शरद यादव ने दिखायी राजनीति को नई राह

  • 2016-01-17 02:12:05.0
  • रविकांत सिंह

नई दिल्ली। बिहार की राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाने वाले और वर्तमान में जदयू अध्यक्ष शरद यादव का जन्म 1 जुलाई 1947 को मध्यप्रदेश के होशंगाबाद जिले के अखमऊ गांव में हुआ था। वे बचपन से ही पढ़ाई में बहुत तेज थे। प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त कर इन्होंने जबलपुर इंजीनियरिंग कॉलेज में दाखिला ले लिया। शरद यादव इलेक्ट्रॉनिक इंजीनियरिंग में गोल्ड मेडलिस्ट हैं, साथ ही उन्होंने रॉबट्र्सन मॉडल साइंस कॉलेज से स्नातक की डिग्री प्राप्त की। शरद यादव जबलपुर विश्वविद्यालय के छात्र संगठन के अध्यक्ष भी रहे। मेधावी छात्र होने के अलावा उन्होंने छात्र नेता के रूप में तीन प्रमुख आंदोलनों का नेतृत्व किया। उन्होंने विशेष रूप से कम उम्र में ही समाज के दलित वर्गों के लिए सामाजिक न्याय और समानता के अनुदान की लड़ाई लड़ी।
वे किताबें पढऩे के शौकीन हैं, विशेषत: इतिहास की। साथ ही उन्होंने कई विषयों पर लेख भी लिखे हैं, जो कई राष्ट्रीय दैनिकों में प्रकाशित भी हुए। उन्होंने अपनी राजनीति की शुरुआत एचडी देवगौड़ा, गुरुदास दासगुप्ता, मुलायमसिंह यादव और लालू यादव के साथ की।
शरद यादव sharad yadav

सबसे पहले वे 1974 में मप्र की जबलपुर लोकसभा सीट से चुनाव जीते। यह वह समय था, जब जेपी आंदोलन अपने चरम पर था, तब जयप्रकाश नारायण द्वारा हलधर किसान चुनाव चिह्न के लिए चुने जाने वाले वे पहले उम्मीदवार थे। 1977 में पुन: उसी निर्वाचन क्षेत्र से चुने गए। 1989 में उप्र के बदायूं निर्वाचन क्षेत्र से चुने गए। इसके बाद उन्होंने मधेपुरा लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव लड़ा। मधेपुरा पूर्वी भारत के बिहार राज्य के 40 लोकसभा निर्वाचन क्षेत्रों में से एक है। साथ ही मधेपुरा बिहार के 38 जिलों में से एक है और जिले का प्रशासनिक मुख्यालय भी है। यह जिला कोसी क्षेत्र का हिस्सा भी है।
1991 के बाद शरद यादव मधेपुरा निर्वाचन क्षेत्र से 1996, 1999 और 2009 में विजयी हुए। जनता दल (युनाइटेड) प्रमुख शरद यादव 2012 में 'उत्कृष्ट सांसद पुरस्कार' के लिए चुने गए। लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार ने संसद के सभी सदस्यों की उपस्थिति में उन्हें यह पुरस्कार सौंपा।
उनका दृढ़ विश्वास है कि संसद हमारे देश के लोकतंत्र में आम नागरिकों के मुद्दे उठाने का एक सही और प्रभाव मंच है। उन्होंने हमेशा समाज के विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग से संबंधित मुद्दों को उठाया। यही वजह है कि वे मंडल आयोग की सिफारिशें प्राप्त करने वालों में से एक रहे। शुरू से ही वो न केवल छात्र नेता के रूप में बल्कि संसद में और संसद के बाहर
भी अजा, अजजा, अपिव और अल्पसंख्यकों के हितों के लिए लड़ते रहे हैं।
शरद यादव ही वो पहले शख्स थे, जिन्होंने एम्स के फैकल्टी एसोसिएशन बनाम अजा / अजजा / अपिव की आरक्षण नीति के विरुद्ध भारतीय संघ के विषय में सर्वोच्च न्यायालय की संवैधानिक पीठ के फैसले के खिलाफ 2013 में आवाज उठाई थी। इसके अलावा उन्होंने भ्रष्टाचार, काला धन, कृषि नीति, आर्थिक नीति, विदेशी प्रत्यक्ष निवेश औद्योगिक नीति आदि जैसे मुद्दों को लेकर संसद में हमेशा आवाज बुलंद की।
शरद यादव 1991 से 96 तक जनता दल से जुड़े रहे। इसके बाद वे लालू प्रसाद की पार्टी राष्ट्रीय जनता दल से जुड़ गए। 1998 में उन्होंने जॉर्ज फर्नांडीस की मदद से जनता दल यूनाइटेड पार्टी बनाई, नीतीश कुमार जनता दल छोडक़र जिससे जुड़े। 1998 में ही शरद यादव और लालकृष्ण आडवाणी की अध्यक्षता में बीजेपी और जदयू साझेदार हो गए। शरद यादव पर पार्टी के फंड के नाम पर 3 लाख के हवाला घोटाले का आरोप भी लगा है। पर समय ने साबित कर दिया कि वह निर्दोष थे, इस प्रकार भारत की राजनीति में महत्वपूर्ण स्थान बनाने वाले शरद यादव ने भारतीय राजनीति को नई राहें भी दिखाईं हैं। उनका राजनीतिक जीवन बहुत से उतार चढ़ावों से बना है, और हरेक उतार चढ़ाव ने उनके भीतर छिपे एक नये शरद यादव को नई फॉरम में लोगों के सामने पेश करने में सहायता की है।