद विरूद्घ सिद्घ करना प्रारंभ किया तो जनता ने अपने मठाधीशों के कहने पर उन पर ईंट, पत्थर बरसाने शुरू कर दिये। निराश महर्षि दयानंद अपने गुरू के पास वापिस लौट गये। उन्होंने कहा कि जनता कुछ भी सुनने को तैयार नही है, ऐसे में वेदों के ज्ञान का प्रचार प्रसार कैसे संभव होगा? तब उनके गुरू ब्रजानंद ने उन्हें आदेश दिया कि पहले वाणी का संयम करो तब जनता के बीच जाकर काम करना। महर्षि दयानंद ने अगले तीन वर्ष वाणी का तप किया और फिर मैदान में उतरे तो वही हताश और निराश महर्षि दयानंद देश में आजादी की क्रांति का सूत्रपात करने में सफल हो गये। उन्होंने देश में राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक, आदि सभी क्षेत्रों में क्रांति मचाई।
बाबा रामदेव एक साल पहले जब रामलीला मैदान में आये थे तो उस समय उनका वाणी संयम इतना प्रबल नही था जितना इस बार था। तब वह राजनीतिज्ञों को बेईमान जैसे छोटे शब्द आराम से प्रयोग करते थे लेकिन इस बार उन्होंने वाणी का संयम किया और सोनिया गांधी को पूज्या माता सोनिया गांधी, राहुल गांधी को राहुल भैया, प्रधानमंत्री को माननीय प्रधानमंत्री जैसे शब्दों से संबोधित कर अपने वाणी संयम का प्रदर्शन किया। परिणाम वही आया जो महर्षि दयानंद के लिए आया था।
बाबा रामदेव इस तथ्य को भली प्रकार समझते हैं कि इस देश में पूजा उसकी हुई है जिसने सत्ता को दूर से नमस्कार किया, यानि आती हुई सत्ता को दुत्कार दिया। चाहे वह भीष्म पितामह रहे, चाहे चाणक्य रहे, चाहे महात्मा गांधी रहे, चाहे जयप्रकाश नारायण रहे और चाहे ऐसी अन्य कितनी ही विभूतियां रहीं। बाबा उस मिट्टी से बने हैं जो परिवर्तन करके बिवर्तन के चक्कर में पडऩा नही चाहते। आज देश में राजनीति जिस गंदगी में फंसी पड़ी है बाबा उस गंदगी को साफ करने के लिए कमर कस रहे हैं। इसके लिए निश्चित रूप से कांग्रेस सबसे ज्यादा जिम्मेदार है, उस कांग्रेस के खिलाफ यदि कुछ राजनीतिक लोग बाबा का साथ दे रहे हैं तो इसमें गलत क्या है? बाबा को व्यवस्था परिवर्तन करनी है तो व्यवस्था के उन लोगों का साथ लेना ही पड़ेगा जो व्यवस्था को दुर्गंधपूर्ण मान रहे हैं और बाबा की क्रांति में साथ देना चाहते हैं।
कांग्रेस के रणनीतिकार अब महलों में छिप रहे हैं। उन्होंने जो बड़बोली बातें की थीं अब उन बातों को लेकर वह खुद पशोपेश में हैं। बाबा का सत्याग्रह कांग्रेस के लिए एक शस्त्राग्रह बन गया है, बाबा की अहिंसा आज भी सर्वोपरि है लेकिन उन्होंने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि वह वीर सावरकर की भांति कर्मशील क्रांति में विश्वास रखते हैं और बुद्घ नही युद्घ की नीति पर चलना चाहते हैं। कांग्रेस के पास बाबा की नीतियों का अब कोई जवाब नही है यदि वह जवाब देने की कोशिश भी करेगी तो जनता उससे हिसाब लेने के लिए तैयार हो चुकी है। जनता के बिगड़े हुए मूड़ को कांग्रेस पहचान चुकी है, इसलिए उसकी कंपकंपी बंध रही है, लेकिन इसके बावजूद कांग्रेस सच से भागते हुए चोरों का पक्षपोषण कर रही है। कांग्रेस को अब समझ लेना चाहिए कि आजादी की 65वीं वर्षगांठ उसके लिए खतरे का बिगुल बन चुकी है, उसके बिनाश की नींव रखी जा चुकी है। लालकृष्ण आडवाणी ने जो उसके बारे में कहा है कि कांग्रेस अगले चुनावों में दो अंकों की सीटों का आंकड़ा प्राप्त कर पाएगी वह बात सच साबित होती जा रही है। वास्तव में कांग्रेस अब अपने पापों के प्रायश्चित के लिए तैयार रहे, 65 वर्ष में जो कुछ उसने किया है उसका हिसाब किताब तो उसे देना ही पड़ेगा।