स्वच्छता के लिए समाज और कानून की मान्यताएं

  • 2015-11-26 06:03:08.0
  • उगता भारत ब्यूरो
स्वच्छता के लिए समाज और कानून की मान्यताएं

सुभाष गताडे

वर्ष 1927 में डॉ भीमराव आंबेडकर की अगुआई में हुए ऐतिहासिक महाड सत्याग्रह में वहां के सार्वजनिक तालाब पर जाकर दलितों और अन्य जनवादी लोगों ने मिल कर पानी पिया था, जिसके लिए उन्हें जातिवादी सोच के कर्णधारों ने मनाही की थी। सत्याग्रह के वक्त डॉ आंबेडकर ने जो घोषणापत्र जारी किया उसका एक महत्त्वपूर्ण मुद्दा यह था कि ‘गंदे पेशों में लिप्त रहने के बहाने अगर दलित प्रताडि़त होते हैं तो वे उन पेशों को छोड़ दें।’ इसका व्यापक असर भी हुआ था।

पिछले दिनों मानवीय गरिमा के प्रतिकूल पेशों को छोडऩे की आंबेडकर की अपील का प्रसंग एक अलग वजह से चर्चा में आया, जब महाराष्ट्र सरकार ने कुछ साल पहले समाप्त किए एक कानून (‘वारसा कानून’) को बहाल करने का निर्णय लिया। इस निर्णय के साथ सफाई कामगार- फिर भले वे सरकारी सेवा में लगे हों या अद्र्धसरकारी निकायों या नागरिक निकायों में कार्यरत हों- सेवानिवृत्ति की स्थिति में या स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेते हुए अपने ही काम के लिए किसी रिश्तेदार को नामित कर सकते हैं। ध्यान रहे कि सत्तर के दशक में तत्कालीन सरकार ने लाड-पागे कमेटी की सिफारिशों को अपने यहां लागू किया था, जिसे बाद में समाज के जागरूक तबकों के दबाव में खत्म किया गया।

यह विडंबना ही है कि राज्य के सामाजिक न्याय एवं विशेष सहायता मंत्रालय द्वारा इस प्रणाली को बहाल करने का जो आदेश (जीआर, अर्थात गवर्नमेंट रिजोल्यूशन) जारी किया गया है, उसे लेकर एक व्यापक चुप्पी दिखाई दे रही है। इस आदेश में कहा गया है कि इसके जरिए वाल्मीकि और अन्य अनुसूचित तबकों को- जो पारंपरिक तौर पर स्वच्छता के काम में लगे हैं- ‘आर्थिक तौर पर सशक्तीकृत’ किया जाएगा।

जाहिरा तौर पर इस बात को मद्देनजर रखते हुए कि भारत में सफाई के काम में दलित जातियों का (खासकर वाल्मीकि समुदाय के लोगों का) ही बहुलांश लगा हुआ है, पुनर्बहाल ‘वारसा’ कानून सफाई के काम को उन्हीं के लिए ‘आरक्षित करेगा’। पिता स्वच्छता कामगार, मां सफाई कर्मचारी और फिर आने वाली पीढिय़ों को भी उसी काम में लगा देने की ‘गारंटी’ यह कानून करेगा।

यह किस तरह से वाजिब है कि परंपरागत तौर पर स्वच्छता के काम में लगे विशिष्ट समुदाय के लोग ही उस काम में लगे रहें। एक ऐसे वक्त में जबकि तमाम मेहनतकश तबकों में- जो सदियों से सामाजिक सोपानक्रम में निचले पायदान पर स्थित रहे हैं- एक नई जागृति आ रही है, उस वक्त ऐसी कोई भी पहल एक तरह से उसी जातिप्रथा को बनाए रखने का जरिया बन सकती है। अपने आप को जनपक्षीय दिखाने के लिए महाराष्ट्र सरकार जो भी तर्कदे, मगर जैसा कि स्पष्ट है यह कदम एक तरह से सदियों पुरानी जाति व्यवस्था को जारी रखने पर आधिकारिक मुहर लगाना है। एक तरफ यही सरकार है जो खतरनाक हालात में काम करने वाले इन कामगारों को सुरक्षा-उपकरण प्रदान करने में विफल रहती है और दूसरी तरफ वह चाहती है कि इसी ‘गंदे काम में’ पीढ़ी-दर-पीढ़ी वही लोग लगे रहें।

लेकिन सफाई के काम को खास समुदायों के लिए ही आरक्षित रखने में महाराष्ट्र सरकार कोई अपवाद नहीं है। कुछ समय पहले जम्मू-कश्मीर में स्वच्छकार कहलाने वाली जाति में जनमे और इस राज्य के निवासी के लिए सफाई वालों की सरकारी नौकरी में सौ फीसद आरक्षण की गारंटी की बात सुनाई दी थी। सफाई वालों की भर्ती के लिए वर्ष 2008 की अधिसूचना में साफ लिखा गया था कि इसके लिए सौ फीसद सीधी भर्ती संबंधित समुदाय से होगी। वर्ष 2012 में उत्तर प्रदेश में सत्ता संभाले अखिलेश यादव ने अपने जनाधार के विस्तार के मकसद से वाल्मीकियों को रिझाते हुए इसी तर्ज पर चंद घोषणाएं की थीं। राजधानी लखनऊ में आयोजित ‘सफाई मजदूर रैली’ में उन्होंने चालीस हजार सफाई कामगारों की भरती करने और उनकी समस्याओं पर गौर करने के लिए एक विशेष अधिकार प्राप्त कमेटी बनाने का एलान किया था। और इस कवायद से कुछ साल पहले मायावती के नेतृत्व वाली बसपा सरकार ने समान किस्म का निर्णय लिया था।

