शुभ संकेत : पर्यावरण का रक्षक बना उच्च न्यायालय

  • 2016-07-09 10:30:05.0
  • प्रो. एनके सिंह

उच्च न्यायालय


पहाड़ी राज्य हिमाचल में अनियंत्रित व तेज रफ्तार से बढ़ता वायु प्रदूषण पर्यावरण के लिए एक गंभीर खतरा बन चुका है। स्वच्छ वायु लेना मनुष्य का मूल अधिकार है, इसके बावजूद हवा की खराब गुणवत्ता की वजह से विश्व भर में सालाना करीब 65 लाख लोगों की मौत हो रही है। जंगलों में लग रही आग बढ़ते पर्यावरणीय प्रदूषण और वनस्पतियों व वन्य-जीवों समेत जंगली जीवन के विनाश का एक बड़ा कारण बनती जा रही है। पिछले वर्ष की तुलना में इस वर्ष आगजनी की घटनाओं में चार गुना का इजाफा हुआ है और राज्य के इतिहास में एक वर्ष में आग लगने की कभी इतनी घटनाएं घटित नहीं हुईं। संविधान के अनुच्छेद-21 के अंतर्गत न्यायालय पर्यावरण संरक्षण के मामले में अपना हस्तक्षेप कर सकते हैं। इस संदर्भ में मैंने हिमाचल प्रदेश के माननीय मुख्य न्यायाधीश को एक पत्र लिखा और इसके साथ ‘दिव्य हिमाचल’ में छह मई के अंक में ‘जंगल जल रहे हैं और नेता बासुंरी बजा रहे हैं’ शीर्षक से प्रकाशित अपने लेख की प्रतिलिपि भी संलग्न करके भेजी। अपनी पाती में मैंने यह जिक्र भी किया कि जहां माननीय सर्वोच्च न्यायालय दिल्ली में कारों व टैक्सियों से फैलने वाले प्रदूषण के प्रति सुधारात्मक निर्देश जारी कर रहा है, वहीं स्वच्छ पर्यावरण पर सबसे बड़ा प्रहार हिमाचल में हो रहा है, जहां आगजनी की घटनाओं में हैरतअंगेज वृद्धि समूचे प्रदेश के पर्यावरण को दूषित कर रही है। मैंने प्रदेश में वायु गुणवत्ता में आ रही निरंतर गिरावट और जंगली जीवन को विनाश से बचाने हेतु न्यायालय से इस मामले में उचित संज्ञान लेने की अपील की। निश्चित तौर पर इसे दुर्भाग्यपूर्ण ही माना जाएगा कि इस चुनौती से निपटने के लिए प्रदेश सरकार ने कभी अपना दायित्व नहीं समझा।

वर्ष 1960 तक सिर्फ पर्यावरणीय संदर्भों में पीडि़त पक्ष को ही न्याय लेने का अधिकार था, 1980 में पर्यावरणीय कानून, पर्यावरणीय संरक्षण के संदर्भ में एक महत्त्वपूर्ण बदलाव लेकर आया। इससे न्यायालय को विकास और पर्यावरण संरक्षण को लेकर एक बड़ी भूमिका मिल गई। जनहित याचिका का मतलब है कि न्यायालय में पर्यावरण की सुरक्षा या अन्य विषयों पर सार्वजनिक हितों की सुरक्षा के लिए न्यायालय में की जाने वाली कार्यवाही। ‘इंडियन काउंसिल ऑफ एन्वायरन्मेंट लीगल एक्शन बनाम यूनियन ऑफ इंडिया’ के मामले में देश की शीर्ष अदालत ने माना था कि, ‘प्रदूषण विरोधी कानून के प्रभावी क्रियान्वयन को लेकर उच्च न्यायालय सबसे उपयुक्त मंच है’। मेरी यही इच्छा है कि प्रदेश सरकार इस समस्या से निपटने को लेकर पूरी गंभीरता के साथ प्रयास करे। आगजनी की घटनाओं से बचने या उन पर पूर्ण नियंत्रण पाने के लिए आज इस बात की महत्ती आवश्यकता है कि मानव संसाधनों में बढ़ोतरी के साथ-साथ उन्नत तकनीकों को अपनाया जाए। अमूमन ऐसा देखने को मिलता है कि अग्निशमन केंद्रों में जरूरत के मुताबिक उपकरण ही उपलब्ध नहीं होते या विभाग के कई वाहन रास्ते में ही दम तोड़ जाते हैं।

एक बार मेरे गांव के बगल में जंगल में आग लग गई तो मैंने आग बुझाने के लिए अग्निशमन विभाग को फोन किया, लेकिन उन्हें उस इलाके और वहां तक पहुंचने का रास्ता ही पता नहीं था। उनकी चिंता की सबसे बड़ी वजह यही थी कि क्या अग्निशमन वाहन जंगल के अंदरूनी इलाकों तक पहुंच भी पाएगा, क्योंकि जंगल के बहुत से क्षेत्रों तक बड़े वाहनों की पहुंच ही संभव नहीं थी। नई तकनीक के तहत आग बुझाने वाले फोम को घटनास्थल तक ले जाने के लिए बाइक्स का इंतजाम किया जा सकता है, जैसा कि उड्डयन क्षेत्र में प्रज्वलनशील पदार्थों के कारण लगी आग को बुझाने में किया जाता है। आग बुझाने के मौजूदा विकल्पों की तुलना में फोम या इस तरह के अन्य रसायन आग को बुझाने में अपेक्षाकृत ज्यादा कारगर साबित होते हैं। कई देश जंगलों में लगने वाली भयंकर आग को बुझाने के लिए हेलिकाप्टरों की मदद से अग्निशामक तरल पदार्थों का छिडक़ाव करते हैं।

