ऋषि दयानंद एवं आर्य समाज के स्वर्णिम इतिहास की दिव्य धरोहर भाग-2

  • 2016-07-08 13:30:23.0
  • अभिषेक कुमार

ऋषि दयानंद

11. एकादशम् स्वर्णिम अध्याय-राजनीति के शीर्षस्थ नेतृत्व का निर्माण:
महर्षि दयानंद 1875 में जब पूना गये तो महादेव गोविन्द रानाडे उनके शिष्य बने जिन्हें महर्षि ने ‘परोपकारिणी सभा’ में भी नियुक्त किया। इन्हीं रानाडे के राजनीतिक उत्तराधिकारी थे गोपालकृष्ण गोखले जो महात्मा गांधी के मार्गदर्शक के नाते सुप्रसिद्घ हुए।

12.द्वाद्वशम् स्वर्णिम अध्याय-गुरूकुल कांगड़ी हरिद्वार :
महर्षि दयानंद के प्रवचनों से प्रभावित होकर एक कुपथगामी युवक मुंशीराम 1879 में आर्यसमाज से जुड़ा और सन्मार्ग के पथ पर अग्रसर हुआ। 1888 में जालंधर में कन्या पाठशाला की स्थापना तथा 1880 में ‘संदर्भ प्रचारक’ साप्ताहिक पत्र का शुभारंभ मुंशीराम (बाद में श्रद्घानंद) द्वारा किया गया। जालंधर आर्य समाज के प्रधान रहते हुए मुंशीरामजी ने अछूत माने जाने वाली हिंदुओं की बड़ी संख्या को शुद्घ किया। मुंशीरामजी ने अपनी कोठी पर एक ईसाई लडक़ी का विवाह डा. गुरूदत्त से कराया जो उस समय एक क्रांतिकारी निर्णय का परिचायक बना। महात्मा मुंशीराम के रूप में अग्रसर होकर उन्होंने मार्च 1902 में गुरूकुल कांगड़ी की स्थापना की। बिजनौर जिले के नजीबाबाद के चौधरी मुंशी अमनसिंह जी ने 700 बीघा भूमि गुरूकुल कांगड़ी के लिए दान में दी जिसका पंजीकरण आर्य प्रतिनिधि सभा पंजाब के नाम अक्टूबर 1901 में किया गया। 26 मार्च 1902 (चैत्र कृष्ण प्रतिपदा सं. 1959) के पावन दिवस से गुरूकुल में अध्यापन कार्य प्रारंभ हुआ। प्रारंभिक छात्रों में मुंशीराम जी के पुत्र इंद्र व हरिश्चंद्र दोनों सम्मिलित थे। यही गुरूकुल बाद में गुरूकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय हरिद्वार के नाम से विख्यात हुआ। महात्मा मुंशीराम 1902 से 1917 तक इसके मुख्याधिष्ठाता रहे। 1917 में संन्यासदीक्षा लेकर वह स्वामी श्रद्घानंद बने।

13. त्रयोदशम् स्वर्णिम अध्याय-लाला लाजपतराय ‘शेरे पंजाब’ -
जब 1905 में लार्ड कर्जन ने बंगाल का विभाजन किया तो देशव्यापी आक्रोश उमड़ पड़ा जिसमें पंजाब अग्रणी रहा। आर्य समाज को माता एवं महर्षि दयानंद को पिता मानने वाले लाला लाजपतराय द्वारा बंगभग के विरूद्घ प्रचण्ड आंदोलन की सिंह गर्जना की गई तो सारा पंजाब धधक उठा और लाला लाजपत राय ‘शेरे पंजाब’ नाम से विख्यात हो गये। ब्रिटिश सरकार ने उन्हें तत्काल माण्डले जेल (बर्मा) में कैद कर दिया और आर्य समाजियों पर अत्याचारों का कहर बरपने लगा। बहुत से आर्य समाजी सरकारी नौकरी से अलग कर दिये गये। उस समय का स्वाधीनता संघर्ष का इतिहास ‘लाल बाल पाल’ के नाम से प्रसिद्घ हुआ। लाल अर्थात पंजाब  के लाला लाजपत राय, बाल अर्थात महाराष्ट्र के बाल गंगाधर तिलक और पाल अर्थात बंगाल के बिपिन चंद्रपाल।

14. चर्तुदशम् स्वर्णिम अध्याय-स्वामी श्रद्घानंद द्वारा रोलेट एक्ट बिल का प्रचण्ड विरोध :
1919 में ब्रिटिश सरकार ने रोलेट एक्ट बिल पारित किया तो उसका विरोध करने पर अमृतसर के जलियावाला बाग में सैकड़ों देशभक्तों का नरसंहार किया गया। दिल्ली के चांदनी चौक में स्वामी श्रद्घानंद के नेतृत्व में सत्याग्रह किया गया तो पुलिस ने बंदूकें तान दीं। तब स्वामी जी ने गरजते हुए कहा था ‘‘चला दो गोलियां, संन्यासी का सीना खुला है।’’ आज भी उस स्थान पर स्वामी श्रद्घानंद की मूर्ति सुशोभित है।

