सरकार ने आखिर ‘आधार’ पास करा ही लिया

  • 2016-03-16 06:30:17.0
  • प्रमोद भार्गव

हर नागरिक को पहचान देने के लिए शुरू की गई आधार योजना को अब राजग सरकार ने लोकसभा से विधेयक के रूप में पारित करा कर साफ कर दिया है कि वह आधार को संवैधानिकता प्रदान करने के पक्ष में है। इस विधेयक को आधार या ‘लक्षित वित्तीय एवं अन्य सरकारी सहायता लाभ व सेवा प्रदाय मुद्रा विधेयक-2016’ नाम दिया गया है। इससे प्रत्यक्ष लाभ अंतरण जैसी योजनाओं में लाभार्थियों को सीधे उनके खाते में सबसिडी देने के प्रावधानों को संवैधानिक वैधता मिल जाएगी। सरकार ने इसे धन विधेयक के रूप में पेश किया है। धन विधेयक के लिए राज्यसभा की मंजूरी अनिवार्य नहीं है। इसे केवल चर्चा के लिए राज्यसभा में लाया जा सकता है।

आधार

सरकार ने विधेयक पारित कराने का यह शॉर्टकट तरीका इसलिए अपनाया है, क्योंकि राज्यसभा में सत्तापक्ष बहुमत में नहीं है। इसी कारण इसे ‘धन विधेयक’ के रूप में पेष किया गया है। लोकसभा से विधेयक पारित होने के बाद राज्यसभा इसमें कोई संशोधन नहीं ला सकती है। अलबत्ता संशोधन की सिफारिश जरूर कर सकती है। इसके साथ ही यह अनिवार्यता भी है कि विधेयक चौदह दिनों के भीतर लोकसभा को लौटा दिया जाए। इसी कारण कांग्रेस नेता मल्लिकार्जुन खरगे ने विरोध जताते हुए कहा है कि राज्यसभा से बचने के लिए सरकार ने इसे धन विधेयक के रूप में पेश किया है। इस परिप्रेक्ष्य में कांग्रेस व अन्य विपक्षी दलों को विधेयक पारित कराने की इस संक्षिप्त प्रक्रिया से यह सबक लेने की जरूरत है कि संसद के सदनों में यही हुल्लड़ बरपा रहा तो सत्तारूढ़ दल अन्य विधेयकों को पारित कराने में भी यही रुख अपना सकता है, इससे ऊपरी सदन को नजरअंदाज करने की अलोकतांत्रिक परंपरा का सिलसिला शुरू हो सकता है? जबकि कानून बनाने की प्रक्रिया में दोनों सदनों की भूमिका महत्त्वपूर्ण है, जिससे किसी नए कानून के अस्तित्व में आने से पहले उसके प्रारूप पर पर्याप्त चर्चा हो और उसकी कमियां निकाल कर, उसे व्यापक रूप में जन-हितैषी बनाया जा सके। पर कालांतर में अगर ऐसा नहीं हुआ तो एक गलत परंपरा की शुरूआत हो सकती है।

इस नाते कांग्रेस व अन्य दलों को सचेत रहते हुए, संसदीय कार्यवाही को सुचारु रूप से चलाने का मार्ग प्रशस्त करने की जरूरत है, जिससे सत्तापक्ष और विपक्ष में पारस्परिक विश्वास की कमी दूर हो। चूंकि राज्यसभा में सरकार के पास बहुमत नहीं है, इसलिए सरकार को विधेयक के लटक जाने की आशंका थी। ऐसा होता तो हजारों करोड़ रुपए की सबसिडी के गलत हाथों में जाने का सिलसिला जारी रहता। इसका असर सरकार की वित्तीय सेहत पर पड़ता। वैसे भी सरकार बीते इक्कीस महीनों के भीतर अर्थव्यवस्था में ऐसा कोई विशेष सुधार नहीं कर पाई है, जिसे मोदी सरकार की करिश्माई उपलब्धि माना जाए।

