स्वास्थ्य शिक्षा और वैकल्पिक चिकित्सा

  • 2016-02-19 09:30:19.0
  • उगता भारत ब्यूरो

ऋतु सारस्वत

संविधान का अनुच्छेद इक्कीस जीने का अधिकार ही नहीं देता, बल्कि सम्मान से पूर्ण स्वस्थता के साथ जीने का अधिकार देता है। पर हमारा यह अधिकार कितना सुरक्षित है? विश्व जनसंख्या में साढ़े सोलह प्रतिशत की भागीदारी निभाने वाले भारत की विश्व की बीमारियों में हिस्सेदारी बीस प्रतिशत है। भारत में सार्वजनिक स्वास्थ्य-व्यवस्था और स्वास्थ्य शिक्षा की आवश्यकता और प्रचलन की पहचान प्राचीन है। भारत में औपचारिक तौर पर स्वास्थ्य शिक्षा की शुरुआत को 1929 में देखा जा सकता है, जब मैसूर राज्य (अब कर्नाटक) में जनसाधारण को बेहतर स्वास्थ्य के महत्त्व के बारे में जानकारी देने के लिए राज्य के स्वास्थ्य सेवा निदेशालय में प्रचार इकाई स्थापित की गई थी। 1940 तक देश के लगभग सभी राज्यों में प्रचार इकाइयों को स्वास्थ्य सेवा निदेशालय के अंग के रूप में स्थापित किया जा चुका था। 1944 में सर जोसेफ मोरे की अध्यक्षता में स्वास्थ्य सर्वेक्षण समिति ने केंद्र और राज्य स्तरों पर स्वास्थ्य शिक्षा को एकीकृत करने की सिफारिश की। सर मोरे की एक महत्त्वपूर्ण अनुशंसा यह भी थी कि ‘जनस्वास्थ्य शासन की जिम्मेदारी है।’ प्रथम पंचवर्षीय योजना के दौरान योजना आयोग ने देश में गहन स्वास्थ्य शिक्षा संबंधी गतिविधियों की आवश्यकता को बार-बार दोहराया।

आयोग ने केंद्र और राज्य स्तरों पर कर्मचारियों की पर्याप्त संख्या और उपकरणों से सुसज्जित स्वास्थ्य शिक्षा ब्यूरो स्थापित करने की सिफारिश की। प्रारंभिक तौर पर केंद्रीय स्वास्थ्य शिक्षा ब्यूरो ने अपनी गतिविधियों और कार्यों के बारे में राज्य स्वास्थ्य शिक्षा ब्यूरो को दिशा-निर्देश दिए और साथ ही सभी राज्यों में स्वास्थ्य शिक्षा सेवाओं को सशक्त करने के लिए पूंजी भी प्रदान की और बाद में एसएचईबी स्वास्थ्य सेवा निदेशालय का अंग बन गया। सन 1958 में विद्यालय स्वास्थ्य शिक्षा प्रभाग की स्थापना युवा पीढ़ी के लिए स्वास्थ्य शिक्षा कार्यक्रमों को सशक्त करने की दृष्टि से की गई। विद्यालय के पाठ्यक्रम में स्वास्थ्य शिक्षा के घटक को सशक्त करने के लिए, विद्यालय स्वास्थ्य शिक्षा प्रभाग ने केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड की कक्षा नौंवी व दसवीं के लिए शारीरिक शिक्षा और स्वास्थ्य शिक्षा पाठ्यविवरण विकसित किया।health ‘चिकित्सा एक विज्ञान है और चिकित्सा-शिक्षा की मजबूत नींव पर ही सफल चिकित्सा की जा सकती है’ इस तथ्य को स्वीकारते हुए 1983 में राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति में भारतीय स्वास्थ्य क्षेत्र के संबंध में निर्धारक तत्त्वों में उल्लेखनीय परिवर्तन हुआ। 1983 की राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति में वर्णित कुछ नीतिगत पहलुओं के संतोषजनक परिणाम निकले।