पूर्ववर्ती मायावती सरकार द्वारा जारी विज्ञापन में अनुसूचित जातियों विशेषकर ‘वाल्मीकि समुदाय’ के उत्थान की खातिर लिए गए ‘ऐतिहासिक निर्णय’ बात कही गई थी। इसके अंतर्गत ग्रामीण क्षेत्रों में सफाई के काम में वाल्मीकि समुदाय के लिए एक लाख से अधिक स्थायी नौकरियां देने की घोषणा की गई थी। उसी किस्म का एलान उन दिनों हरियाणा में भूपिंदर सिंह हुड्डा की अगुआई वाली कांग्रेस सरकार ने किया था। दलित उत्थान को लेकर जो सरकारी विज्ञापन प्रकाशित किया गया था, उसमें इसी बात को रेखांकित किया गया था कि ‘दलितों के लिए एक सुनहरा अवसर कि ग्यारह हजार सफाई कर्मचारी अनुसूचित जातियों से ही भरती किए जाएंगे।’

और यह महज चुनी हुई सरकारों का मामला नहीं था। अनुसूचित जातियों और जनजातियों के कल्याण से संबंधित केंद्रीय विद्यालय संगठन और नवोदय विद्यालय की समिति ने अपनी जो सिफारिशें आठ साल पहले संसद के समक्ष पेश की थीं (दिसंबर 1, 2007) उसमें भी यही बात प्रतिध्वनित हो रही थी। इसमें कहा गया था कि केंद्रीय विद्यालयों और उनके कार्यालयों के लिए जरूरी सफाई कर्मचारी अनुसूचित जातियों और जनजातियों से ही भरती किए जाएंगे।

यह विडंबना ही है कि उस वक्त किसी ने यह सवाल नहीं उठाया कि सफाई का काम उसी समुदाय के लिए आरक्षित करना, जो उसी पेशे के चलते लंबे समय से ‘वर्ण-समाज’ के हाथों प्रताडऩा और भेदभाव का शिकार होता रहा है, आखिर किस मायने में ‘ऐतिहासिक निर्णय’ कहा जा सकता है। क्या यह भारत के संविधान के अंतर्गत जनता को प्रदत्त मौलिक अधिकारों की खुली अवहेलना नहीं है?

कोई यह पूछ सकता है कि जब तक विकल्प न हो तब तक उन्हीं कामों को करते रहने में क्या दिक्कत है। पर प्रश्न है कि मानवीय गरिमा के खिलाफ जो काम हैं, उन्हें सभ्य समाज में क्यों चलते रहना चाहिए? तथाकथित ऐतिहासिक निर्णय जैसा ही तर्क बाल श्रम को जारी रखने के बारे में या कम-से-कम उसे नजरअंदाज करने के पक्ष में भी दिया जाता रहा है। कहा जाता है कि चार करोड़ बाल श्रमिकों को आप अगर काम से वंचित कर देंगे तो उनके परिवार भूखे मरेंगे। ऐसे तर्क श्रेणी-अनुक्रम पर आधारित वर्ण-समाज की संरचना को नई वैधता, नई स्वीकार्यता प्रदान करते हैं, दलित मुक्ति के रास्ते में नई बाधाएं खड़ी करते दिखते हैं।

दरअसल, अब इस बात को रेखांकित करने की जरूरत है कि आजादी के अड़सठ साल बाद भी आठ लाख से अधिक लोग (जिनमें पंचानबे फीसद महिलाएं हैं) संविधान द्वारा लगाई गई पाबंदी के बावजूद सिर पर मैला ढोते हैं, हर साल हजारों लोग सीवर में जहरीली गैस से मरते हैं और इस काम में अनुसूचित जातियों के लोग ही अधिकतर लगे हैं। ऐसी स्थिति क्या बताती है? क्या यह हमारी सामाजिक प्रगति की निशानी मानी जाएगी? काबिलेगौर है कि सफाई का मसला आता है और इसी बहाने जब कहीं-कहीं जातिप्रथा को लेकर सवाल खड़े होने की स्थिति बनती है तब इस देश की संसद भी विचित्र मौन अख्तियार कर लेती है। कानून बनते हैं मगर वे कागज पर ही बने रहते हैं, उन्हें अमली जामा नहीं पहनाया जाता।

उदाहरण के तौर पर, सरकार ने सिर पर मैला ढोने की प्रथा बंद करने के लिए 1993 में कानून बनाया, मगर उसे अधिसूचित करने में ही चार साल लगा दिए। किसी भी राज्य ने इस अधिसूचना को लेकर वर्ष 2000 तक कोई रुचि नहीं दिखाई।

यह कानून बनने के बीस साल बाद तक किसी भी सरकारी अफसर या किसी कंपनी के अधिकारी को इस मामले में दोषसिद्ध नहीं किया गया था, न किसी को इस प्रथा को जारी रखने के लिए दंडित किया गया था। दरअसल, देखने में तो यह आया कि इस कानून का सबसे बड़ा उल्लंघनकर्ता तो सरकार ही है। पैसों की कमी का हवाला देते हुए रेल महकमा इस कानून के अमल का लगातार विरोध करता आया था।

गोया अपनी नाकामी को ही रेखांकित करने के लिए सरकार ने सितंबर 2013 में एक नया कानून बनाया- ‘द प्रोहिबिशन ऑफ एम्प्लायमेंट ऐज मैन्युअल स्केवेंजर्स ऐंड देअर रिहेबिलिटेशन एक्ट 2013’- और इसकी अधिसूचना भी जारी कर दी।