परीक्षा में नकल के अपराध का दोषी कौन?

  • 2016-03-12 06:30:49.0
  • अभिषेक कुमार

हमारे देश में परीक्षा में नकल को एक बड़े अपराध की तरह देखा जा रहा है, इसकी एक बानगी बिहार के मुजफ्फरपुर में सेना की भर्ती परीक्षा के दौरान मिली। हर कीमत पर अनुशासन चाहने वाली सेना में क्लर्क की भर्ती परीक्षा देने आए युवकों को खुले मैदान में महज जांघिया पहने इसलिए बिठाया गया, ताकि वे किसी भी सूरत में नकल न कर पाएं। बोर्ड और भर्ती परीक्षाओं में नकल और परचा लीक की घटनाओं की रोकथाम का कोई और तरीका कारगर नहीं होगा, तो क्या इसी तरह छात्रों और उम्मीदवारों का चीरहरण होगा- यह विचारणीय प्रश्न है। विचार इस पर भी करना होगा कि आखिर नकल और फूटते परचों की बीमारी क्यों बढ़ रही है और इसका इलाज क्या है? कहीं यह हमारे समाज और शिक्षा तंत्र की ही कोई खामी तो नहीं है जो ऐसी घटनाओं के लिए जिम्मेदार है। देश में पढ़ाई और परीक्षा की मौजूदा व्यवस्था यह कहती है कि जो छात्र परीक्षा में अच्छे नंबर लाएगा, वही उच्च शिक्षा और नौकरी में आगे बढ़ सकेगा। इस तरह शिक्षा व्यवस्था का कुल मकसद परीक्षा में अच्छे अंकों से पास कराने तक सीमित रह जाता है, उसका इससे कोई वास्ता नहीं रहता कि छात्र के जीवन में पढ़ाई का उद््देश्य दुनिया-जहान के बारे में एक ठोस समझ पैदा करना है। रचनात्मकता, कल्पना-शक्ति और वैज्ञानिक समझ विकसित करने का काम पढ़ाई के जरिये होता है- इस बारे में सोचने का वक्त न अभिभावकों के पास है न शिक्षकों के पास। सभी का जोर इस पर है कि बचपन से किशोरावस्था तक बच्चे हर परीक्षा में अच्छे नंबरों से पास होते रहें, ताकि बड़े होने पर वे एक ठीक-ठाक नौकरी पा सकें या हो सके तो बरास्ता आईआईटी-आईआईएम अमेरिका आदि विकसित देशों का रुख कर सकें। इसके अलावा हर साल आईआईटी-आईआईएम से निकले छात्रों को शुरुआती नौकरी में ही लाखों-करोड़ों के पैकेज की खबरें पढ़ाई को एक होड़ में और परीक्षा को अच्छे अंकों के रिजल्ट तक में सीमित कर देती हैं।
परीक्षा में नकल के अपराध का दोषी कौन?


अच्छे नंबरों की नींव पर मिलने वाली कामयाबी और जीवन में तरक्की का एक ऐसा मिथक देश में तैयार हो गया है कि हमारी पूरी शिक्षा व्यवस्था उसके पीछे कदमताल कर रही है। ऐसी शिक्षा व्यवस्था के बल पर देश ज्ञानात्मक शक्ति (नॉलेज पॉवर) कैसे बनेगा और कैसे नौजवान वह हुनर हासिल करेंगे जिसका जिक्र प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने महत्त्वाकांक्षी कार्यक्रम ‘स्किल इंडिया’ में करते रहे हैं? अलबत्ता इसका एक असर यह हुआ है कि परीक्षाओं में नकल की मात्रा और फूटते परचों की संख्या जरूर बढ़ गई है।

हाल के वर्षों में डिग्री के फर्जीवाड़े के कई किस्से भी उजागर हुए हैं, जैसे पिछले साल दिल्ली के पूर्व कानूनमंत्री जितेंद्र तोमर की फर्जी डिग्री मामले में गिरफ्तारी हुई थी। उस समय भी यह सवाल जोर-शोर से उठा था कि फर्जी डिग्री लेने या नकल से परीक्षा पास करने में आखिर फर्क क्या है, क्योंकि दोनों ही तरीकों से एक अयोग्य व्यक्ति शिक्षा तंत्र को ठेंगा दिखाते हुए उसका मखौल उड़ाता है। यह भी कहा गया था कि ऐसी घटनाओं का सबसे ज्यादा असर प्रतिभावान और मेहनती छात्रों पर पड़ता है क्योंकि न केवल परीक्षाओं में उनके लिए नकलचियों से पिछडऩे का खतरा पैदा हो जाता है, बल्कि दोबारा परीक्षाओं का आयोजन कराने से वे हताश महसूस करते हैं। नौकरियों में फर्जी डिग्री वाले को ऊंचे अंकों की वजह से बढ़त मिल जाए, तो यह और भी खतरनाक बात है।

ऐसे कांडों की वजह से अतीत की उन परीक्षाओं पर भी प्रश्नचिह्न लगता है जिनमें हजारों-लाखों परीक्षार्थियों ने सफलता हासिल की है। लोग उन पर यह कहते हुए संदेह कर सकते हैं कि कहीं उनमें भी नकल और पर्चा लीक कराने जैसे हथकंडों का सहारा लेकर कुछ परीक्षार्थी सफल तो नहीं हुए हैं। ये घटनाएं योग्यता का मापदंड तय करने वाली परीक्षा प्रणाली की व्यवस्था के लुंजपुंज हो जाने का प्रमाण हैं। यह भी साबित होता है कि ऐसी घटनाओं को हमारा शिक्षा तंत्र बहुत हल्के में लेता है। पर इन घटनाओं को एक बड़े परिप्रेक्ष्य में देखने से प्रतीत होता है कि मर्ज की जड़ तो कहीं और है।

