पूर्वोत्तर में खुशहाली की बयार कैसे बहे?

  • 2016-03-17 06:30:54.0
  • उगता भारत ब्यूरो
पूर्वोत्तर में खुशहाली की बयार कैसे बहे?

देश में स्वर्णिम चतुर्भुज, उत्तर-दक्षिण और पूरब-पश्चिम कॉरिडोर बनने के बाद कार से लंबी दूरी तय करने वालों का एक नया वर्ग पैदा हुआ है। अब लांग ड्राइव के शौकीन भारतीयों के लिए कार से थाइलैंड, कंबोडिया, विएतनाम तक जाने की राह मुमकिन होने वाली है। इसकी शुरुआत पिछले हफ्ते हुई, जब भारत-म्यांमा-थाईलैंड सुपर हाइवे के कुछ हिस्सों पर गाडिय़ों की आवाजाही शुरू हो गई। 2016 के आखिर तक यह हाइवे पूरी तरह खुल जाएगा। पूरा होने पर बत्तीस सौ किलोमीटर लंबा यह हाइवे मोरेह (मणिपुर) से शुरू होकर म्यांमा के मांडले और यंगून होते हुए मेसोट (थाइलैंड) को जोड़ेगा।

भारत-म्यांमा-थाइलैंड सुपर हाइवे के निर्माण का विचार एक दशक पहले म्यांमा ने तीनों देशों के मंत्रिस्तरीय सम्मेलन में उठाया था। विश्व बैंक और एशियाई विकास बैंक के सहयोग से बनने वाला यह हाइवे पूर्वोत्तर राज्यों को दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों से जोडऩे के साथ-साथ व्यापार, निवेश, रोजगार जैसे कई फायदे पहुंचाएगा। इसके अलावा इस हाइवे से म्यांमा में थाईलैंड के सहयोग से विकसित डायई स्पेशल इकोनॉमिक जोन तक भारत की सीधी पहुंच बनेगी। गौरतलब है कि डायई बंदरगाह बंगाल की खाड़ी की दूसरी ओर स्थित है और यह चेन्नई से दो हजार किलोमीटर दूर है, तो बैंकाक से तीन सौ चालीस किलोमीटर। अभी तक भारत और थाइलैंड के बीच व्यापार थाइलैंड की खाड़ी में स्थित लेम चाबांग बंदरगाह से होता है, जिसमें हफ्ते भर का समय लगता है, लेकिन डायई बंदरगाह से यह दूरी कुछ दिनों में सिमट जाएगी। आगे चल कर यह कॉरिडोर नार्थ-साउथ कॉरिडोर से जुड़ जाएगा, जो दक्षिण चीन को म्यांमा, थाइलैंड और मलेशिया होते हुए सिंगापुर से जोड़ता है।

गौरतलब है कि दक्षेस यानी दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन की धीमी प्रगति से ऊब कर भारत ने 1990 के दशक में लुक ईस्ट नीति अपनाई थी। इस नीति के परिणाम सकारात्मक रहे। इसी को देखते हुए अब सरकार ऐक्ट ईस्ट नीति पर काम कर रही है। आसियान देशों के साथ कारोबार बढ़ाने के लिए भारत सरकार इन देशों के साथ वरीयता व्यापार, मुक्त व्यापार जैसे कई समझौते कर चुकी है और कई समझौते होने की प्रक्रिया में हैं। जहां अत्याधुनिक तकनीक के अलावा बड़े बाजार के चलते भारत के लिए आसियान देशों का विशेष महत्त्व है, वहीं आसियान देशों को भी अपने खाद्य तेल, समुद्री और तकनीकी उत्पादों के लिए भारत के विशाल बाजार की जरूरत है।

पूर्व की ओर देखो नीति की शुरुआत से ही भारत सरकार इन देशों के साथ स्थलीय संपर्क बनाना चाहती थी ताकि व्यापारिक गतिविधियों में तेजी आए, लेकिन कोई न कोई बाधा आ जाती थी। जैसे ही आसियान देशों के साथ संबंध सुधरने लगे, ये बाधाएं शिथिल होने लगीं। अब भारत सरकार इस हाइवे का विस्तार पूर्वी कॉरिडोर के रूप में करते हुए इसे लाओस, कंबोडिया होते हुए विएतनाम तक ले जाना चाहती है। अक्तूबर, 2011 में ब्रूनेई में संपन्न ग्यारहवें भारत-आसियान शिखर सम्मेलन में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इस हाइवे के विस्तार की पेशकश की थी, जिस पर सदस्य देशों ने अपनी मुहर लगा दी। पूरा होने के बाद यह कॉरिडोर यूरोप की वोल्गा नदी साबित होगा।