पहचान-पत्र ‘आधार’ को अनिवार्य करने से पहले सर्वोच्च न्यायालय भी केंद्र सरकार को कई बार दिशा-निर्देश दे चुका था। कानूनी वैधता नहीं होने के कारण ही अदालत ने इसका उपयोग स्वैच्छिक रूप से मनरेगा, भविष्य निधि, पेंशन, जन-धन, पीडीएस और एलपीजी में सबसिडी तक सीमित कर दिया था। वैसे आधार के जरिए यूपीए सरकार ने लोक कल्याणकारी योजनाओं की नकद सबसिडी देने की शुरुआत कुछ राज्यों के चुनिंदा जिलों से की थी। नरेंद्र मोदी सरकार ने एक कदम आगे बढ़ कर, आधार को बिना कानूनी मान्यता दिलाए, इसकी अनिवार्यता देश की पूरी आबादी पर थोप दी थी। आधार के साथ सबसे बड़ी समस्या इसकी कानूनी वैधता नहीं होना था। बावजूद योजना को गतिशीलता देने के लिए केंद्रीय मंत्रिमंडल ने बारह सौ करोड़ रुपए की मंजूरी सितंबर 2014 में ही दे दी थी। यह राशि बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़ और उत्तर प्रदेश में नए आधार पहचान-पत्र बनाने के लिए दी गई थी। इसके साथ ही मोदी सरकार ने यह भी घोषणा की थी कि आधार के जरिए ही नकद सबसिडी दी जाएगी और सीधे लाभार्थियों के खाते में जमा होगी।

अब तक साठ हजार करोड़ रुपए खर्च करके करीब बानबे करोड़ कार्ड बन चुके हैं। सरकार का दावा है कि अब तक 97 प्रतिशत वयस्क लोग आधार के दायरे में आ चुके हैं। सरकार की मंशा है कि कालांतर में आधार को सभी लोक कल्याणकारी योजनाओं से जोड़ दिया जाए, जिससे इन योजनाओं में भ्रष्टाचार व अन्य प्रकार की अनियमितताओं पर अंकुश लग सके। सरकार ने आधार की महत्ता प्रतिपादित करते हुए सर्वोच्च न्यायालय को बताया था कि गैस सिलेंडर वितरण में इसकी अनिवार्यता की शर्त लागू कर देने भर से सरकारी खजाने में चौदह हजार करोड़ की बचत दिसंबर 2015 तक हो चुकी है।

इतनी उपयोगी व बहु-उद्देश्यपूर्ण योजना होने के बावजूद आधार को लेकर कई सवाल उठते रहे हैं और इसके क्रियान्वयन की बाबत भी कई पेचीदगियां बताई जाती रही हैं। बावजूद इसके न तो समाधान तलाशे गए और न ही इसे कानूनी रूप देने की पहल हुुई। मनमोहन सिंह सरकार हर समय संसद की सर्वोच्चता की दुहाई देती रही, लेकिन छियासठ हजार करोड़ की लागत वाली इस महत्त्वाकांक्षी योजना की संसदीय वैधता को टालती रही। योजना आयोग के पूर्व अध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया और सूचना तकनीक विशेषज्ञ नंदन नीलकेणी के आग्रह पर संसद के दोनों सदनों को दरकिनार कर ‘भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण’ को मंजूरी दे दी गई और तत्काल देश भर में आधार पहचान-पत्र बनाने का काम भी युद्धस्तर पर शुरू हो गया।