मुमकिन है ऐसी नकल उन स्कूलों की देन हो जो असल में या तो कागजों पर ही चल रहे होंगे या फिर जहां मास्टरजी कभी-कभार ही दर्शन देते होंगे। दूसरी बात, अगर नौजवानों को इसका अहसास हो जाए कि नौकरी की कसौटी परीक्षा में अच्छे अंक नहीं, उनका हुनर और समझ है, तो नकल तथा परचा फूटकांडों का एक झटके में हल निकल आए। इस विडंबना पर क्या किसी ने विचार किया है कि जब बात नौकरी की आती है तो उत्तर प्रदेश-बिहार के गांव-देहात के सरकारी स्कूलों के बच्चों से परीक्षा के उन्हीं मानकों पर खरा उतरने की उम्मीद की जाती है, जो सीबीएसई या शहरी प्राइवेट अंग्रेजी स्कूलों से पढ़ कर आए बच्चों के हिसाब से तय किए जाते हैं। लिहाजा, इन परीक्षाओं में नकल और परचा लीक जैसे हर हथकंडे को अपनाने की कोशिश इन राज्यों में होती है। इस मर्ज का एक पहलू रोजगार के लिए डिग्री की अनिवार्यता से भी जुड़ा हुआ है।

बिना डिग्री लिये जीवन में आगे नहीं बढ़ा जा सकता, सरकारी क्या प्राइवेट सेक्टर में भी अब यह कायदा आम हो चला है। इन हालात में लोग कैसे भी हो, डिग्री का जुगाड़ कर लेना चाहते हैं। इधर कुछ गोरखधंधे भी अपने देश में पनपे हैं। जैसे, अखबारों में विज्ञापन देकर लोगों को डिग्री लेने के लिए लुभाया जाता है कि वे कैसे बिना हाईस्कूल पास किए स्नातक परीक्षा में बैठ सकते हैं और कैसे महज बारहवीं पास बीएड आदि डिग्रियां ले सकते हैं। यही नहीं, कई ऐसे विदेशी संस्थानों की डिग्रियां भी बड़े पैमाने पर घर बैठे दिलाई जाती हैं जिनकी कहीं कोई मान्यता नहीं होती। हालांकि ऐसी डिग्री पाकर लोग फूले नहीं समाते और कई बार ऐसे लोग नौकरियों अथवा सार्वजनिक जीवन में ऊंचे ओहदे तक भी पहुंच जाते हैं। विदेशी शिक्षण संस्थानों का मोह भी ऐसे फर्जीवाड़े की जमीन तैयार कर रहा है क्योंकि उनके संस्थानों और डिग्रियों की जांच तक संभव नहीं हो पाती है, जब तक कि कोई बड़ा घोटाला न हो जाए और उससे प्रभावित होने वालों में ब्रिटेन-अमेरिका जैसे देश शामिल न हों।

एक घटना पिछले साल सामने आई थी, जिसमें पाकिस्तान में कराची स्थित कंपनी एग्जेक्ट सॉफ्टवेटर को करोड़ों डॉलर के फर्जी डिग्री घोटाले में लिप्त पाया गया था। दावा किया गया था कि यह कंपनी कई प्रतिष्ठित देशी-विदेशी विश्वविद्यालयों की डिग्रियां ऑनलाइन बेचती थी। हमारे देश में ऐसे मामलों में थोड़ा-बहुत खुलासा तभी हुआ है जब किसी नौकरी में या किसी अन्य शैक्षिक आवश्यकता के मद््देनजर अभ्यर्थी द्वारा जमा कराए गए प्रमाणपत्रों और दस्तावेजों की जांच और सत्यापन की कार्यवाही होती है। जैसे, अगर दिल्ली बार काउंसिल पूर्व कानूनमंत्री जितेंद्र सिंह तोमर की डिग्री पर सवाल नहीं उठाती और उसमें फर्जीवाड़े की शिकायत नहीं करती तो यह कभी मुमकिन नहीं होता कि उनकी डिग्री की किसी भी स्तर पर जांच की जाती या उसकी वैधानिकता पर सवाल उठाया जाता। बहरहाल, शिक्षा तंत्र की जो तमाम बीमारियां हैं, डिग्रियों-प्रमाणपत्रों का फर्जीवाड़ा उसकी एक छोटी-सी मिसाल है। यहां तो हाल यह है कि देश में सैकड़ों कॉलेज-विश्वविद्यालय बिना मान्यता के चल रहे हैं और उनकी सत्यता की जांच का जिम्मा उन्हीं लोगों पर छोड़ा गया है जो उनमें पढऩा चाहते हैं या उनकी डिग्रियां लेना चाहते हैं। इस बारे में यूजीसी की तरफ से यह तो अवश्य किया गया है कि देश में मान्यताप्राप्त कॉलेजों और विश्वविद्यालयों की सूची उसकी वेबसाइट पर प्रकाशित की गई है। ऐसे में यदि किसी छात्र या अभिभावक को किसी कॉलेज या विश्वविद्यालय की मान्यता को लेकर संदेह होता है तो उस सूची से मिलान करके इसकी जानकारी पाई जा सकती है। पर यदि कोई यह जांच नहीं कर पाता है या किसी अन्य कॉलेज-विश्वविद्यालय में दाखिला न मिलने की सूरत में इरादतन उसमें दाखिला लेता या उसकी डिग्री लेने की कोशिश करता है, तो उसे ऐसा करने से रोकने का क्या उपाय है? इसी तरह एक बड़ी समस्या यह है कि देश में कई नामी तकनीकी संस्थान किसी विश्वविद्यालय की संबद्धता के बगैर चलते रहे हैं।
-अभिषेक कुमार