आसियान देशों ने 2025 तक एक आर्थिक समुदाय बनाने का लक्ष्य निर्धारित किया है। भले आसियान आर्थिक समुदाय की अर्थव्यवस्था का आकार यूरोपीय संघ जितना बड़ा नहीं है, लेकिन इस इलाके को हासिल जनांकीकीय लाभ को देखें तो यह इक्कीसवीं सदी को एशिया की सदी बनाने में एक अहम पड़ाव साबित होगा। फिलहाल भारत आसियान का चौथा बड़ा व्यापारिक साझीदार है और एक आर्थिक समुदाय बनने के बाद कारोबार में और अधिक बढ़ोतरी होगी, जिसका फायदा सभी देशों को होगा। कारोबारी नजरिए से देखें तो पूर्वोत्तर के पिछड़ेपन का कारण इस इलाके का चारों तरफ से जमीन से घिरा (स्थलाबद्ध) होना है। 1947 में भारत विभाजन से पहले तक पूर्वोत्तर का समूचा आर्थिक तंत्र चटगांव बंदरगाह से जुड़ा हुआ था, लेकिन बांग्लादेश के निर्माण ने इस क्षेत्र को वीराने में छोड़ दिया। अब पूर्वोत्तर को कोलकाता बंदरगाह का ही सहारा बचता है, जो बहुत दूर है और व्यस्त भी। पूर्वोत्तर भारत के आठ राज्यों के आर्थिक और सामाजिक विकास के लिए 1971 में पूर्वोत्तर परिषद का गठन एक केंद्रीय एजेंसी के रूप में किया गया। इसी तरह 1995 में नार्थ ईस्टर्न डेवलपमेंट फाइनेंस कॉरपोरेशन लिमिटेड और 2001 में उत्तर पूर्वी क्षेत्र विकास मंत्रालय का गठन किया गया। लेकिन इन कदमों के सीमित प्रभाव पड़े। पिछले दो दशकों में शेष भारत में आर्थिक सुधारों की लहर का भी यहां काफी कम असर महसूस किया गया है। यही कारण है कि पूर्वोत्तर की युवा पीढ़ी को देश के महानगरों में पलायन के लिए मजबूर होना पड़ता है। फिर यहां वैध व्यापार की तुलना में अवैध व्यापार कई गुना ज्यादा होता है। पूर्वोत्तर की सीमा का अ_ानबे फीसद भाग चीन, म्यांमा, भूटान, बांग्लादेश और नेपाल के साथ लगता है। इसीलिए वैश्वीकरण के युग में पूर्वोत्तर में विकास की संभावनाएं अधिक हैं। इसी के मद्देनजर अनुभव किया गया कि पूर्वोत्तर में समृद्धि की बहार तभी आएगी जब भारत सरकार यहां के उत्पादों के लिए दक्षिण-पूर्व और पूर्वी एशियाई देशों में निकासी मार्ग ढूंढ़ ले। प्रस्तावित पूर्वी गलियारे के पूरा होने पर यह निकासी मार्ग मिल जाएगा।

अभी तक म्यांमा के शासक चीन के साथ संबंधों को प्राथमिकता देते थे, लेकिन ईरावदी नदी पर बनाए जाने वाले मित्सोन बांध का स्थानीय लोगों द्वारा किए जाने वाले विरोध ने वहां के शासकों को चीन की विस्तारवादी नीतियों के प्रति सचेत कर दिया। इसीलिए वहां उन्होंने भारत से संबंध सुधारने की पहल की। फिर म्यांमा में लोकतंत्र की बयार ने भी वहां के शासकों को भारत से मजबूत संबंध बनाने के लिए प्रेरित किया है। दोनों देशों के बीच कृषि, बुनियादी ढांचा सहित कई समझौतों पर हस्ताक्षर किए गए। सबसे अहम समझौता आवाजाही की सुविधाएं बढ़ाने के मामले में हुआ। अब भारतीय विमान म्यांमा के रास्ते अन्य स्थानों के लिए उड़ान भर सकेंगे। इसके अलावा सडक़ और पुलों के निर्माण संबंधी समझौता भी हुआ है। दोनों देशों के बीच बस सेवा शुरू करने पर भी सहमति बन चुकी है।

