विशुद्घ राष्ट्रवादी चिंतन के धनी थे बाबा साहेब

  • 2016-04-26 05:00:59.0
  • कारूराम

बाबा साहेब

भारत का यह सौभाग्य ही कहा जाएगा कि इस पवित्र धरती पर कितनी ही महान विभूतियों ने समय-समय पर जन्म लेकर मानवता का भला किया है। ऐसे नररत्नों में से ही एक थे डा. भीमराव अंबेडकर। कांग्रेस ने इस महान विभूति को अपने यहां केवल किसी जाति या वर्ग विशेष तक सीमित करके स्थापित किया और कांग्रेस अपनी इस सोच में सफल भी हो गयी कि समाज में भी बाबा साहेब को किसी जाति या वर्ग विशेष का ही नेता मान लिया गया। कांग्रेस ने ‘वोट बैंक’ के लिए यह खेल खेला और बाबा साहेब को एससी/एसटी की वोट पाने के लिए उसने प्रयोग किया। कांग्रेस ने यह कार्य केवल वोट की राजनीति के लिए ही किया हो ऐसा भी नही है, उसने यह कार्य इसलिए भी किया कि राष्ट्रीय नेताओं के रूप में तो उसे नेहरू, गांधी, इंदिरा, राजीव को ही प्रयोग करना था, अब जो शेष राष्ट्रीय प्रतिभाएं उसके पास बचीं उन्हें कहां प्रयोग किया जाए, तो उन्हें जाति-क्षेत्र, वर्ग, समुदाय, संप्रदाय आदि को अपने साथ जोड़े रखने के लिए कांग्रेस के द्वारा प्रयोग किया जाने लगा। कांग्रेस की इस सोच को लोगों ने समझने में देर की।

अब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी ने इसे समझने और समझाने का प्रयास किया है। उन्होंने इस बात को गहराई से समझा है कि बड़े नेताओं को राष्ट्रीय नेता के रूप में स्थापित न करके किसी वर्ग विशेष का नेता दिखाकर हमारी सांस्कृतिक एकता को धक्का लगा है, और सामाजिक परिवेश में लोगों ने राष्ट्रीय नेताओं को लेकर विद्वेषभाव का प्रदर्शन करना भी आरंभ कर दिया है। जिससे लोगों को देश में सामाजिक समरसता को बनाये रखने में कठिनाई का सामना करना पड़ रहा है, इसलिए बाबा साहेब को उनका राष्ट्रीय स्थान दिलाने के लिए मोदी जी ‘सामाजिक इंजीनियरिंग’ की वह सोच काम कर रही है-जिसके अंतर्गत वह देश में सामाजिक विषमताओं को मिटाकर समानता पर आधारित एक समरसतापूर्ण समाज की संरचना करने का संकल्प लेकर चल रहे हंै। यही कारण है कि बाबा साहेब को उन्होंने ‘वोट बैंक’ बढ़ाओ वाले स्थान से ऊपर उठाकर उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित करने की पहल की है, जिसकी सराहना करना हर नागरिक का कत्र्तव्य है। ऐसा नही है कि ‘वोट बैंक बढ़ाओ’ की घातक सोच से कांग्रेस ही  ग्रस्त थी या है, उसकी देखा-देखी इसी मार्ग का अनुकरण सपा, बसपा सहित अन्य पार्टियों ने भी किया है। जिससे बाबा साहेब जैसे युगपुरूषों के चिंतन पर शोध करने की प्रक्रिया अवरूद्घ हो गयी और उन्हें पूर्णत: एक जातिवादी नेता बना दिया गया।

ऐसी घातक सोच बाबा साहेब जैसे प्रतिभा संपन्न महान नेता के साथ सरासर अन्याय है। अब पीएम मोदी साहब ने इसी अन्याय से पर्दा उठाने का साहस किया है, इस साहस को चूंकि हमारे प्रधानमंत्री द्वारा सकारात्मक सोच के साथ न्यायपूर्ण ढंग से किया गया है, इसलिए कांग्रेस और बसपा जैसी पार्टियों के पेट में अनावश्यक ही दर्द होने लगा है।

बाबा साहेब ने अपने जीवन काल में कांग्रेस की मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति का विरोध किया था जब उन्होंने देखा कि कांग्रेस मुस्लिम तुष्टिकरण करते-करते हिंदू समाज के अपरिहार्य अंग अनुसूचित जाति-जनजाति की घोर उपेक्षा कर रही है। तब उन्हें लगा था कि कांग्रेस की यह सोच समाज के उस वर्ग की प्रतिनिधि सोच है जो अस्पृश्यता और ऊंच-नीच को समाज में बनाये रखना चाहती है।  इसी को लोगों कांग्रेस का ब्रह्मवाद कहा है। अपनी पुस्तक ‘थॉट्स ऑन पाकिस्तान’ में वह लिखते हैं :-‘‘क्या हिंदू शासक जाति ने जो हिंदू राजनीति पर अपना नियंत्रण रखती है अस्पृश्य और शूद्रों के हितों की अपेक्षा मुसलमानों के निहित स्वार्थों की सुरक्षा पर अधिक ध्यान नही दिया है? क्या श्री गांधी अस्पृश्यों को तो कोई भी राजनीतिक लाभ देने का विरोध करते हैं, लेकिन मुसलमानों के पक्ष में वे एक कोरे चैक पर हस्ताक्षर करने के लिए तैयार नही हैं क्या? वास्तव में हिंदू शासक जाति अस्पृश्यों तथा शूद्रों के साथ शासन में भाग लेने की अधिक तत्पर दिखायी देती है?’’