इस नीति के अंतर्गत महत्त्वपूर्ण पहल के विषय थे वृहत प्राथमिक स्वास्थ्य देखरेख सेवा के केंद्र दूर-दूर तक स्थापित करने के चरणबद्ध चक्र तथा समयबद्ध कार्यक्रम जो प्रसार और स्वास्थ्य शिक्षा से जुड़ा हो, जिन्हें इस जमीनी हकीकत के संदर्भ में तैयार किया जाए कि प्रारंभिक स्वास्थ्य समस्याएं स्वयं लोगों द्वारा हल की जा सकें। यों तो भारत में निशुल्क इलाज के दावे किए जाते हैं, पर जमीनी हकीकत इससे इतर है। तो कैसे उन आधारभूत ढांचों का निर्माण किया जाए जिससे देश के स्वास्थ्य-मानचित्र में परिवर्तन आए। जब हम अस्वस्थ भारत की बात करते हैं तो यकीनन हमारी संपूर्ण दृष्टि पश्चिमी चिकित्सा पद्धति पर टिकी होती है। पर अब इससे इतर हमें उस ओर दृष्टि करनी होगी जो भारतीय संस्कृति की जड़ों से जुड़ी हुई है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि देश की मूल चिकित्सा पद्धति अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही है। जब भी चिकित्सा सुधार की कोई योजना बनती है, उसमें आधुनिक चिकित्सा सुधार के लिए भारी-भरकम बजट का प्रावधान होता है, पर भारत की अपनी पद्धति आयुर्वेद के शिक्षण-स्तर में सुधार के लिए शायद ही कोई ठोस उपाय किया जाता हैै। इस सच को क्या नकारना संभव है कि आयुष पद्धति के अधिकांश चिकित्सक अब भी ग्रामीण और छोटे शहरी जगहों में कार्य करके लोगों की सेवा कर रहे हैं। नई और वैज्ञानिक उपचार विधियों के इस युग में पारंपरिक और वैकल्पिक चिकित्सा पद्धति के विकास, स्तरोन्नयन और अनुसंधान के जरिए ही भारतीयों की अस्वस्थता को दूर करने की पहल की जानी चाहिए। क्योंकि आज इस तथ्य को स्वीकार किया जा रहा है कि स्वास्थ्य का अर्थ ‘मात्र रोग से मुक्ति’ नहीं बल्कि इसमें अधिक महत्त्त्वपूर्ण अन्य पहलू भी शामिल हैं। वैकल्पिक चिकित्सा पद्धतियों में रोगविशेष के इलाज के बजाय प्रकृति का ही एक अंग समझ कर मरीज का उपचार किया जाता है। मूलत: आधुनिक चिकित्सा पद्धति इलाज के साथ-साथ खान-पान संबंधी परहेजों की चर्चा करती नहीं दिखती, जो कि स्वस्थ होने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कारक है। दरअसल हम सहज उपलब्ध तरीके, जो पश्चिमी संस्कृति की देन हैं, उन्हें ही प्रमुखता देते हैं। पर वे देश जो एलोपैथी के पुराने पैरोकार हैं वे भी विविध प्रकार के प्राकृतिक इलाज की ओर रुख कर रहे हैं, जबकि हमारी पुरातन चिकित्सा पद्धति के प्रति उदासीनता बनी हुई है।

हैरानी वाली बात तो यह है कि भारतीय वैकल्पिक चिकित्सा बोर्ड द्वारा चलित अंतरराष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय सबसे बड़ी अंतरराष्ट्रीय अकादमी है जो कि भारत व विदेशों में प्राकृतिक तथा पूरक चिकित्सा और स्वास्थ्य संवर्धन के क्षेत्र में अग्रणी संस्था है। अमेरिका के नेशनल सेंटर फॉर कॉम्प्लीमेंटरी ऐंड ऑल्टरनेटिव मेडीसिन ऐसे उदाहरणों का उल्लेख करता है जिसमें अन्य पद्धतियों के अतिरिक्त प्राकृतिक चिकित्सा, पाद-चिकित्सा, जड़ी-बूटी, आयुर्वेद, ध्यान, योग, पोषण-आधारित उपचार पद्धतियां शामिल हैं। बीते दशक में एक वैश्विक लहर का आगाज हुआ है जिसका लक्ष्य आम आदमी को बेहतर जीवन देना, चिकित्सक और मरीजों के बीच बेहतर रिश्ते की बुनियाद रखना और कम खर्च में अच्छा इलाज मुहैया कराना है, जो मौजूदा चिकित्सा पद्धति नहीं दे रही है। विविध प्रकार के प्राकृतिक इलाज की ओर रुख कर रहे इस नए प्रारूप को इंटिग्रेटेड मेडिसिन या समन्वयकारी चिकित्सा कहा जा रहा है। चिकित्सा की विभिन्न पद्धतियों को एक साथ मिलाने के विचार को पश्चिमी चिकित्सा की मुख्यधारा के चिकित्सकों ने फर्जी विज्ञान कह कर खारिज कर दिया। चिकित्सा प्रतिष्ठानों ने ऐसे किसी विचार को मानने से इनकार कर दिया जो प्रयोगशाला में डबल ब्लाइंड और रैंडम क्लीनिकल ट्रायल पर खरा न उतरे।

इन सारी अड़चनों के बावजूद विश्व का एक बड़ा तबका वैकल्पिक चिकित्सा की ओर न केवल बढ़ रहा है बल्कि उसके विस्तार के लिए एक नवीन धरातल भी तैयार कर रहा है। ब्रिटेन के प्रिंस चाल्र्स ने नवंबर 2013 में बंगलुरुके शौक्य इंटरनेशनल होलिस्टिक हीलिंग सेंटर फाउंडेशन की साझेदारी में एक महत्त्वाकांक्षी परियोजना शुरू की, जो ब्रिटेन के उनके चैरिटी कॉलेज ऑफ मेडिसिन का एक प्रयास है। इसका उद्देश्य एक ऐसा नेटवर्क तैयार करना है जो पूरब और पश्चिम के ‘वेलनेस’ गुरुओं को एकजुट कर आधुनिक अनुसंधान और प्राचीन ज्ञान के इलाज से रोगों की रोकथाम पर ध्यान दे। ऐसे देश जहां लंबे समय से पश्चिमी चिकित्सा को ही सबसे अच्छा माना जा रहा है आज वहां भी वैकल्पिक परंपराओं को अपनाया जा रहा है।