म्यांमा से संबंध सुधरने पर वहां के प्रचुर गैस संसाधनों तक भारत की पहुंच बनेगी, जिससे पूर्वोत्तर में ऊर्जा की समस्या दूर होगी और भारत को गैस के लिए ईरान से लेकर तुर्कमेनिस्तान तक दौड़ नहीं लगानी पड़ेगी। भारत म्यांमा के बीच 1640 किलोमीटर लंबी सीमा पर कई बार्डर हाट और नई कस्टम चौकियां खोलने पर सहमति बनी है। भारत म्यांमा में कलादन नदी को गहरा करने और सितवे बंदरगाह का निर्माण कर रहा है। इससे पूर्वोत्तर राज्यों की समुद्र तक पहुंच बनेगी। ऐसा होने पर पूर्वोत्तर राज्यों की आर्थिक गतिविधियों में बढ़ोतरी होगी।

अनानास, आलू बुखारा, आड़ू, खुबानी, आम, केला और नाशपाती की बहुतायत वाले पूर्वोत्तर में देश की फलों की टोकरी बनने की पूरी क्षमता है। लेकिन यह तभी साकार होगा, जब इन फलों को देश-विदेश की मंडियों में पहुंचाने के पुख्ता उपाय किए जाएं। फिलहाल स्थिति यह है कि पूर्वोत्तर की नाशपाती कोलकाता बंदरगाह पहुंचने से पहले ही सड़ जाती है।

बंदरगाह से अत्यधिक दूरी, कमजोर रेल-सडक़ नेटवर्क और बिजली की कमी के साथ-साथ अलगाववादी गतिविधियां और भूस्खलन भी फलों को सड़ाते हैं। इसी तरह पूर्वोत्तर के बेजोड़ हस्तशिल्प भी बाजार पहुंच के अभाव में दम तोड़ते नजर आ रहे हैं। आखिर नगालैंड, मणिपुर, मिजोरम में क्या नहीं है, जो स्विटजरलैंड में है। अगर स्विटजरलैंड की भांति इन राज्यों में भी सूक्ष्म उपकरणों, छोटी मशीनरी, हस्तशिल्प, खाद्य प्रसंस्करण उद्योग का जाल बिछा दिया जाए तो अलगावाद, आतंकवाद, बेरोजगारी का दीर्घकालिक समाधान होगा। दुर्भाग्यवश आजाद भारत में पूर्वोत्तर के मन को समझने का प्रयास ही नहीं किया गया। इस तथ्य के बावजूद कि मात्र तेरह किलोमीटर चौड़ी पट्टी (चिकन नेक) से भारतीय राष्ट्र राज्य से जुडऩे वाला यह क्षेत्र हाथ से गया तो कश्मीर से भी बड़ा खतरा पैदा हो जाएगा। इसके बावजूद शेष भारत के लिए गुवाहाटी ही पूर्वोत्तर का आदि और अंत दोनों है। लेकिन सच्चाई यह है कि पूर्वोत्तर की पट््टी गुवाहाटी से आगे भी छह सौ किलोमीटर के दायरे में फैली हुई है। इसी उपेक्षा का नतीजा है कि पूर्वोत्तर में मेडिकल और इंजीनियरिंग कॉलेजों का नितांत अभाव है। उच्च शिक्षा के दूसरे पाठ्यक्रमों की मौजूदगी भी बहुत कम है। रेलवे और सडक़ नेटवर्क के मामले में भी यह इलाका पिछड़ा हुआ है। हथकरघा और कुछेक परंपरागत उद्योगों को छोड़ दिया जाए तो यहां रोजगार के साधनों की भारी कमी है।

चूंकि पूर्वोत्तर सांस्कृतिक-आर्थिक दृष्टि से दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के साथ गहराई से जुड़ा रहा है, इसलिए पूर्वोत्तर की बदहाली तभी दूर होगी जब इन राज्यों का दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के साथ एकाकार हो। यह कार्य पूर्वी गलियारे से ही होगा। इससे पूर्वोत्तर के राज्यों में समृद्धि की जो फसल लहलहाएगी उससे न सिर्फ अलगाववाद, आतंकवाद का खात्मा होगा, बल्कि शेष भारत भी ‘चिकन नेक सिंड्रोम’ से बाहर निकलेगा। जातिवाद, छुआछूत और दहेज जैसी सामाजिक बुराइयों से मुक्त और महिला-पुरुष समानता वाले पूर्वोत्तर से शेष भारत बहुत कुछ सीख सकता है। लेकिन यह तभी होगा जब हम पूर्वोत्तर को बेगाना न मान कर उसके साथ एकाकार हों।
-रमेश कुमार दुबे