रोजगार सृजन की राह की अड़चनें

  • 2016-04-20 09:30:10.0
  • डा. भरत झुनझुनवाला

रोजगार सृजन

सरकार ने देश में कौशल विकास को विशेष तौर पर प्रोत्साहन दिया है। कहा है कि बीते समय में 76 लाख युवाओं को स्किल टे्रनिंग दी गई है, परंतु इससे देश के युवाओं पर कुछ सकारात्मक प्रभाव पड़ा हो, ऐसा नहीं दिखता है। पहला कारण है कि देश में कौशल विकास के नाम पर तमाम एनजीओ द्वारा कमाई की जा रही है। फर्जी स्किल डिवेलपमेंट किया जा रहा है। दूसरा कारण है कि स्किल का डिवेलपमेंट हो जाए तो रोजगार बढऩे के स्थान पर घट सकते हैं। जैसे जेसीबी आपरेटर के कौशल का विकास किया जाए तो तालाब खोदने में लगे कर्मियों के रोजगार घटेंगेज्

राज्यों में चल रहे चुनावों में भाजपा ने रोजगार के नाम पर वोट मांगे हैं। रोजगार सृजन के दो उपाय हैं। एक उपाय है कि बड़े उद्योगों पर टैक्स लगाकर छोटे उद्योगों को संरक्षण दिया जाए। छोटे उद्योगों में रोजगार ज्यादा उत्पन्न होते हैं। दूसरा उपाय है कि बड़े उद्योगों को पहले छोटे उद्योगों को नष्ट करने दिया जाए। इसके बाद मनरेगा जैसी योजनाओं से रोजगार उत्पन्न किया जाए। इन दोनों में छोटे उद्योगों को संरक्षण देने वाला पहला उपाय ही उत्तम है। इस बात को एक उदाहरण से समझा जा सकता है। मान लीजिए किसी व्यक्ति का स्वास्थ्य नरम है। ऐसे में एक उपाय है कि उसके सामने से फास्ट फूड के विज्ञापन हटा लिए जाएं। वह सब्जी-रोटी खाने लगेगा। दूसरा उपाय है कि उसे प्रेरित किया जाए कि वह अपना खून ब्लड बैंक को बेचकर कुछ धन अर्जित करे और सब्जी-रोटी खाए। यह दूसरा उपाय निष्क्रिय होगा, चूंकि खून बेचने से स्वास्थ्य में गिरावट निश्चित रूप से आएगी। सब्जी-रोटी खाने से इस गिरावट की भरपाई होगी या नहीं, यह पता नहीं लगता है। उत्तम यही है कि पिज्जा कंपनी पर प्रतिबंध लगा दिया जाए। इसी प्रकार नए रोजगार पैदा करने के लिए रोजगार भक्षक बड़े उद्योगों पर प्रतिबंध लगाना जरूरी है। आज बड़े उद्योगों द्वारा छोटे उद्योगों पर लगातार प्रहार हो रहा है। रोजगार भक्षक बड़े उद्योगों पर अधिक टैक्स लगाना चाहिए। जैसे आलू चिप्स के पैकेटों पर टैक्स बढ़ा दिया जाए तो मूड़ी बेचने वालों का धंधा चल निकलेगा। अथवा चीनी मिलों पर टैक्स बढ़ा दिया जाए तो गुड़ और खांडसारी बनाने वालों का धंधा जोर पकड़ लेगा। अथवा आटोमेटिक लूम पर टैक्स बढ़ा दिया जाए तो पावरलूम एवं हैंडलूम का व्यापार चल निकलेगा। वर्तमान सरकार द्वारा इस दिशा में कोई पहल नहीं की गई है। ऐसे में बड़े उद्योगों के द्वारा छोटे उद्योगों का भक्षण पूर्ववत जारी रहेगा। वर्तमान में उद्योगों को ऊर्जा आडिट करानी होती है। बताना होता है कि ऊर्जा की बचत को उनके द्वारा क्या कदम उठाए गए हैं? इसी प्रकार सभी निवेश के प्रस्तावों की रोजगार आडिट की जानी चाहिए। आलू चिप्स की फैक्टरी को स्वीकृति देने के पहले जांच करनी चाहिए कि कितनी संख्या में मूड़ी बेचने वाले बेरोजगार हो जाएंगे।

