रक्षा क्षेत्र में भी आवश्यकता है मेक इन इंडिया की

  • 2016-03-11 09:30:06.0
  • पीके खुराना

हथियार के निर्यातक देशों में अमरीका अव्वल है और रूस दूसरे नंबर पर है। समस्या यह है कि जब हम हथियार आयात करते हैं तो हमारी बहुमूल्य विदेशी मुद्रा का क्षरण होता है। हथियार निर्यातक देश हमें पुरानी तकनीक के हथियार मढ़ देता है, फिर उन्हें अपग्रेड करने के नाम पर अलग से पैसे वसूलता है। हम पर तरह-तरह की शर्तें लाद देता है, जब चाहे हथियारों की कीमत बढ़ा देता है और रौब अलग से जमाता है। रक्षा उत्पादन में पिछडऩा हमारे लिए बड़ी चिंता का विषय है और हमें इस ओर तुरंत ध्यान देकर हथियारों के लिए विदेशी निर्भरता को कम करने के कदम उठाने होंगे.

भारतीय नेतागण हमेशा से कहते आए हैं कि पाकिस्तान आतंकवादियों का गढ़ और वहां जगह-जगह आतंकवादियों के लिए प्रशिक्षण शिविर चलते हैं। देश की विभिन्न सरकारों ने अतीत में कई बार इसके पुख्ता सुबूत पाकिस्तान सरकार को दिए हैं और उसे इन आतंकवादियों का सफाया करने का आग्रह किया है। पठानकोट स्थिति एक फौजी कैंप में पाकिस्तानी आतंकवादियों की हालिया घुसपैठ ने पूरे देश को हिला कर रख दिया था। उसके बाद भारत सरकार ने एक बार फिर पाकिस्तान सरकार को आगाह किया कि वह इन आतंकवादी गतिविधियों पर अंकुश लगाए। जवाब में नवाज शरीफ के नेतृत्व वाली वर्तमान पाकिस्तान सरकार ने कुछ कदम उठाए हैं, लेकिन अब वहां का मीडिया इसे अपनी सरकार की कमजोरी मानकर प्रधानमंत्री नवाज शरीफ की आलोचना कर रहा है।

मेक इन इंडिया

आतंकवाद के सफाए में पाकिस्तान सरकार का रवैया ढुलमुल भरा रहा है और वह भारत में आतंकवादी गतिविधियों में पाकिस्तानी आतंकवादियों, पाकिस्तानी फौज और आईएसआई (इंटर सर्विसिज इंटेलिजेंस) की किसी भूमिका से साफ-साफ इनकार करती रही है। लेकिन अब पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय में प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के विदेशी मामलों के सलाहकार सरताज अजीज ने वाशिंगटन में कुछ रक्षा विशेषज्ञों के बीच बोलते हुए बताया है कि पाकिस्तान और अफगानिस्तान की सीमा पर स्थित पाकिस्तान का उत्तरी वजीरीस्तान का इलाका आतंकवादियों का गढ़ है, जहां आतंकवादियों के प्रशिक्षण केंद्र चलते थे और आत्मघाती हमलावरों को तैयार किया जाता था। वहां बम बनाने के इतने कारखाने थे जो सारे दक्षिण एशिया में अगले दो दशक तक आतंकवादी कार्रवाइयों को अंजाम देने के लिए काफी थे। सरताज अजीज ने जानकारी दी है कि जब वह मीरांशाह की एक मस्जिद में गए तो उन्होंने देखा कि मस्जिद की बेसमेंट में 70 कमरे हैं और उस तीन मंजिला मस्जिद के कई कमरों में बम बनाने के चार-पांच कारखाने चल रहे थे।

यह हाल उस अकेली मस्जिद का नहीं था, बल्कि उस क्षेत्र की 30-40 मस्जिदों में आतंकवादियों के लिए नई तकनीक से युक्त हरसंभव सुविधा मौजूद थी। सन् 2014 में पाकिस्तानी फौज ने एक कार्रवाई के तहत इस क्षेत्र में लगभग दस हजार आतंकवादियों को मार गिराया था। लेकिन पाकिस्तान के पंजाब और कश्मीर क्षेत्र में अब फिर आतंकवादी शक्ति संपन्न हो गए हैं और भारत ही नहीं, खुद पाकिस्तान में भी आतंकवादी गतिविधियों को अंजाम दे रहे हैं। पाकिस्तान सरकार ने इनके उन्मूलन के लिए कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं की है और उन्हें फौज का संरक्षण मिलना भी बंद नहीं हुआ है। भारतवर्ष के लिए यह चिंता का विषय है।

याद रखना चाहिए कि सरताज अजीज पाकिस्तान के बुजुर्ग और अनुभवी राजनेता हैं और 85 साल की उम्र में भी उनकी सक्रियता में कोई कमी नहीं आई है। वह जाने-माने अर्थशास्त्री, राजनेता और रणनीतिकार हैं और विदेश मंत्री ही नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार भी रह चुके हैं और अब भी उनका पद विदेश मंत्री के बराबर का है। इतने वरिष्ठ और जिम्मेदार राजनेता का यह खुलासा बहुत महत्त्वपूर्ण है।