अभी हाल में उत्तराखंड के जंगलों में लगी भयावह आग पर काबू पाने के लिए भी इस तकनीक का सहारा लिया गया था, लेकिन यह ज्यादा असरदार साबित नहीं हुआ। पर्यावरण संरक्षण और सांस के जरिए ली जाने वाली वायु की गुणवत्ता को बरकरार रखने की चिंता विश्व के तमाम देशों की सरकारों के चिंतन-मंथन में शीर्ष स्थान पर आ चुकी है, लेकिन इसके समानांतर पूरे विश्व में प्रदूषण का स्तर भी बढ़ता ही जा रहा है।

एक रिपोर्ट से खुलासा हुआ है कि न्यूयार्क में करीब 90 फीसदी लोगों को मिल्की वे (आकाशगंगा) को देखने में भी काफी मुश्किल हो रही है। यह रिपोर्ट मुझे उन दिनों की याद दिलाती है जब मुझे यूएनडीपी में नियुक्ति मिली थी। तब मेरा कार्यस्थल न्यूयार्क तय किया गया, लेकिन उस दौरान मैंने कार्यालय को सूचित किया कि मैं यहां नहीं रहना चाहता हूं। मुझे मोंट्रियल में ही रहने की इजाजत दी जाए और मैं वहीं से हर महीने न्यूयार्क स्थित दफ्तर को रिपोर्ट कर दिया करूंगा। मुझसे उसकी वजह पूछी गई, तो मैंने उन्हें बताया कि वहां बनी गगनचुंबी इमारतों के बीच मैं रात को तारे नहीं देख पाऊंगा। मेरे जवाब पर वे भी मुस्करा दिए और उसके पश्चात मैंने मोंट्रियल में ही कार्य किया। अब तक के शोध-सर्वेक्षणों के परिणामों को जानकर मुझे बहुत हैरानी हुई कि प्रदूषण फैलाने में चिली के एक शहर एरिका की भूमिका नाममात्र की है। वातावरण को दूषित करने वाली तमाम गैसें विकसित देशों द्वारा उत्सर्जित की जाती हैं। फिर भी मैं हिमाचल के लोगों को याद दिलाना चाहता हूं कि यदि वे दस वर्ष पहले के समय को याद करेंगे, तो उन्हें ज्ञात होगा कि वे लंबी दूरी से भी धौलाधार की पहाडिय़ों को साफ देख सकते थे।

जब मैं कालेज में पढ़ता था, तो कई बार छुट्टियों में मेरा अपने गांव आना होता था। उस दौरान मैं अंबोटा स्थित अपने घर की छत से धौलाधार पर्वत शृंखला को साफ-साफ देख सकता था। इसके बाद मैं 2600 फीट की ऊंचाई पर स्थित सूहीं गांव में रहने लगा, तो दस वर्ष पहले तक धौलाधार की पूरी चोटियों को बड़ी आसानी से देख सकता था। आज हालात ऐसे हैं कि मैं इसे धुंधला-धुंधला सा ही देख पाता हूं, क्योंकि प्रदूषण की एक गहरी परत इस पर तन चुकी है।

दस वर्ष पहले मैं दिल्ली से हिमाचल आकर बस गया और सोचा कि मैं अब स्वच्छ हवा ले पाऊंगा, क्योंकि यहां की वादियों में पर्याप्त मात्रा में आक्सीजन उपलब्ध थी। मगर बड़े दुख के साथ कहना पड़ रहा है कि हिमाचल में भी हवा दिन-ब-दिन दूषित होती जा रही है और आज इस प्रदूषण से छुटकारा पाने की जरूरत लगातार बढ़ती ही जा रही है। हमारा मानना है कि अब बिलकुल उचित समय है कि प्रदेश उच्च न्यायालय राज्य मशीनरी को जगाए और नागरिकों को स्वच्छ हवा में सुकून के साथ जीने के लिए मदद करे।

यह जानकर मैं बेहद प्रसन्न हूं कि एक साहसिक प्रयास में माननीय न्यायालय ने मेरे पत्र पर उचित संज्ञान लिया है और पर्यावरण स्वच्छता के विषय पर प्रदेश सरकार को नोटिस जारी किया है, क्योंकि जनहित में यह मसला बेहद महत्त्व रखता है। उम्मीद है कि आगजनी की घटनाओं से बचाव और जंगलों की सुरक्षा की दिशा में न्यायालय के इस हस्तक्षेप से बेहतर सतर्कता व निगरानी का मार्ग प्रशस्त होगा
- प्रो. एनके सिंह