इस नीति को लागू करने में समस्या विश्व व्यापार संगठन की है। अपने देश में आटोमेटिक लूम से बने कपड़े पर टैक्स बढ़ाने के साथ-साथ दूसरे देशों में आटोमेटिक लूम से बने कपड़े के आयात पर टैक्स बढ़ाना जरूरी होगा अन्यथा घरेलू छोटे उद्योग पिटेंगे, चूंकि आटोमेटिक मशीनों से निर्मित सस्ता विदेशी माल हमारे देश के बाजार में प्रवेश करेगा। हमारे बड़े घरेलू उद्योग भी पिटेंगे, चूंकि उन पर टैक्स का बोझ बढ़ेगा। डब्ल्यूटीओ के ढांचे में बेरोजगारी बढ़ रही है, चूंकि आटोमेटिक मशीनों से उत्पादन करने वाली कंपनियों को संपूर्ण विश्व के बाजारों में प्रवेश की खुली छूट मिल गई है। अमरीका में आधे अश्वेत युवक बेरोजगार हैं। अत: डब्ल्यूटीओ के मूल जनविरोधी चरित्र को चुनौती दिए बिना देश के आम आदमी को राहत नहीं मिलेगी।  सरकार इस मूल समस्या पर खामोश है। बीते बजट में सरकार ने बड़ी कंपनियों द्वारा सृजित नए रोजगारों पर तीन वर्ष के लिए इम्प्लायर द्वारा देय प्रोविडेंट फंड का योगदान सरकार द्वारा दिए जाने की घोषणा की है। यह कदम सही दिशा में है, परंतु फिर भी इसका असर ऊंट के मुंह में जीरा जैसा ही होगा। दुनिया की फैक्टरियां रोबोट से उत्पादन करने की ओर बढ़ रही हैं। इससे कोई अंतर नहीं पड़ेगा कि एक नए कर्मचारी को साल में एक लाख रुपए का वेतन दिया जाए अथवा इससे कुछ कम। सरकार तीन वर्षों तक 8,000 रुपए प्रतिवर्ष प्रोविडेंट फंड के दे, तो उद्यमी को तीन वर्ष में 24,000 रुपए की सबसिडी मिलेगी। इस छोटी रकम के लिए वह एक लाख रुपए प्रतिवर्ष के वेतन का लिए दीर्घ कालीन बोझ नहीं उठाएगा। सरकार ने मनरेगा पर 38,000 करोड़ रुपए के खर्च की करने की बात कही है। यह आंकड़ा भ्रामक है। 2009 में लगभग 34,000 करोड़ रुपए प्रति वर्ष इस योजना पर खर्च किया जा रहा था। पिछले छह वर्षों में महंगाई के प्रभावों को जोड़ लें तो उसी स्तर पर बनाए रखने के लिए मनरेगा पर खर्च लगभग 70,000 करोड़ होना चाहिए था। इसे घटाकर 38,000 कर दिया गया है। सरकार ने देश में कौशल विकास को विशेष तौर पर प्रोत्साहन दिया है। कहा है कि बीते समय में 76 लाख युवाओं को स्किल टे्रनिंग दी गई है, परंतु इससे देश के युवाओं पर कुछ सकारात्मक प्रभाव पड़ा हो, ऐसा नहीं दिखता है। पहला कारण है कि देश में कौशल विकास के नाम पर तमाम एनजीओ द्वारा कमाई की जा रही है। फर्जी स्किल डिवेलपमेंट किया जा रहा है।

दूसरा कारण है कि स्किल का डिवेलपमेंट हो जाए तो रोजगार बढऩे के स्थान पर घट सकते हैं। जैसे जेसीबी आपरेटर के कौशल का विकास किया जाए तो तालाब खोदने में लगे कर्मियों के रोजगार घटेंगे। तीसरा कारण है कि कौशल विकास में कुशल कर्मी को रोजगार मिल जाता है और कम कुशल कर्मी का रोजगार छिन जाता है। जैसे कपड़ा उद्योग में पांच पजामे प्रतिदिन सिलने वाले कर्मी को रोजगार मिलेगा और चार पजामे सिलने वाले को निकाल दिया जाएगा। उतने ही पजामे सिलने पर अब पांच के स्थान पर चार लोगों को रोजगार मिलेगा। कौशल विकास तभी कारगर होगा, जब साथ-साथ श्रम सघन रोजगारों को टैक्स में छूट दी जाएगी। जैसे आटोमेटिक लूम पर अत्यधिक, पावर लूम पर मध्यम और हैंडलूम पर शून्य टैक्स लगाया जाए, तब बुनाई में रोजगार बढ़ेंगे। पहले रोजगार सृजन को लाभकारी बनाने के बाद ही कौशल विकास लाभकारी होगा। सरकार ने नए नवोदय विद्यालयों को खोलने की घोषणा की है। देश में एक विशाल शिक्षा माफिया पहले ही कार्यरत है। इन्हें सरकार द्वारा भारी वेतन दिए जाते हैं, जिससे कि ये भारी संख्या में बच्चों को फेल कराएं। फिर बच्चे फेल हों यह सुनिश्चित करने के लिए उन्हें यूनिफार्म, किताबें और मध्याह्न भोजन का प्रलोभन दिया जाता है। इस संपूर्ण दुष्ट व्यवस्था को जड़ से समाप्त करके प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण के सिद्धांत के अनुसार सभी बच्चों को वाउचर देने चाहिए, जिससे वे मनचाहे विद्यालय में शिक्षा हासिल कर सकें। भाजपा सरकार ईमानदार दिखती है। मंशा सही दिशा में है परंतु सरकार के कान सरकारी कर्मियों द्वारा दी गई सलाह के प्रति खुले हैं और आम आदमी की आवाज के लिए बंद हैं। इसलिए रोजगार के लिए असफल योजनाएं बनाई जा रही हैं। रोजगार और छोटे धंधों की मूल समस्या पर मेक इन इंडिया का भूत सवार है।
-डा. भरत झुनझुनवाला