15. पंचमदशम् स्वर्णिम अध्याय-1921 का असहयोग आंदोलन :
1915 में मोहनदास करमचंद गांधी अफ्रीका से भारत आए तो गुरूकुल कांगड़ी हरिद्वार पहुंचे। यही वह समय था जब महात्मा मुंशीराम ने उन्हें महात्मा गांधी नाम से संबोधित किया। बाद में 1917 में मुंशीराम जब स्वामी श्रद्घानंद बने तो गांधीजी के साथ स्वाधीनता संग्राम में जुट गये। 1921 में असहयोग आंदोलन गांधीजी द्वारा संचालित किया गया तो अंग्रेजों की जेलें भर गयीं। सत्याग्रह में भाग लेने वाले कौन अधिक थे, इसके लिए कांग्रेस ने बाद में एक समिति बनाई जिसमें मोतीलाल नेहरू एवं मौलाना हसरत मुहानी थे। इस समिति की रिपोर्ट के अनुसार सत्याग्रह में भाग लेने वाले 70 प्रतिशत आर्य समाजी थे। आर्य समाजी महिला नेत्री भी बड़ी संख्या में जेल गयीं थीं। इस प्रकार प्रखर देशभक्ति का स्वत: प्रमाण आर्य समाज ने स्वाधीनता आंदोलन में प्रस्तुत किया।

16. षोडशम् (सोलहवां) स्वर्णिम अध्याय-सशस्त्र क्रांति में योगदान :
स्वराज्य प्राप्ति के लिए अहिंसक शांतिमय आंदोलन के साथ एक दूसरा प्रयत्न चल रहा था ‘सशस्त्र क्रांति अभियान’ जिसके प्रमुख अधिकांश संचालक आर्य समाज से ही प्रेरित थे। इंग्लैंड जाकर वहां अध्ययनरत भारतीय युवकों को राष्ट्रभक्ति से अनुप्राणित करने वाले श्याम जी कृष्ण वर्मा महर्षि दयानंद के ही शिष्य थे। 1905 में उन्होंने लंदन में इंडियन हाउस की स्थापना की तथा इंडियन होम रूल सोसाइटी नामक संस्था बनाकर ‘इंडियन सोशियोलोजिस्ट’ नाम मासिक पत्र का प्रकाशन भी किया। इसी क्रांति दर्शक, मार्गदर्शक प्रेरणास्रोत से जुड़े थे मदनलाल धींगरा, भाई परमानंद, लाला हरदयाल, स्वातंत्रयवीर विनायक दामोदर सावरकर, राजा महेन्द्र प्रताप आदि। अमर बलिदानी राम प्रसाद बिस्मिल, ठाकुर रोशन सिंह, राजेन्द्रसिंह लाहड़ी, विष्णुराय दुब्लिश, अशफाक उल्ला खां सरीखे क्रांतिकारियों को इस देशभक्ति की दीक्षा देने वाले थे शाहजहांपुर उत्तर प्रदेश आर्य समाज मंदिर के उपदेशक स्वामी सोमदेव जी। क्रांतिकारी भगतसिंह के पिता किशनसिंह व दादा किशनसिंह भी आर्य समाज के कार्यों में संलग्न थे।

17. सप्तदशम् स्वर्णिम अध्याय-आर्य समाज को सार्वदेशिक बनाने का सफल अभियान :
विश्व के शताधिक देशों में रहने वाले प्रवासी भारतीय भी आर्य समाज का संदेश सुनने के लिए व्याकुल हो उठे, कई देशों से मांग आई, कृपया आर्योपदेशक भेजिए। विदेश की धरती पर जाकर आर्य समाज की स्थापना करने वाले प्रथम उपदेशक बने भाई परमानंद जो 1906 में दक्षिण अफ्रीका गये। उनका प्रथम प्रवचन नेरोबी में सुनने वालों में एक थे मोहनदास करमचंद गांधी जो वहां तब वकालत कर रहे थे। प्रवचन सुनकर गांधीजी ने भाई जी से पूछा कि आपका प्रवचन यहां कितने दिन चलेगा? उत्तर मिला-एक महीना। तब गांधीजी ने कहा कि इस पूरे माह आप मेरे साथ ही निवास करेंगे। ऐसा कहकर भाईजी का सामान अपने कंधे पर उठाकर गांधीजी उन्हें अपने घर ले गये और प्रतिदिन वहीं से दोनों प्रवचन स्थल आते रहे। बैरिस्टर मोहनदास करमचंद गांधी जैसे बुद्घिजीवियों को भी हृदय स्पर्शी संदेश देने का कीर्तिमान बनाने वाले संगठन का नाम है ‘आर्य समाज’। दक्षिण अफ्रीका के बाद भाई परमानंद सुरिनाम, ब्रिटिश गायना, अमेरिका आदि कई देशों में वैदिक धर्म के प्रचार हेतु गये। अमेरिका प्रवास में उन्हीं की प्रेरणा से बनी गदर पार्टी जिसने भारत को विदेशी दासता से मुक्त कराने का अविरल अभियान चलाया। भाईजी ने ‘भारत का इतिहास’ पुस्तक भी लिखी जिसे लाहौर में भाई जी के निवास से जब्त कर लिया गया। इसके लिए भाई जी को अण्डमान के कालापानी कारागार में भी 1915 से 1921 तक यातनाएं भुगतनी पड़ीं।

18. अष्टादशम् स्वर्णिम अध्याय-सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा का निर्माण :
विश्व में अनेक देशों में आर्य समाज की ईकाईयां निर्मित होने पर संपूर्ण विश्व के लिए केन्द्रीय संगठन का नामकरण किया गया ‘सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा’ (1911 ई. में पंजीकृत) जिसके निर्देशन में आज शताधिक देशों में विधिवत संचालित आर्य समाज ईकाइयां वैदिक धर्म के प्रचार-प्रसार में संलग्न हैं।