इतिहास में स्वार्थी तत्वों को किया गया है गौरवान्वित

  • 2015-10-25 06:10:29.0
  • उगता भारत ब्यूरो

अशोक त्यागी

20वीं शताब्दी का तथाकथित राष्ट्रीय आंदोलन जो कांग्रेस द्वारा प्रायोजित था, वह अंग्रेजों को भारत से निकालने में कितना सफल रहा, यह एक लंबी बहस का विषय है, संदिग्ध सोच, संदिग्ध आचरण, साम्प्रदायिक तत्वों के आगे नतमस्तक हो जाना, किसी वीर क्रांतिकारी के लक्षण नही होते, यह केवल कायरों और स्वार्थी लोगों का दर्शन हो सकता है। खेद यह कि युवा पीढ़ी को बताया ही नही गया कि स्वतंत्रता प्राप्ति की परिस्थितियां क्या थीं?

इतिहास की पुस्तकों में कायरों और स्वार्थी तत्वों को गौरवान्वित किया गया है। जिन्होंने मां भारती के चरणों में अपना शीश समर्पित किया, वे इतिहास में परिशिष्ट पर रख दिये गये। शीश कटवाने की बात तो बहुत दूर, जिन्होंने देश के लिए नाखून तक नही कटवाया, वे हमारे प्रेरणा स्रोत बन रहे हैं। कौन है इस षडयंत्र के पीछे? क्या भावना है इस कल्पित इतिहास की?

राष्ट्र की महान विभूतियों और राष्ट्रीयता के आधार स्तंभों की प्रेरणा राष्ट्रीय राजनीति एवं सार्वजनिक जीवन का आधार न बन जाएं, इसका प्रयास स्वतंत्रता से पूर्व भी चला और अब भी चल रहा है।

जब स्वतंत्रता आंदोलन चला तो समर्पित क्रांतिकारियों को दिग्भ्रमित कहने वालों की कमी नही थी। क्रांतिकारी विदेशी साम्राज्यवाद के स्पष्ट विरोधी थे, अत: उनको प्रचार तंत्र विकसित करने का अवसर भी नही मिला, दूसरी ओर जो लोग ब्रिटिश साम्राज्य से नूरा कुश्ती लड़ रहे थे, उनके पास व्यापक प्रचार तंत्र था, जनता तक जाने की सुविधा थी, इसमें अंग्रेजों का हित भी था, तथा तथाकथित स्वतंत्रता के सेनानियों का भी।

स्वतंत्रता के पश्चात सत्ता सुख भी उन लोगों के हाथों में ही आया जो केवल नूरा कुश्ती लडऩा ही जानते थे। ये अपनी वास्तविकताओं से परिचित थे। अत: शिक्षा के माध्यम से ऐसा वातावरण तैयार किया गया, जो केवल उन पर ही केन्द्रित हो। यहां तक कि आत्मसमर्पित क्रांतिकारियों और देशभक्तों को उग्रवादी, आतंकवादी या चरमपंथी कहा गया। कुछ लोगों ने लोकमान्य तिलक को भी चरमपंथी होने का विशेषण दिया। कारण, केवल यही कि गोखले की भांति तिलक गांधी की कार्यशैली के समर्थक नही थे।

एक नया इतिहास लिखा जा रहा है। दक्षिणी भारत के एक कांग्रेस शासित राज्य की पाठ्य पुस्तकों में श्रीमती सोनिया गांधी को एक वीरांगना के रूप में प्रदर्शित करने वाला पाठ संकलित किया गया था। देश की राजधानी में शिवाजी, प्रताप, भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, रामप्रसाद बिस्मिल आदि के नाम पर कालोनी नही है, पर पूरे नेहरू परिवार के नाम पर न केवल कालोनियां हैं अपितु सैकड़ों की संस्थाएं भी हैं। ऐसे कैसे स्पष्ट हो पाएगा, राष्ट्रीयता का ज्वार? कौन समझेगा भगतसिंह के बलिदान को, कौन जानेगा रामप्रसाद बिस्मिल के त्याग को?

संसद की ओर जाने वाली सारी सडक़ों के नाम विदेशी आक्रमणकारियों के नाम पर हैं। जब लोकतंत्र के मंदिर जाने के लिए हमें औरंगजेब रोड या डलहौजी रोड का सहारा लेना होगा तो नई पीढ़ी से राष्ट्रीयता के संस्कारों की आशा करना ही व्यर्थ है। भामाशाह जैसे देशभक्त के नाम पर सडक़ नही, राष्ट्रघाती मानसिंह के नाम पर सडक़ है। अत: नेहरू परिवार के नामों को ेदेखकर आश्चर्य नही होता। यह तो एक रीति बन गयी है। जब यह रीति इतिहास का आधार बन जाती है तो निश्चित ही अनर्थ हो जाता है। आज हम इसी अनर्थ की विकृतियों का शिकार हो रहे हैं।

