सर्वजन कल्याणकारी प्रथम भारतीय महिला शासिका महारानी अहिल्याबाई होलकर

  • 2016-05-17 09:49:30.0
  • अशोक “प्रवृद्ध”

महारानी अहिल्याबाई होलकर

चतुर्दिक अव्यवस्था का आलम था, और सभी दिशाओं में गड़बड़ी मची हुईथी। शासन और व्यवस्था के नाम पर घोर अत्याचार हो रहे थे। प्रजाजन-साधारण गृहस्थ, किसान- मजदूर अत्यंत हीन अवस्था में सिसक रहे थे। उनका एकमात्र सहारा धर्म अंधविश्वासों, भय, त्रासों और रूढिय़ों की जकडऩ में कसा जा रहा था। न्याय में न शक्ति रही थी, न विश्वास। ऐसे काल की उन विकट परिस्थितियों में अहिल्याबाई होलकर भारत के मालवा साम्राज्य की मराठा होलकर महारानी बनी । अहिल्याबाई किसी बड़े भारी राज्य की रानी नहीं थीं, बल्कि एक छोटे भू-भाग पर उनका राज्य कायम था और उनका कार्यक्षेत्र अपेक्षाकृत सीमित था, इसके बावजूद जनकल्याण के लिए उन्होंने जो कुछ किया, वह आश्चर्यचकित करने वाला है, वह चिरस्मरणीय है। राज्य की सत्ता पर बैठने के पूर्व ही उन्होंने अपने पति - पुत्र सहित अपने सभी परिजनों को खो दिया था इसके बाद भी प्रजा हितार्थ किये गए उनके जनकल्याण के कार्य प्रशंसनीय हैं। अहिल्याबाई ने अपने राज्य की सीमाओं के बाहर सम्पूर्ण भारत के प्रसिद्ध तीर्थों और स्थानों में मंदिर बनवाये, घाट बँधवाये, कुँओं और बावडिय़ों का निर्माण किया, मार्ग बनवाये, पुराने पथों का मरम्मतीकरण करवाया, भूखों के लिए अन्नसत्र (अन्यक्षेत्र) खोले, प्यासों के लिए प्याऊ बिठलाईं, शास्त्रों के मनन-चिंतन और प्रवचन हेतु मंदिरों में विद्वानों की नियुक्ति की। और, मरते दम तक आत्म-प्रतिष्ठा के झूठे मोह का त्याग करके सदा न्याय करने का प्रयत्न करती रहीं ।

