राज का विकास, पंचायती का ह्यस सुधार जरूरी

  • 2015-11-28 05:55:49.0
  • उगता भारत ब्यूरो

अरुण तिवारी
अपने नये पंचायती राज की उम्र 22 साल, सात महीने से कुछ दिन अधिक की ही हो गई है। आगे की दिशा निश्चित करने के लिए जरूरी है कि पंचायती राज के अभिभावक, आकलन करें। बतौर मानक, तीन कहानियां हमारे सामने हैं: केरल के सरपंच इलिंगों की कहानी, अलगू चैधरी व जुम्मन मियां की कहानी तथा राजस्थान के जिला अलवर में बनी अरवरी नदी के 70 गांवों की संसद की कहानी। ये तीन कहानियां, हमारे सामने क्रमश: तीन आईने रखती हैं: पहला, 73वां संविधान संशोधन का आईना और दूसरा, भारत की पारम्परिक पंच-परमेश्वरी अवधारणा का आइना और तीसरा, महात्मा गांधी से लेकर वर्तमान प्रधानमंत्री मोदी तक दिए बयानों का आईना। यदि 73वें संशोधन द्वारा प्रदत पंचायती राज प्रावधानों को सामने रखें, तो केरल और पश्चिम बंगाल के पंचायतीराज अधिनियमों को क्रमश: एक व दो स्थान पर रखा जा सकता है। इन्होने, 1996 में सेन समिति द्वारा की संस्तुतियों को काफी हद तक लागू किया है। केरल में लाइसेंस, कराधान तथा ग्रामीण विकास संबंधी अधिकारी तथा एजेंसियां, पंचायतों के नियंत्रण में कर दी गई हैं। एकीकृत अभियांत्रिकी संवर्ग है। अपीलीय प्राधिकरण है। सरकारी अधिकारियों पर पंचायत का अधिकार है। पंचायतें कम्पयुटरीकृत हैं। निर्वाचित प्रतिनिधियों को दूरस्थ शिक्षा प्रणाली से शिक्षित किया जाता है। ग्रामसभाओं को पंचायतों की समीक्षा और तद्नुसार निर्णय लेने के काफी अधिकार हैं। केन्द्र प्रायोजित सभी ग्राम विकास योजनायें, पंचायती राज प्रणाली द्वारा ही क्रियान्वित की जाती हैं।

व्यवहार की दृष्टि से पश्चिम बंगाल को अभी काफी सुधार करना है, किंतु अधिनियम के मोर्चे पर प. बंगाल काफी कुछ सिखाने लायक है। प. बंगाल में ग्राम पंचायत, ग्राम संसद के नाम व रूप में संचालित की जाती है। ग्राम संसद की सिफारिशों मानना, एक तरह की अनिवार्यता है। प्रत्येक ग्राम संसद, गांव के विकास के लिए ग्राम उन्नयन समिति का गठन करती है। यह समिति अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है। सभी समितियों के पास वित्तीय अधिकार हैं। वित्त समिति में विपक्ष का नेता भी सदस्य होता है। भू-राजस्व का अधिकार भी पंचायत के पास ही है। ग्रामसभा और पंचायतों को पर्याप्त विधायी अधिकार देने के बारे में आप नवगठित राज्य झारखण्ड की भी तारीफ कर सकते है। कर्नाटक, महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान, हरियाणा, पंजाब आदि को आप संतोषजनक श्रेणी में रख सकते हैं। उत्तर प्रदेश और उत्तराखण्ड से आप निराश हो सकते हैं। राज्यवार आकलन एक लंबे संर्वेक्षण व शोध का विषय है, किंतु कुछ निष्कर्ष ऐसे हैं, जो पूरे भारत में पंचायती राज की जमीनी हकीकत सामने रख देते हैं। कहने को आप कह सकते हैं कि 73वें संविधान संशोधन ने गांवों में सत्त्ता का नया जोश भरा। कितने जनप्रतिनिधि, ग्रामप्रधानी का सिरा पकङकर केन्द्र की राजनीति में पहुंचे। नारी शक्ति को सहज ही एक अवसर सुलभ हुआ। इसके कारण खासकर, स्वयं सहायता समूहों का प्रयोग कई जगह सफल रहा है। आज पंचायतों के पास धन की कोई कमी नहीं है। कितने ही कम अधिकार हों, लेकिन फिर भी पंचायतों के पास कुछ न कुछ विकास के अवसर हैं। कई पंचायतों ने सचमुच अच्छा कर दिखाया है, किंतु क्या संतुष्ट होने के लिए इतना भर काफी है ?

