एनएसजी से आगे की राह

  • 2016-06-30 06:30:11.0
  • डा. भरत झुनझुनवाला

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ऊर्जा के विभिन्न स्रोतों में हमारे लिए सौर ऊर्जा श्रेष्ठतम है। सरकार इसके विस्तार के प्रयास कर रही है, जो कि सही दिशा में है। दूसरे स्तर का स्रोत नाभिकीय संयंत्र है। सरकार द्वारा परमाणु आपूर्तिकर्ता देशों के समूह की सदस्यता हासिल करने के प्रयास इस दिशा में है। यह भी ठीक ही है, लेकिन इन पावर प्लांट्स को रिहायशी क्षेत्रों से दूर स्थापित करना चाहिए। इससे जनविरोध कम होगा। बीमा किस्त भी कम देनी पड़ेगी। पानी की ढुलाई का अतिरिक्त खर्च पड़ेगा, जिसे वहन करना चाहिए।

सरकार द्वारा परमाणु आपूर्तिकर्ता देशों के समूह की सदस्यता हासिल करने के पुरजोर प्रयास किए जा रहे हैं। इस सदस्यता के हासिल होने के बाद दूसरे देशों से हमें यूरेनियम मिल सकेगा, जो कि परमाणु ऊर्जा का मुख्य ईंधन है। अपने देश में यूरेनियम कम ही उपलब्ध है। इस लिहाज से परमाणु ऊर्जा के उत्पादन को इस समूह की सदस्यता अति आवश्यक है।

ऊर्जा के चार प्रमुख स्रोत हैं-सौर, न्यूक्लियर, थर्मल एवं हाइड्रो। इन चार में सोलर हमारे लिए श्रेष्ठ है। राजस्थान के मरुस्थल तथा डेक्कन के पठार में बड़ी मात्रा में बंजर भूमि उपलब्ध है, जहां इन पावर प्लांट्स को लगाया जा सकता है। सोलर पावर में समस्या है कि इसका उत्पादन दिन के समय ही किया जा सकता है, लेकिन ऊर्जा के सभी स्रोतों में यह सबसे सस्ता है। वर्तमान में थर्मल तथा हाइड्रो बिजली की उत्पादन लागत छह से सात रुपए प्रति यूनिट पड़ रही है। पर्यावरण की हानि के मूल्य को जोड़ लिया जाए, तो इस बिजली की उत्पादन लागत 10-15 रुपए प्रति यूनिट पड़ती है। तुलना में सोलर बिजली का मूल्य आज चार से पांच रुपए पड़ रहा है। पर्यावरण की क्षति भी नहीं होती है। अत: हमारे लिए सोलर ऊर्जा को बढ़ावा देना श्रेष्ठ है।

सोलर बिजली का दिन के समय भंडारण करके रात के समय प्रयोग किया जा सकता है, जैसे इनवर्टर में सरकारी बिजली का भंडारण करके बाद में उपयोग किया जाता है। भंडारण की इस प्रक्रिया में बिजली का दाम बढ़ेगा, परंतु थर्मल तथा हाइड्रो से फिर भी यह बिजली सस्ती पड़ेगी। साथ-साथ उपभोक्ता को दिन में बिजली की खपत अधिक और रात में खपत कम करने के इंसेंटिव दिए जा सकते हैं। कई देशों में समय के अनुसार बिजली के दाम में परिवर्तन किया जाता है, जैसे सुबह और शाम बिजली की मांग अधिक होती है। इस समय दाम बढ़ा दिए जाते हैं। शेष समय में दाम घटा दिए जाते हैं।

बिजली के ऐसे मीटर उपलब्ध हैं, जो कि अलग-अलग समय में हुई खपत की गणना कर सकते हैं। दिन के समय बिजली का दाम कम करने से लोग गीजर तथा वाशिंग मशीन का उपयोग दिन में करेंगे। उद्यमी फैक्टरी को दिन में चलाएंगे। इस प्रकार दिन में बिजली की मांग बढ़ेगी, जिसकी पूर्ति सोलर पावर से की जा सकती है। सरकार द्वारा सोलर पावर का उत्पादन बढ़ाने के पुरजोर प्रयास किए जा रहे हैं। इन प्रयासों का स्वागत है। दूसरे स्तर की बिजली न्यूक्लियर पावर है। यह बिजली महंगी पड़ती है। वैश्विक स्तर पर आज कम ही नए नाभिकीय संयंत्र लगाए जा रहे हैं। इन संयंत्रों में चर्नोबिल तथा फूकूशिमा जैसी दुर्घटनाएं होने की संभावना बनी रहती है। इसलिए उत्पादन कंपनियां बीमा को भारी प्रीमियम अदा करती हैं, जिसके कारण यह बिजली महंगी हो जाती है। इसके महंगा होने का एक प्रमुख कारण पानी की आवश्यकता है। पानी की आपूर्ति के लिए इन्हें पानी के स्रोतों के पास लगाया जाता है, जैसे नरोरा तथा कुडनकुलम में नाभिकीय संयंत्र लगाए गए हैं। पानी के इन्हीं स्रोतों के पास लोगों की रिहायश होती है। फलस्वरूप इन स्थानों पर नाभिकीय संयंत्र लगाने का भारी जन विरोध होता है, जैसा कि कुडनकुलम में देखा गया था। इन संयंत्रों को रिहायशी क्षेत्रों से दूर जैसे पोखरण के रेगिस्तान में लगाया जा सकता है। तब इनको चलाने के लिए पानी को दूर से लाना होगा, जिसके कारण नाभिकीय बिजली और महंगी हो जाएगी।