राष्ट्रीयता के विकास के लिए प्रेरणास्रोत की आवश्यकता होती है। उन राष्ट्रनायकों को किनारे करने का प्रयास किया गया, जिन्होंने भारतीय संस्कृति और राष्ट्रीय भावन के सहयोग में महत्वपूर्ण योगदान दिया। यदि देश की जनता इनके महत्व को समझने लगेगी तो मक्कारों की दुकान कैसे चलेगी? इसलिए ही श्रीराम की अवहेलना कर दी गयी उनके ऐतिहासिक अस्तित्व को संदिग्ध घोषित किया गया, जबकि आक्रमणकारी और क्रूर बाबर को गौरवान्वित किया गया। श्रीराम का राजधर्म विश्व में अनुकरणीय है, उसमें त्याग है, जनादेश है, विनम्रता है, सेवा है। ये गुण कहां हैं आधुनिकता राजनेताओं में? यदि श्रीराम को राष्ट्रनायक माना गया तो जनता राजनेताओं से उसी राजधर्म के पालन की आशा करेगी, जिसका पालन श्रीराम ने किया। इस नाते बाबर को प्रतिष्ठित करना उचित समझा गया। श्रीराम के जन्मस्थल पर मंदिर का निर्माण न होना इस बात का द्योतक है कि कलुषित और दोषपूर्ण राजनीति वातावरण राष्ट्रीय संस्कृति को प्रतिष्ठित करना ही नही चाहता।

बात केवल यही समाप्त नही हो जाती, संपूर्ण इतिहास ही ऐसा रचा गया है, जिसमें भारत का गौरव कहीं नही है। उदाहरणत: इस प्रचार को लिखा जा सकता है कि दिल्ली आगरा, बीजापुर, जौनपुर, हैदराबाद, फिरोजाबाद, अहमदबाद आदि नगरों की स्थापना मुस्लिम शासकों ने की। जबकि ऐतिहासिक प्रमाणों की दृष्टि से यह नितांत गलत है। दिलली का अस्तित्व 7वीं शताब्दी में था। आगरे का संबंध राजपूत शासकों से था। 11वीं शताब्दी में यह उत्तर भारत का एक गौरवशाली नगर था। हैदराबाद, फिरोजाबाद और अहमदबाद भारत के प्राचीन नगरों में से एक है। मुस्लिम आक्रमणकारियों ने उनके नाम बदले हैं और संस्कृति के पवित्र केन्द्रों को नष्ट किया है। तथ्यात्मक इतिहास की अवहेलना कर विद्यार्थियों को गलत पढ़ाया जा रहा है।

मध्यकालीन भारत के इतिहास के संबंध में केवल इसलिए भ्रामक और रचित इतिहास पढ़ाया जाता है, ताकि मुस्लिमों को प्रसन्न किया जा सके।

इतिहास सदा तथ्यात्मक होता है। लेकिन भारत के संबंध में ऐसा नही है। यहां इतिहास तथ्यों की अनेदखी कर रचा गया है। रचे गये इतिहास का मुख्य लक्ष्य साम्प्रदायिक शक्तियों का रक्षा कवच बनना और भारतीयता की गौरवशाली परंपराओं को धूमिल करना है। कुतुबमीनार के संबंध में हमारे इतिहासकारों की जो धारणा है, वह सर्वाधिक निर्लज्जापूर्ण है। प्रमाण स्पष्ट है फिर भी उसका संबंध दिल्ली सल्तनत काल के सुल्तानों से जोड़ा जाता है। ऐतिहासिक प्रमाण यह सिद्घ करते हैं कि वह एक हिंदू स्तम्भ है। कुतुबुद्ीन ऐबक द्वारा उसे निर्मित कराने का कहीं कोई ऐतिहासिक प्रमाण नही है। जो कुछ प्रमाण अन्य सुल्तानों के विषय में मिले हैं वे एक दूसरे के विपरीत हैं। जो कुतुबुद्दीन महरौली के 27 मंदिरों को ध्वस्त करता, वह हिंदू वास्तुशिल्प पर मीनार का निर्माण क्यों करता? कुतुबुद्दीन परिसर को देखने के पश्चात ही एक अति साधारण व्यक्ति भी यह अनुमान लगा सकता है कि यहां भव्य हिंदू मंदिर थे। हिंदू देवी मूर्तियां और संस्कृत शब्दाबली स्तंभों और भित्तियों पर देखी जा सकती है।

विश्व विख्यात खगोलविद और गणितज्ञ वराहमिहिर द्वारा स्थापित मिहिरावली विश्वविद्यालय खगोल, रसायन, गणित और ज्योतिष शास्त्र के अध्ययन का प्रमुख केन्द्र था। तक्षशिला विक्रमशिला और नालंदा की भांति इसे भी नष्ट कर दिया गया। कुतुबुमीनार परिसर उस नष्ट विश्वविद्यालय के अवशेष मात्र है। इतिहास की पुस्तकों में यह बताया गया है कि कुतुबुद्दीन वास्तुकला का बहुत बड़ा मर्मज्ञ था उसने महरौली में एक भव्य मस्जिद और मीनार का निर्माण कराया। हां मस्जिद का निर्माण अवश्य कराया था, वह भी 27 मंदिरों को तोडक़र। ये मंदिर 27 नक्षत्रों के अध्ययन केन्द्र थे।

(लेखक भारतीय सांस्कृतिक इतिहास के मर्मज्ञ हैं।)