राजनीति: इस्लामिक स्टेट और भारत

  • 2016-02-10 06:30:35.0
  • उगता भारत ब्यूरो

संजीव पांडेय

गणतंत्र दिवस से ठीक पहले इस्लामिक स्टेट से जुड़ाव रखने वाले कुछ संदिग्ध युवकों को भारतीय जांच एजेंसियों ने पकड़ लिया। देश के कई राज्यों से कुल चौदह लोगों को जांच एजेंसियों ने गिरफ्तार किया, जो गणतंत्र दिवस पर कोई वारदात करने की फिराक में थे। ये गिरफ्तारियां कर्नाटक, महाराष्ट्र, हैदराबाद, उतर प्रदेश आदि राज्यों से हुईं। इन गिरफ्तारियों ने संकेत दिए कि इंडियन मुजाहिदीन जैसे संगठनों का नेटवर्क अब इस्लामिक स्टेट की तरफ जा चुका है। वहीं भारत में पढ़े-लिखे युवाओं का एक नेटवर्कभी तैयार करने में इस्लामिक स्टेट सफल हो चुका है। इन गिरफ्तारियों से पहले भी कुछ युवाओं के सीरिया जाने की खबर आई थी। ये युवा भी पढ़े-लिखे थे और सीरिया में इस्लामिक स्टेट के लिए लड़ाई लडऩे गए थे। जबकि एक दो भारतीय महिलाएं भी ट्विटर और फेसबुक पर इस्लामिक स्टेट के लिए काम करते नजर आईं। एक महिला भारतीय जांच एजेंसियों की गिरफ्त में है। मामले की गंभीरता देख केंद्रीय गृहमंत्री ने मुसलिम संगठनों और धर्मगुरुओं की बैठक बुलाई और उनसे इन आतंकी संगठनों के फैलते प्रभाव को रोकने में सहायता मांगी।

इस्लामिक स्टेट की रणनीति भारत में वही है जो पाकिस्तान और अफगानिस्तान में उसने अपनाई है। पाकिस्तान और अफगानिस्तान में स्थानीय आतंकी गुटों को इस्लामिक स्टेट ने अपने साथ मिलाया है। ये आतंकी गुट कथित जिहाद से ज्यादा इस्लामिक स्टेट की मजबूत आर्थिक स्थिति के कारण उधर गए हैं। अफगानिस्तान के पूर्वी राज्यों में तालिबान के कई कमांडर इस्लामिक स्टेट के साथ हो गए हैं। वहीं पाकिस्तानी तालिबान का हाफिज खान सईद इस्लामिक स्टेट की खुरासान शाखा का प्रमुख हो गया है। यह इस्लामिक स्टेट का ‘फ्रेंचाइजी मॉडल’ है। इस मॉडल का इस्तेमाल पहले अलकायदा ने किया था। अलकायदा ने किसी जमाने में इस्लामिक स्टेट को इराक और सीरिया में अपना फ्रेंचाइजी बनाया था। लेकिन इस्लामिक स्टेट ने बाद में अलकायदा से विद्रोह कर दिया।isis terrorist

अफ्रीका में अलकायदा इन इस्लामिक मगरेब अलकायदा का सहयोगी संगठन है, जबकि यमन में अलकायदा इन अरबियन पेनसुला। इस्लामिक स्टेट भारत में इंडियन मुजाहिदीन और सिमी के सदस्यों पर नजर रखे है। शुरुआती दौर में इनसे जुड़े हुए लोग ही इस्लामिक स्टेट के लिए काम करते नजर आए हैं। कर्नाटक के भटकल से संबंधित लडक़े पहले सिमी और इंडियन मुजाहिदीन के लिए काम कर रहे थे। रियाज भटकल, यासिन भटकल के बाद अब भटकल से ही जुड़े सुल्तान अरमार और उसके भाई शफी अरमार का नाम सामने आया है।