बाद में जब इसे संवैधानिक दर्जा देने की पहल शुरू हुई तो यशवंत सिन्हा की अध्यक्षता वाली स्थायी संसदीय समिति ने इसे खारिज कर दिया था। समिति ने अपनी दलील को पुख्ता बनाने के लिए सुरक्षा को आधार बनाया था। सुरक्षा के लिहाज से यह योजना निरापद नहीं है। क्योंकि इसके तहत व्यक्ति, मूल दस्तावेजों और उसकी स्थानीयता की जांच-पड़ताल के बगैर कार्ड प्राप्त करने में सफल हो जाता है। आधार कार्ड देश के ज्यादातर साइबर कैफों में बनाए जा रहे हैं। इस कारण बांग्लादेशी व अफगानी घुसपैठियों और नेपालियों के भी बड़ी संख्या में कार्ड बना दिए गए हैं। देश की नागरिकता के प्रमाण के रूप में आसानी से प्राप्त हो जाने वाले ऐसे पहचान-पत्र पर अंकुश जरूरी था। अलबत्ता अब न्यायालय की कड़ाई के बाद सरकार आधार कार्ड की जरूरत को जनहित से जोडऩा चाहती है तो उसे आधार को वैधानिक दर्जा देने की मजबूरी थी। आधार के जरिए देश के नागरिक को दिए जाने वाले पहचान पत्र को जारी करने से पहले नागरिक बनाम निवासी के मसले को हल करने की दृष्टि से अगर ये शर्तें जोड़ दी जाती हैं तो आधार आतंकी और घुसपैठिए नहीं बनवा पाएंगे? देश की नागरिकता के लिए, अठारह तरह की व्यक्तिगत पहचानें शामिल हैं, उनमें से कोई एक नागरिक पहचान व्यक्तिके पास अनिवार्य कर दी जाए? साथ ही तैंतीस प्रकार के निवास प्रमाणपत्र वाले दस्तावेजों में से भी कोई एक प्रमाण होना जरूरी हो, तभी व्यक्तिआधार का हकदार होना चाहिए? आधार पत्र बनवाना कितना आसान व सतही है, यह इस तथ्य से पता चलता है कि कुछ समय पहले भगवान हनुमान के नाम से ही सचित्र कार्ड बन गया था। हरेक खानापूर्ति व पंजीयन क्रंमाक के साथ यह कार्ड बंगलुरुसे बना था। पता फर्जी था, इसलिए कार्ड राजस्थान के सीकर जिले के दाता रामगढ़ डाकघर पहुंच गया और सार्वजनिक हो गया। इससे पता चलता है कि नागरिक की पहचान और मूल निवासी की शर्त जुड़ी नहीं होने के कारण कार्ड बनाने में कितनी लापरवाही बरती जा रही है। इस मामले में हैरानी में डालने वाली बात यह भी थी कि कार्ड बनाने वाले कंप्यूटर ऑपरेटर और कार्ड का सत्यापन करने वाले अधिकारी ने हनुमान के चित्र को व्यक्तिका फोटो कैसे मान लिया? केवल धन कमाने के लिए कार्ड बनाने की गिनती का खयाल रखा गया है? जब आधार को मंजूरी मिली थी, उसके पहले से ही भारत सरकार के गृह मंत्रालय के अंतर्गत ‘भारत का राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर’ के माध्यम से व्यक्तिको नागरिकता की पहचान देने वाले कार्ड बनाए जाने की कार्यवाही चल रही थी। लिहाजा, देश के नागरिक के बायोमीट्रिक ब्योरे तैयार करने की प्रक्रिया में किस विभाग की भूमिका को उचित व अहम माना जाए, इस नजरिए से संसद तथा सरकार के स्तर पर भ्रामक स्थिति बन गई थी। विधेयक के प्रारूप को खारिज करने का यही प्रमुख कारण संसदीय समिति ने माना था।

दरअसल, एनपीआर (नेशनल पॉपुलेशन रजिस्टर) के कर्मचारी घर-घर जाकर लोगों के आंकड़े जुटाने का काम कर रहे थे। सरकार के सीधे नियंत्रण में होने के साथ-साथ यह प्रणाली विकेंद्रीकृत थी। गोया, इसकी विश्वसनीयता आधार प्राधिकरण की तुलना में कहीं ज्यादा थी। दोनों संस्थाओं के कामों की प्रकृति और उद्देश्य एक जैसे थे। इसलिए यहां यह सवाल भी उठा था कि एक ही कार्य दो भिन्न संस्थाओं से क्यों कराया जा रहा है? यह विरोधाभास मोदी सरकार ने भी दूर नहीं किया है। इसीलिए बीजू जनता दल के भर्तृहरि मेहताब ने विरोध करते हुए आधार संख्या के विरोधाभासी पहलुओं को धन-विधेयक से दूर करने की बात कही थी, पर इन विरोधाभासों को दूर नहीं किया गया। लेकिन सरकार ने इतना जरूर किया है कि इसे नागरिक की पहचान तक सीमित न रखते हुए, इसका मुख्य लक्ष्य अनुदान के रूप में मिलने वाले धन के नगद अंतरण, पेंशन और छात्रवृत्ति जैसी लाभदायी अन्य योजनाओं तक सीमित कर दिया है।
-प्रमोद भार्गव

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