रानी अहिल्याबाई ने काशी, गया, सोमनाथ, अयोध्या, मथुरा, हरिद्वार, द्वारिका, बद्रीनारायण, रामेश्वर, जगन्नाथ पुरी इत्यादि प्रसिद्ध तीर्थस्थानों पर मंदिर बनवाये और धर्म शालाएं खुलवायीं। कुछ इतिहासकारों ने इन मंदिरों को हिंदू धर्म की बाहरी चौंकियाँ बतलाया है। कहा जाता है कि रानी अहिल्योबाई भगवान शिव की अनन्य भक्तं थीं और एक बार उनके स्व प्न। में भगवान शिव आए और उन्हें प्रजा के कल्याण के लिए काशी विश्वनाथ की सुध लेने की सलाह दी । इसलिए उन्होंउने 1777 में विश्व प्रसिद्ध काशी विश्वनाथ मंदिर का निर्माण कराया। शिव की भक्त अहिल्याबाई का सारा जीवन वैराग्य, कत्र्तव्य-पालन और परमार्थ की साधना का बन गया। मुस्लिम आक्रमणकारियो के द्वारा तोड़े हुए मंदिरो को देखकर ही उन्होंने सोमनाथ में शिव का मंदिर बनवाया । जो शिवभक्तों के द्वारा आज भी पूजा जाता है ।शिवपूजन के बिना मुंह में पानी की एक बूंद नहीं जाने देती थी। सारा राज्य उन्होंने शंकर को अर्पित कर रखा था और आप उनकी सेविका बनकर शासन चलाती थी। शिव के प्रति उनके समर्पण भाव का पता इस बात से चलता है कि अहिल्याबाई राजाज्ञाओं पर हस्ताक्षर करते समय अपना नाम नहीं लिखती थी, बल्कि पत्र के नीचे नीचे केवल श्री शंकर लिख देती थी। उनके रुपयों पर शिवलिंग और बिल्व पत्र का चित्र ओर पैसों पर नंदी का चित्र अंकित है । कहा जाता है कि तब से लेकर भारतीय स्वराज्य की प्राप्ति तक उनके बाद में जितने नरेश इंदौर के सिंहासन पर आये सबकी राजाज्ञाऐं जब तक कि श्रीशंकर की नाम से जारी नहीं होती, तब तक वह राजाज्ञा नहीं मानी जाती थी और उस पर अमल भी नहीं होता था। अहिल्याबाई का रहन-सहन बिल्कुल सादा था। शुद्ध सफ़ेद वस्त्र धारण करती थीं। जेवर आदि कुछ नहीं पहनती थी। भगवान की पूजा, अच्छे ग्रंथों को सुनना ओर राजकाज आदि कार्य में नियमित रहती थी। उनके उत्कृष्ट विचारों एवं नैतिक आचरण के कारण अपने जीवनकाल में ही इन्हें जनता देवीसमझने और कहने लगी थी। यही कारण है कि इंदौर में आज भी प्रति वर्ष भाद्रपद कृष्णा चतुर्दशी के दिन अहिल्योत्सव मनाये जाने की परंपरा चली आ रही है। अहिल्याबाई उस दौर  में भी महिला सशक्तीकरण की पक्षधर थी और उन्होंने स्त्रियों को उनका उचित स्थान दिया तथा नारीशक्ति का भरपूर उपयोग किया। उन्होंने अपने कार्यों से यह दर्शा दिया कि स्त्री किसी भी स्थिति में पुरुष से कम नहीं है। वे स्वयं भी पति के साथ रणक्षेत्र में जाया करती थीं। पति के देहान्त के बाद भी वे युध्द क्षेत्र में उतरती थीं और सेनाओं का नेतृत्व करती थीं। उस समय किसी महिला के पति के मर जाने पर और उसका पुत्र न होने पर उसकी संपूर्ण संपत्ति राजकोष में जमा कर दिए जाने का नियम था,परंतु अहिल्या बाई ने इस क़ानून को बदल दिया और मृतक की विधवा को यह अधिकार दिया कि वह पति द्वारा छोड़ी हुई संपत्ति की वारिस रहेगी और अपनी इच्छानुसार अपने उपयोग में लाए और चाहे तो उसका सुख भोगे या अपनी संपत्ति से जनकल्याण के काम करे। अहिल्या बाई की ख़ास विशेष सेवक एक महिला ही थी। अपने शासनकाल में उन्होंने नदियों पर जो घाट स्नान आदि के लिए बनवाए थे, उनमें महिलाओं के लिए अलग व्यवस्था भी हुआ करती थी। स्त्रियों के मान-सम्मान का बड़ा ध्यान रखा जाता था। स्त्री शिक्षा का विस्तार किया गया और दान-दक्षिणा देने में महिलाओं का विशेष ध्यान रखने की व्यवस्था की गई। अहिल्याबाई होल्कर के सम्मान में भारतीय डाक विभाग के द्वारा डाक टिकट भी जारी की गई है।




महान क्रन्तिकारी महिला शासिका महारानी अहिल्याबाई होलकर भारत के मालवा साम्राज्य की मराठा होलकर महारानी थी । महारानी अहिल्याबाई इन्दौर राज्य के संस्थापक इतिहास-प्रसिद्ध महाराज मल्हारराव होलकर के पुत्र खंडेराव की पत्नी थीं। वह एक बहादुर योद्धा और कुशल तीरंदाज थीं। उन्होंने कई युद्धों में अपनी सेना का नेतृत्व किया और हाथी पर सवार होकर वीरता के साथ लड़ाइयाँ लड़ी। अहिल्याबाई का जन्म 31 मई 1725 को महाराष्ट्र के अहमदनगर के चौण्डी (छौंड़ी) ग्राम में हुआ और देहांत 13 अगस्त 1795 को; तिथि उस दिन भाद्रपद कृष्णा चतुर्दशी थी। उनके पिता मंकोजी राव शिंदे, अपने गाँव के पाटिल थे । उस समय लडकियाँ महिलाये स्कूल नही जाती थी, लेकिन अहिल्याबाई के पिता ने उन्हें लिखने -पढऩे लायक पढ़ाया ।इतिहास में उनका आना एक घटना का ही परिणाम माना जाता है। ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार मल्हार राव होलकर, मराठा पेशवा बाजीराव के कमांडर थे। वे एक बार पुणे जाते समय छौंड़ी रुके तो उन्होंने उस समय मंदिर में काम कर रही 8 साल की अहिल्याबाई को देखा। उन्हें अहिल्या का चरित्र और स्वभाव काफी पसंद आया, इसीलिये उन्होंने अपने पुत्र खांडेराव के लिये अहिल्या का हाथ माँगा और बाद में 1733 में उन्होंने खांडेराव से विवाह कर दिया।दस-बारह वर्ष की आयु में उनका विवाह खंडेराव के साथ हुआ। सन् 1745 में अहिल्याबाई के पुत्र हुआ और तीन वर्ष बाद एक कन्या। पुत्र का नाम मालेराव और कन्या का नाम मुक्ताबाई था। पति के चंचल और उग्र स्वभाव को भी अहिल्याबाई ने सहा और बड़ी कुशलता से अपने पति के गौरव को जगाया। कुछ ही दिनों में अपने पिता के मार्गदर्शन में खण्डेराव एक अच्छे सिपाही बन गये।
-अशोक प्रवृद्ध