भारत में इस्लामिक स्टेट के जिस ढांचे का खुलासा अब तक जांच एजेंसियों ने किया है, उसमें कई पढ़े-लिखे युवक भी शामिल हैं। यह भारत के लिए खतरे की घंटी है। इस्लामिक स्टेट ने यूरोप की तर्ज पर भारत में अपना जाल फैलाने की कोशिश की है। यह उसके प्रचारतंत्र की भी एक झलक है। भारत को पहले से सतर्क होना चाहिए था। क्योंकि इस्लामिक स्टेट तालिबान की तरह सिर्फ पख्तून पहचान वाला आतंकी संगठन नहीं है। इस्लामिक स्टेट ने सबसे पहले यूरोप को अपना निशाना बनाया। तीन साल में ही यूरोप के अंदर पढ़े-लिखे युवक-युवतियों का एक बड़ा ग्रुप इस्लामिक स्टेट ने तैयार कर लिया। इसमें उसके प्रचारतंत्र का खासा हाथ था। पश्चिम के ही ईजाद किए सोशल साइटों के माध्यम से इस्लामिक स्टेट ने यूरोप में पैर पसारे। ब्रिटेन और फ्रांस में एशियाई और अफ्रीकी मूल के युवक-युवतियां इस्लामिक स्टेट के कैडर बनते नजर आए। दुनिया तब हैरान रह गई जब ब्रिटेन में जनमी, पली, बढ़ी और पढ़ी पाकिस्तानी मूल की अक्सा महमूद इस्लामिक स्टेट के प्रभाव में सीरिया चली गई। अक्सा महसूद रेडियोथेरेपी की छात्रा थी, जिसके पिता को यह कल्पना तक नहीं थी कि आधुनिक शिक्षा लेने वाली बेटी रेडिकल इस्लामिक के प्रभाव में है। अक्सा महमूद इस्लामिक स्टेट के सोशल साइट प्रचारतंत्र की प्रमुख बनी और ब्रिटेन के खिलाफ जिहाद की घोषणा करती रही। लेकिन भारतीय सुरक्षा एजेंसियां तब चौकन्नी हुईं जब कराची में इस्लामिक स्टेट के अमीर कैडरों को पाकिस्तानी सुरक्षा एजेंसियों ने गिरफ्तार किया। ये कैडर यूरोप और अमेरिका में पढ़े हुए थे और इन्होंने कराची में अल्पसंख्यक शियाओं की हत्या करवाई। भारत सरकार को इस्लामिक स्टेट के प्रचारतंत्र का जवाब देना होगा। क्योंकि भारतीय पढ़े-लिखे युवा अगर प्रभाव में आ रहे है तो यह चिंता का विषय है। इस्लामिक स्टेट के लिए भारत में काम करने वाले युवक सोशल साइटों का उपयोग कर रहे हैं। यह जांच एजेंसियों को पहले से पता था। लेकिन उनका ध्यान तब गया जब इस्लामिक स्टेट पाकिस्तान तक पहुंच गया। यूरोपीय देशों ने भी यूरोप में इस्लामिक स्टेट के प्रभाव को शुरुआती दौर में हल्के में लिया था। लेकिन जब सैकड़ों युवक-युवतियां सीरिया पहुंच गए तो यूरोपीय देशों की नींद हराम हो गई। नई सूचना तकनीक का बेहतर इस्तेमाल इस्लामिक स्टेट कर रहा है। यही जांच एजेंसियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती है। दुनिया भर की जांच एजेंसियां फेसबुक और ट्विटर के माध्यम से आतंकी गुटों को पकडऩे और मारने में कामयाब हो रही हैं। अभी तक अमेरिकी सुरक्षा एजेंसियां फेसबुक और ट्विटर की सहायता से बड़ी खुफिया कामयाबी हासिल कर रही थीं। अब एक दूसरी सच्चाई भी सामने आई है। फेसबुक और ट्विटर के माध्यम से इस्लामिक स्टेट ने पूरे विश्व में अपना प्रभाव बढ़ा लिया है।

सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि अगर फेसुबक और ट्विटर न होता तो इतनी जल्दी इस्लामिक स्टेट यूरोप तक नहीं पहुंचता। जो तकनीक सुरक्षा एजेंसियां अपने हित में इस्तेमाल कर रही थीं, उसी का बेहतर इस्तेमाल कर आतंकी संगठनों ने सुरक्षा एजेंसियों को चुनौती दी है। भारत के लिए यह बड़ी चुनौती है। भारत में इस्लामिक स्टेट के समर्थकों ने बड़े पैमाने पर फेसबुक और ट्विटर का इस्तेमाल किया है। इस्लामिक स्टेट के भारत के सरगना शफी अरमार ने फेसबुक और ट्विटर पर मुल्ला, मौलाना, पंडित, शेखू और पुजारी नाम से कई एकाउंट बनाए हैं। सुरक्षा एजेंसियों को इस प्रचार खुद से निपटना होगा।

भारत उदारवादी इस्लाम का केंद्र रहा है। भारत में सलाफी इस्लाम के बजाय सूफी इस्लाम का प्रभाव रहा है। यहां तक की भारत में देवबंदी जिन्हें काफी कट््टर माना जाता रहा है, वे भी व्यावहारिक रूप से उदारवादी इस्लाम के पक्षधर रहे हैं। यही नहीं, पाकिस्तान में भी तमाम प्रयासों के बावजूद उदारवादी इस्लाम प्रभावी रहा है। हालांकि पाकिस्तान में देवबंदी मदरसे आतंकियों की नर्सरी बन गए, लेकिन वे बहुतायत मुसलमानों को अपने प्रभाव में नहीं ले सके। पाकिस्तान में चार बड़े देवबंदी मदरसे हैं, जो 1980 के बाद आतंक की नर्सरी बन गए। इन देवबंदी मदरसों से निकले युवक अफगान-तालिबान में कमांडर बने। जबकि कई युवक इन मदरसों से निकल पाकिस्तानी तालिबान के कमांडर बन गए। मौलाना मसूद अजहर जैसे आतंकी भी देवबंदी मदरसे की देन हैं। लेकिन पाकिस्तान में भी समाज और उलेमाओं का बड़ा तबका कट्टरतावाद का विरोध कर रहा है। हाल ही में पाकिस्तान के सर्वोच्च सरकारी धार्मिक संगठन इस्लामिक विचारधारा परिषद की बैठक में उलेमाओं के एक बडे तबके ने ईशनिंदा कानून में संशोधन की मांग की, क्योंकि अल्पसंख्यकों के खिलाफ इस कानून के दुरुपयोग की शिकायतें लगातार आती रही हैं। आज भारतीय मुसलिम धर्मगुरुओं के सामने भी परेशानी की स्थिति पैदा हो गई है। क्योंकि ज्यादातर धर्मगुरुउदारवादी इस्लाम के पक्षधर है। इनके सामने दिग्रभमित युवाओं को रोकना एक बड़ी चुनौती है, इसमें वे हिंदुओं से भी सहयोग की अपेक्षा रखते हैं। क्योंकि भारत में आज भी इस्लाम की उदारवादी परंपरा समृद्ध है। सच्चाई तो यही है कि मुगलों ने भी सलाफी इस्लाम को नहीं बढ़ाया। मुगलों के समय में भी हिंदू-मुसलिम एकता के लिए मुगल शासकों ने सूफी परंपरा को तरजीह दी और उसे आगे बढ़ाया। अजमेर से लेकर फतेहपुर सीकरी तक के दरगाह मुसलमानों के साथ-साथ हिंदुओं के लिए भी आज तक श्रद्धा के केंद्र हैं।