नाभिकीय बिजली में हमारी आयातों पर निर्भरता बनी रहती है। परमाणु आपूर्तिकर्ता देशों के समूह की सदस्यता हासिल करने के बाद भी यह परनिर्भरता बनी रहती है। इस समस्या के दो हल हो सकते हैं। एक हल है कि पूर्व में नाभिकीय ऊर्जा पैदा करने से निकले कचरे का पुन:उपयोग किया जाए। हमने पूर्व में यूरेनियम को हासिल करने के लिए अनुबंध कर रखा है कि कचरे का हम पुन:उपयोग नहीं करेंगे। इस अनुबंध में संशोधन का प्रयास किया जा सकता है। दूसरा हल है कि थोरियम सें नाभिकीय बिजली बनाने पर अनुसंधान को गति दी जाए। अपने देश में थोरियम के प्रचुर भंडार उपलब्ध हैं, परंतु इस कच्चे माल से बिजली बनाने की तकनीक अभी विकसित नहीं है। इस तकनीक का विकास कर लें, तो नाभिकीय ऊर्जा पैदा करने में हमारी आयातों पर निर्भरता समाप्त हो जाएगी। चीन में थोरियम से बिजली बनाने का संयंत्र शीघ्र शुरू होने वाला है। तब परमाणु आपूर्तिकर्ता देशों के समूह की सदस्यता हासिल करने की जरूरत ही नहीं रह जाएगी।

तीसरी श्रेणी का एवं निकृष्टतम बिजली का स्रोत थर्मल तथा हाइड्रो पावर है। थर्मल पावर अति प्रदूषणकारी है। कोयले को जलाने से भारी मात्रा में कार्बन उत्सर्जन होता है, जो संपूर्ण विश्व के पर्यावरण का तापमान बढ़ा रहा है। दूसरी समस्या कोयले की उपलब्धि की है। अपने देश में लगभग 150 वर्षों के लिए कोयला उपलब्ध है। हाइड्रोपावर पर्यावरण के लिए और ज्यादा हानिकारक है।

भाखड़ा और टिहरी जैसी हाइड्रोपावर की झीलों से मीथेन गैस का उत्सर्जन होता है, जो कि थर्मल प्लांट से निकली कार्बन डाइआक्साइड से कई गुना ज्यादा जहरीली होती है। हाइड्रोपावर से नदी का बहाव अवरुद्ध हो जाता है। इससे नदी के पानी की गुणवत्ता का हृस होता है। मछलियां अपने प्रजनन स्थानों तक नहीं पहुंच पाती हैं तथा नदी की जैव विविधिता प्रभावित होती है।

ऊर्जा के विभिन्न स्रोतों में हमारे लिए सौर ऊर्जा श्रेष्ठतम है। सरकार इसके विस्तार के प्रयास कर रही है, जो कि सही दिशा में है। दूसरे स्तर का स्रोत नाभिकीय संयंत्र है। सरकार द्वारा परमाणु आपूर्तिकर्ता देशों के समूह की सदस्यता हासिल करने के प्रयास इस दिशा में है। यह भी ठीक ही है, लेकिन इन पावर प्लांट्स को रिहायशी क्षेत्रों से दूर स्थापित करना चाहिए। इससे जनविरोध कम होगा। बीमा किस्त भी कम देनी पड़ेगी। पानी की ढुलाई का अतिरिक्त खर्च पड़ेगा, जिसे वहन करना चाहिए। सरकार द्वारा कोयला व पानी से पैदा होने वाली ऊर्जा को भी जोर-शोर से बढ़ाया जा रहा है। इस नीति पर पुनर्विचार करना चाहिए। इन स्रोतों की बिजली सुलभ है, चूंकि कोयला तथा नदी देश में उपलब्ध हैं, परंतु इनसे होने वाली पर्यावरण की क्षति को जोड़ लिया जाए, तो यह बिजली बहुत महंगी है। पर्यावरण की अनदेखी करना वास्तव में आम आदमी पर कुठाराघात करना है। वही पर्यावरण की मार को झेलता है। अत: ऊर्जा के इन स्रोतों से पीछे हटना चाहिए। सारांश है कि सौर तथा नभिकीय ऊर्जा के उत्पादन को सरकार के प्रयास दिशा में है, लेकिन थर्मल और हाइड्रो से पीछे हटना चाहिए।
- डा. भरत झुनझुनवाला