संसार में द्वंद्व-भाव और मनुष्य

  • 2016-06-26 09:30:39.0
  • रज्जाक अहमद

manushya

दुनिया की शुरूआत से ही हर चीज को दो शब्दों में बांटा गया है। इंसान ने समाज में अपनी सोच और शब्दों का प्रचलन तय किया। पर कुछ शब्द ऐसे हैं जो द्वंद से भरे हुए हैं और उनका विपरीतार्थक शब्द अवश्य मिलता है। जैसे रात-दिन, पृथ्वी -आकाश, अमीर-गरीब, सुख-दुख, सत्य-असत्य, न्याय-अन्याय, ईमानदार-बेईमान, अकलमंद -बेवकूफ। आपको ऐसे हजारों शब्द सुनने को मिलते हैं, लेकिन हम यहां पर सिर्फ दो शब्द अकलमंद -बेवकूफ व सत्य-असत्य इन पर ही चर्चा कर रहे हैं। सारी दुनिया में दो तरह के लोग हैं। इनमें से एक तबका अकलमंद लोगों का है, व दूसरा बेवकूफ (या यूं कहें कि मूर्खों का) है। इनमें अकलमंदों की तादाद बहुत कम है। बेवकूफों की ज्यादा है। लेकिन यह सत्य है कि जब तक दुनिया में बेवकूफ रहेंगे तब तक अकलमंद आदमी ना भूखा मरेगा, न मेहनत करेगा और समाज में शान से रहेगा। इसमें भी बुद्घिजीवियों का मामला अलग है। वह गरीबों में भी हो सकते हैं। अमीरों में तो होते ही हैं। यहां चर्चा उन अकलमंदों की हो रही है, जो वैसे तो धूत्र्त होते हैं, लेकिन अपनी बुद्घि व छल-कपट से समाज में अपना अलग स्थान बना लेते हैं। जैसे हर शहर या गांव में अधिकतर  स्थानीय नेता हमें मिलते हैं। उनका काम है कि जनता को बेवकूफ बनाकर समाज में अपनी काबलियत साबित की जाए, वह इस चालाकी से ही समाज में अपना स्थान तय करते हैं और लोग उन्हें बड़प्पन का सम्मान देते हैं, लेकिन यह छलावा स्थायी नही होता। धूर्त व्यक्ति अपनी चालाकियों से कुछ देर के लिए बड़ी-बड़ी बातें बनाकर रूप गुण की झूठी तस्वीर पेश करके थोड़ा सम्मान पा भी ले तो यह ज्यादा दिन नही चलता। उल्टे जब इस नाटक का पर्दा उठता है, तो लेाग उसे धूर्त व पाखण्डी बताकर तरह-तरह की भत्र्सना करते हैं। उपहास और निंदा करते हैं ऐसी परिस्थिति में ऐसे पाखण्डी लोगों की समाज में फिर समाज में चालाकी से बटोरी गयी इज्जत भी धूल में मिल जाती है। जीवन में भारी अशांति आती है, और ऊपर से अपमान भी भोगना पड़ता है। जैसे आज के स्वयं भू भगवान आसाराम बापू व उसके पुत्र का हाल हुआ है।

अब मैं सत्य पर आता हूं। लोग अक्सर कहते हैं कि सत्य बहुत कड़वा होता है, पर यह बात भी सिरे से ही गलत है। आप दूध में शक्कर डालकर पियें तो दूध मीठा लगेगा। अगर आपने दूध में लाल मिर्च या तंबाकू डाल दिया तो कैसा लगेगा? जैसे शक्कर दूध को मीठा कर देती है वैसे ही सत्य का मीठापन हमारी वाणी में होना चाहिए। सत्यवादी हमेशा वाणी में संयम रखता है। सत्य बोलने वाला भी कब, कहां और कितना बोलना है, इस बात का ध्यान रखता है। सत्य बोलने वाले हमेशा उदार होते हैं। सत्यवादी की एक महानता और होती है कि वह वे परिश्रमी और श्रमशील होता है, धैर्यवान होता है।  इसके विपरीत जिसे समाज अकलमंद और हुनरमंद कहता है, वह ना तो परिश्रमी होता है और ना कर्मशील होता है।

उसकी भाषा व उसके आचरण में कड़वापन व घमंड होता है। जिससे समाज में वह अपना रौब कायम रखता है। यदि आप चाहते हैं कि समाज में आपका सम्मान हो, आपकी प्रशंसा हो, आपको आदर मिले तो आपको उन आदरणीय पुरूषों के जीवन का अध्ययन करना चाहिए जो परिश्रमी और गुणवान रहे हैं या जिन गुणों के आधार पर वह आदरणीय कहलाये उनका अनुशरण करने से ही आप का गौरव जागृत होगा, और आपको समाज में सम्मान भी मिलेगा। मगर जीवन में कितना भी कष्ट आये आपको सच्चाई का रास्ता नही छोडऩा है और यदि आप लोगों को भ्रम में डालकर छलकपट से सम्मान प्राप्त करने की कामना करेंगे तो महंगा मोल चुका कर भी कुछ मिलने वाला नही है। हमारे महापुरूषों ने कहा है कि समाज के द्वंद्व भाव से ऊपर उठकर आचरण और चरित्र को महान बनाने की साधना व्यक्ति को करनी चाहिए।
- रज्जाक अहमद