वास्तव में कांग्रेस की अस्पृश्यों के प्रति उपेक्षापूर्ण और मुस्लिमों के प्रति तुष्टिकरण की नीति ने ही बाबा साहेब को सर्वाधिक आहत किया था वह अस्पृश्यों को हिंदू जाति का एक आवश्यक और आदरणीय अंग मानने मनवाने के समर्थक थे और हिंदू समाज व भारत देश की एकता के लिए यही उचित मार्ग भी था। पर कांग्रेस अंबेडकरजी की भावनाओं को न समझकर अपनी मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति में आगे बढ़ती चली गयी। आज की स्थिति यह है कि अस्पृश्यों को हिंदू समाज से काटकर उन्हें किसी अन्य संप्रदाय के साथ पिछलग्गू बनाकर देश की एकता और अखण्डता को चूर-चूर करने में लगी शक्तियां हमारी सामाजिक समरसता को भंग करना चाहती हैं। जिसे मोदी जी भली प्रकार समझ रहे हैं। ऐसी घातक शक्तियों के प्रयास को सिरे चढऩे से रोकने के लिए प्रधानमंत्री महोदय अपने सामाजिक प्रबंधन को शक्ति संपन्न बनाने के लिए बाबा साहेब के विचारों को सर्वाधिक उपयुक्त और प्रासंगिक मानते हैं। इस प्रकार मोदी जी के अंबेडकर प्रेम व कांग्रेस एवं अन्य पार्टियों के अंबेडकर प्रेम में जमीन आसमान का अंतर है।

डा. अंबेडकर ने गांधीजी को मुस्लिम तुष्टिकरण से बचने की सलाह दी थी, परंतु गांधीजी और उनकी कांग्रेस ने देश का साम्प्रदायिक आधार पर बंटवारा कराके ही दम लिया। इस प्रकार कांग्रेस का मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति परास्त हो गयी। स्पष्ट था कि अपनी नीतिगत पराजय पर कांग्रेस को फिर नये सिरे से सोचना चाहिए था। पर वह अपनी तुष्टिकरण की पुरानी लीक पर ही चलती रही। जबकि अंबेडकरजी का मत था कि यदि साम्प्रदायिक आधार पर बंटवारा हो ही रहा है और नये देश का नाम पाकिस्तान प्रस्तावित कर दिया गया है तो अपने देश का नाम अब हिंदुस्तान होना चाहिए, साथ ही आबादी का पूर्ण तबादला यानि पाकिस्तान में कोई हिंदू न रहे और भारत में कोई मुस्लिम न रहे होना चाहिए। यदि अंबेडकरजी की यह बात मान ली जाती तो पाकिस्तान में रहने वाले हिंदुओं के साथ पिछले 70 वर्ष में जो कुछ हुआ है, उस दानवीय गाथा को दोहराने से रोका जा सकता था। जहां तक अंबेडकरजी के आरक्षण संबंधी विचारों का प्रश्न है तो उन्होंने यह दबे कुचले, दलित शोषित समाज को आगे लाने के लिए किया था। जिसे देने में किसी को कोई आपत्ति नही होनी चाहिए। परंतु आरक्षण की इस व्यवस्था को देश में इस प्रकार लागू किया गया है कि वास्तविक पात्र व्यक्ति को अब इससे वंचित सा कर दिया गया है। कुछ लोग जाति-बिरादरी के नाम पर लोगों का शोषण कर रहे हैं, और सारी सरकारी सुविधाओं का लाभ उठा रहे हैं। यदि उन्हें छेडऩे का प्रयास किया जाता है तो वे अपने जाति-बिरादरी के लोगों को भडक़ाकर आगे ले आते हैं। आज के समाज की यह जटिल व्यवस्था है, जिसे अंबेडकर जी के नाम पर जारी किया जा रहा है। अपनी शुद्घ राष्ट्रवादी सोच के अनुसार बाबा साहेब धीरे-धीरे समाज को जाति विहीन कर बराबरी के स्तर पर लाना चाहते थे-पर लोगों ने इसका उल्टा कर दिया है। प्रधानमंत्री मोदी जी इसी बात को लेकर चिंतित हैं कि जाति विहीन समाज की रचना करते हुए वास्तविक पात्र व्यक्ति के लिए आरक्षण कैसे लागू किया जाए? वह चाहते हैं कि इसी संविधान के तहज इस प्रश्न का उत्तर खोला जाए। देश के संजीदा लोगों को अपने संजीदा प्रधानमंत्री के संजीदा प्रश्न का उत्तर खोजने में संजीदगी दिखानी चाहिए। समय को पहचानना समय की आवश्यकता है।
-के.राम