ग्रामसभा, पंचायती राज की आत्मा है और पंचायतें, उसका आवरण। आत्मा कभी मरती नहीं है, किंतु क्या वर्तमान पंचायती राज की आत्मा जिंदा है ? नहीं, ज्यादातर राज्यों में ग्रामसभाओं का कोई अता-पता नहीं है। विकास योजना बनाने वाली ग्रामसभाओं की संख्या उंगलियों पर गिनी जा सकती हैं। कितनी विडंबना है कि विश्वविद्यालयी पाठ्यक्रम में पंचायतीराज को पढऩे और पढ़ाने वाले भी ग्रामसभा की बैठकों में जाना जरूरी नहीं समझते ! मनरेगा ने ग्रामसभाओं को गांवों की विकास योजना बनाने से लेकर काम के चयन व निगरानी तक की जिम्मेदारी व अधिकार दिए हैं, किंतु ग्रामसभा से लेकर जिला स्तरीय सभाओं के निष्क्रिय व दिखावटी होने के चलते, ज्यादातर जगह पंचायतें ही प्रमुख हो गई हैं। लिहाजा, प्रधान, ब्लॉक प्रमुख और जिला पंचायत अध्यक्ष के पद महत्वपूर्ण हो गयो हैं। परिणामस्वरूप, पंचायत चुनावों में सारा जोर, इन्ही पदों के आस-पास चिपक कर रह गया है। पंचायती चुनाव, गांव समाज के आपसी सामजस्य और सद्भाव को तोङने का सबसे नुकीला औजार बन गये हैं। सरकारी अनुदान आधारित पंचायती कार्यप्रणाली, सिर्फ पंचायत प्रतिनिधियों को ही नहीं, बल्कि गांव समाज के आखिरी आदमी को भी भ्रष्ट बनाने वाली साबित हुई है। यह तो अन्तोदय होने की बजाय, भ्रष्टोदय हो गया !!

सच यह भी है कि पंचायतें, आज सरकारी विकास कार्यक्रमों की क्रियान्वयन एजेंसी मात्र बनकर रह गई हैं। पंचायत प्रतिनिधियों ने भी जनता की बजाय, सरकारी अधिकारियों की एजेंट की भूमिका स्वीकार ली है। उनमें भी अपने अधिकार, कर्तव्य तथा पंचायती राज की कार्यप्रणाली व मंशा के बारे में साक्षरता, शुचिता, कौशल व जिज्ञासा का अभाव है। परिणामस्वरूप, वे किसी के अच्छे व सक्षम एजेंट नहीं बन सके; न शासन के, न प्रशासन के और न ही गांव समाज के। प्रशासनिक विकेन्द्रीकरण की कोशिशें आज भी आधी-अधूरी ही हैं। लिहाजा, पंचायत के निर्णय, असल में नौकरशाही के निर्णय होकर रह गये हैं। हमारी ग्रामसभा और पंचायतें, ऊपरी तंत्र की बंधक बनकर रह गई हैं। वे जैसा नचाये, वैसा नाचती हैं; तो फिर स्वशासन की मंशा कहां पूरी हुई ? राज का विकास हुआ, पर पंचायती का तो ह्यस हो गया।

वर्तमान पंचायती राज, गांव समाज में स्थानीय सामुदाियक संसाधनों के प्रति स्वामित्व का भाव जगाने में असफल साबित हुआ है। महिला शक्तिकरण का दावे की पोल इसी से खुल जाती है कि ज्यादातर महिला प्रधानों के पति, न सिर्फ स्वयं का परिचय प्रधानपति कहकर देते हैं, बल्कि प्रधान के ज्यादातर कार्यों को अंजाम भी वही देते हैं। उत्तर प्रदेश के जिला और क्षेत्र पंचायत स्तरीय ताजा चुनाव को लेकर एक टी वी चैनल ने रिपोर्ट पेश की। ताज्जुब नहीं हुआ कि कितनी महिलाओं को उस क्षेत्र का नाम ही नहीं पता था, जिसका प्रतिनिधित्व करने के लिए वे नामांकन दाखिल कर रही थी। सब, पति के कहने पर आई थीं।

कहना न होगा कि वर्तमान पंचायतीराज प्रणाली की सारी की सारी सफलता, पंचायत प्रतिनिधि व विकास अधिकारियों की जागृति, ईमानदारी, कुशलता, विवेक, मंशा और सरकारी अनुदान की रहमोकरम पर आकर टिक गई है; जबकि प्रणाली वह अच्छी मानी जाती है, जिसमें व्यक्ति कैसा भी हो, प्रणाली उसे ईमानदारी, कुशलता, अच्छी मंशा, सद्विवेक, सक्षमता व स्वावलंबन के साथ कार्य करने को बाध्य करती हो।