प्रधानमंत्री मोदी ने दी ‘स्व’भाषा हिंदी को नई पहचान

  • 2016-04-22 03:30:04.0
  • कारूराम

प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी

यह एक शुभसंकेत है कि प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी दो वर्ष पश्चात भी अपनी लोकप्रियता के शिखर पर पूर्ववत टिके हुए हैं। हिंदू नववर्ष के अवसर पर उनके प्रति यही कामना की जा सकती है, कि वे लोकप्रियता के इसी शिखर पर स्थापित रहते हुए सेवा करते रहें और देश की धमनियों में चढ़ाये गये विषाक्तरक्त को चूस-चूसकर बाहर निकालने के अपने ‘शिवव्रत’ पर अडिग खड़े रहे।

प्रधानमंत्री मोदी जी ने पिछले दो वर्षों में भारत की जन-जन की भाषा हिंदी को नई ऊचाईयां प्रदान की हैं। उन्होंने स्वयं ने सुसंस्कृत, समृद्घ और संस्कृतनिष्ठ हिंदी के शब्दों को अपने भाषणों में अपनाया है। इससे राजनीतिज्ञों और नौकरशाहों की हिंदी भी अच्छी बनती जा रही है और प्रथम प्रधानमंत्री पंडित नेहरूजी की ‘हिंदुस्तानी’ को इससे झटका लगा है। जब राजनेता अपने देश की भाषा का गर्व के साथ प्रयोग करने लगते हैं और न केवल प्रयोग करते हैं अपितु उसकी व्याकरण की त्रुटियों का भी ध्यान रखते हैं तो उससे देश की अपनी भाषा का विकास होना स्वाभाविक है। मोदी जी ने ‘हिंदी’ को अपनाकर उसकी गरिमा का सम्मान किया है।

वैसे तो हमारे संविधान के निर्माण के समय जब हिंदी को राजभाषा बनाने का निर्णय लिया गया था तो भारत की कुल 1652 ऐसी भाषाओं को चिन्हित किया गया था जो इस देश में कही न कहीं बोली जाती थीं। दुर्भाग्य रहा इस देश का कि 1652 भाषाओं वाले देश के लोगों के ऊपर ‘अंग्रेजी’ शासन करती रही, और तो और 1987 तक तो हमारा संविधान भी हिंदी में उपलब्ध नही था, कहने का अभिप्राय है कि देश 1947 से लेकर 1987 तक जिस भाषा के माध्यम से शासित होता रहा वह उन विदेशी शासकों की भाषा थी जिनको निकाल बाहर भगाने के लिए हमने देर तक संघर्ष किया था। स्वतंत्रता मिलते ही लोगों ने अपनी-अपनी क्षेत्रीय भाषाओं को भी संविधान की आठवीं अनुसूची में सम्मिलित कराने के प्रयास आरंभ किये। इसके लिए देश के विभिन्न भागों में राजनीतिक आंदोलन भी हुए हैं। वास्तव में इन आंदोलनों के उद्देश्य राजनीतिक ही थे। कुछ लोगों ने अपनी राजनीति चमकाने के लिए लोगों की भावनाओं का दुरूपयोग किया। वास्तव में हर भाषा को आठवीं अनुसूची में डालना पूर्णतया निरर्थक और असंवैधानिक है। असंवैधानिक इसलिए कि 1652 भाषाओं का चिन्हीकरण करने के उपरंात भी हमारे संविधान निर्माताओं ने हिंदी राजभाषा आयोग का गठन किया था। जिसका उद्देश्य हिंदी को प्रोत्साहित करना था, आयोग सुनिश्चित करेगा कि (क) संघ के शासकीय प्रयोजनों के लिए हिंदी का अधिकाधिक प्रयोग किया जाए। (ख) संघ के सभी या किन्ही शासकीय प्रयोजनों के लिए अंग्रेजी भाषा के प्रयोग पर निर्बंधन, (ग) मा. उच्चतम न्यायालय और मा. उच्च न्यायालय की कार्यवाहियों में और संघ की और राज्य की अधिनियमितताओं के तथा उनके आधीन बनाये गये अधीनस्थ विधान के पाठों में प्रयोग की जाने वाली भाषा, (घ) संघ के किसी एक या अधिक विनिर्दिष्ट प्रयोजनों के लिए किये जाने वाले अंकों के रूप (ड) कोई अन्य विषय जो निम्नलिखित के संबंध में आयोग द्वारा राष्ट्रपति को निर्दिष्ट किया जाए-(1) संघ की राजभाषा और (2) संघ और किसी राज्य के बीच या एक राज्य और दूसरे राज्य के बीच पत्रादि की भाषा के बारे में।  इस संवैधानिक प्राविधान का अभिप्राय है कि देश में धीरे-धीरे भाषायी समरूपता स्थापित की जाए और विदेशी भाषा अंग्रेजी की स्थिति  को उसी अनुपात में धीरे-धीरे समाप्त किया जाए। परंतु बीते 69 वर्षों में हमने देखा कि हिंदी और संस्कृत की स्थिति निरंतर दुर्बल करते जाने का प्रयास किया गया। इसमें ऐसी राष्ट्रद्रोही शक्तियों की विशेष भूमिका रही, जो भारत को निरंतर दुर्बलताओं और विसंगतियों की कारा बनाने के लिए सचेष्ट रहे हैं।