भारत सरकार को उनके इस बयान से न केवल चौकन्ना हो जाना चाहिए, बल्कि अपने हक में इसका अधिक से अधिक उपयोग करना चाहिए, ताकि पाकिस्तानी सरकार और मीडिया पर उचित दबाव बन सके। इसी संदर्भ में एक और तथ्य की ओर भी ध्यान देने की आवश्यकता है। भारतवर्ष एक लंबे समय से दुनिया में हथियारों का सबसे बड़ा खरीददार बना हुआ है। यहां तक कि हम चीन से भी तीन गुना ज्यादा हथियार आयात कर रहे हैं और स्टाकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीच्यूट की रिपोर्ट के मुताबिक सन् 2011 से 2015 के पांच सालों के दौरान हमने विश्व भर के लगभग 14 प्रतिशत हथियार आयात किए और हथियार आयातक देशों में हम सबसे ऊपर हैं। इससे आपको लगता होगा कि हमारी सरकारें देश की सुरक्षा के प्रति बहुत जागरूक हैं, जबकि असलियत इसके विपरीत है। सब जानते हैं कि चीन की सेना हमसे कहीं अधिक शक्तिशाली है। उसके पास उपलब्ध तकनीक हमारी तकनीक से कहीं ज्यादा उन्नत है और भारत-चीन सीमा पर चीनी सुरक्षा के इंतजाम कहीं ज्यादा रणनीतिगत और पुख्ता हैं। चीन ने सीमा पर परिवहन का मजबूत जाल बिछाया है। सेना को मौसम के अनुसार प्रशिक्षित किया है और जमीन ही नहीं, सागर में भी अपनी रणनीतिक स्थिति को मजबूत बनाते हुए भारतवर्ष को चारों तरफ से घेर रखा है। भारतवर्ष और चीन में एक ही फर्क है और वह यह है कि चीन ने अपने ही देश में हथियारों का उत्पादन आरंभ किया और अपनी तकनीक में विकास करता चला गया। परिणामस्वरूप वह हथियारों के आयात के आंकड़ों में तो हमसे पीछे है, लेकिन सुरक्षा को लेकर आत्मनिर्भरता के मामले में वह हमसे बहुत-बहुत आगे है।

हथियार के निर्यातक देशों में अमरीका अव्वल है और रूस दूसरे नंबर पर है। समस्या यह है कि जब हम हथियार आयात करते हैं तो हमारी बहुमूल्य विदेशी मुद्रा का क्षरण होता है। हथियार निर्यातक देश हमें पुरानी तकनीक के हथियार मढ़ देता है, फिर उन्हें अपग्रेड करने के नाम पर अलग से पैसे वसूलता है।

हम पर तरह-तरह की शर्तें लाद देता है, जब चाहे हथियारों की कीमत बढ़ा देता है और रौब अलग से जमाता है। रक्षा उत्पादन में पिछडऩा हमारे लिए बड़ी चिंता का विषय है और हमें इस ओर तुरंत ध्यान देकर हथियारों के लिए विदेशी निर्भरता को कम करने के कदम उठाने होंगे। एक निश्चित योजना पर काम करना होगा और हर साल हथियारों के आयात को नियंत्रित करना होगा, तभी हम सुरक्षा के मामले में आत्मनिर्भर हो पाएंगे।

प्रधानमंत्री का ‘मेक इन इंडिया’ का नारा रक्षा क्षेत्र में तुरंत लागू होना चाहिए, बल्कि हमें  ‘मेड इन इंडिया’ (भारत में निर्मित) और ‘मेक इन इंडिया’ (भारत में निर्माण) से भी आगे बढक़र ‘मेड बाई इंडिया’ (भारत द्वारा निर्मित) की नीति पर काम करना चाहिए। भारत का विकास तभी होगा। हथियारों का निर्माण अपने ही देश में होने से हमारी विदेशी मुद्रा बचेगी, हथियार उन्नत होंगे लेकिन उन पर होने वाला खर्च घट जाएगा।

हमें विदेशी कंपनियों और सरकारों की धौंस से मुक्ति मिलेगी और हम न केवल विदेशी आक्रमण, बल्कि आतंकवाद के मुकाबले के लिए भी अधिक तैयार हो सकेंगे। यह देश की सुरक्षा का विषय है और इसे उसी गंभीरता से लिया जाना चाहिए, जिसका कि यह हकदार है। मोदी सरकार ने कई क्षेत्रों में अच्छी पहल की है, लेकिन रक्षा क्षेत्र में किसी ठोस पहलकदमी का हमें अभी भी इंतजार है। आशा करनी चाहिए कि हमारी सरकार इस ओर तुरंत आवश्यक ध्यान देगी।
-पीके खुराना