प्रधानमंत्री मोदी जी ने देश की सामाजिक विसंगतियों को दूर करने के लिए बड़ी गहराई से समझा है कि देश में सांस्कृतिक एकता की भावना को लाने में हिंदी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। इसलिए उन्होंने तात्विक-दर्शन की शैली को अपनाकर बिना किसी शोर शराबे और दिखावे के बड़े शांत भाव से हिंदी को अपना लिया। अब तक की राजनीति और राजनेता ‘विभिन्नताओं में एकता’ स्थापित कर रहे थे जो कि अतार्किक बात थी, विभिन्नताओं की पूजा करते-करते कभी भी एकता स्थापित नही हो सकती। एकता ‘एक’ को बलवती कर शेष को उसका अनुव्रती बना देने से होती है। इसलिए मोदीजी ने इसी दूसरे मार्ग को अपनाया है, और हम देख रहे हैं, कि उनकी सभाओं में हर व्यक्ति हिंदी में भाषण देता है। देश की संसद में भी हिंदी को सम्मान दिया जा रहा है। प्रधानमंत्री मोदीजी के द्वारा भारत में ही नही विदेशों में भी हर मंच पर हिंदी को ही सम्मान दिया गया है। उन्होंने बड़े गर्व से विदेशों में रहने वाले भारतीयों को तो हिंदी में संबोधित किया ही है साथ ही यू.एन. को भी हिंदी में ही संबोधित किया है। जिससे हिंदी को विश्व स्तर पर भी सम्मान मिला है।

अब तक हमारे राजनीतिज्ञ हिंदी को बोलने में आत्महीनता अनुभव करते रहते थे। अटलजी जैसे लोग राजनीति में थे तो सही पर वह अपवाद स्वरूप ही थे, पर अब माननीय मोदी जी ने समय की धारा को नई दिशा दी है। वैसे किसी भी देश के शासनाध्यक्ष को स्वभाषा के प्रति ऐसी ही भक्ति का प्रदर्शन करना भी चाहिए। यदि ऐसी स्वभाषा भक्ति का प्रदर्शन भारत में प्रारंभ से ही किया जाता तो हिंदी अब तक बहुत आगे बढ़ गयी होती। पर चलिए अब भी कुछ नही बिगड़ा है, ‘देर आयद दुरूस्त आयद’ वाली बात है। वैसे जहां तक मोदी जी की बात है तो वे सबसे हटकर चलने वाले प्रधानमंत्री सिद्घ हो रहे हैं। उन्हें भारतीयता से प्यार है, पर किसी विदेशी भाषा के प्रति किसी प्रकार की घृणा का प्रदर्शन भी नही करते हैं। उनकी यह शैली भी अनुकरणीय ही कही जाएगी, क्योंकि हिंदी प्रेम का अभिप्राय कुछ लोग अंग्रेजी विरोध से आरंभ करते रहे थे। जिससे बात बनने के स्थान पर बिगड़ जाती थी। अब हमें आशा करनी चाहिए कि हिंदी दिनानुदिन उन्न्ति और प्रगति के पथ पर अग्रसर होती जाएगी। उसका इस सम्मानित पद पर पहुंचाने में मोदी जी का योगदान निश्चय ही राजभाषा हिंदी के इतिहास की अमूल्य धरोहर बनेगी। (लेखक ‘उगता भारत ट्रस्ट’ के राष्ट्रीय संरक्षक हैं)