पंचायतें उड़ा रही हैं न्याय का उपहास

  • 2016-02-26 12:31:27.0
  • महेंद्र अवधेश

बीते जनवरी माह के अंतिम पखवाड़े में महाराष्ट्र के परभणी जिले की एक जातीय पंचायत ने एक शख्स के सामने शर्त रखी कि यदि वह पंचायत के आठों पंचों को अपनी पत्नी के साथ हमबिस्तर होने की इजाजत दे, तो उसका छह लाख रुपए का कर्ज माफ कर दिया जाएगा। पंचायत का फैसला मानने से इनकार करने पर उक्त दंपति का सामाजिक बहिष्कार कर दिया गया। सूचना मिलने पर पुलिस, महाराष्ट्र अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति व अन्य गैर-सरकारी संगठनों ने हस्तक्षेप कर न सिर्फ उक्त दंपति का सामाजिक बहिष्कार खत्म कराया, बल्कि पंचायत को भी भंग करा दिया। पंच परमेश्वर होते हैं, यह बात कथा सम्राट प्रेमचंद के जमाने में जरूर सच रही होगी, लेकिन अब तो पंच सच्चे इंसान भी नहीं रहे।पंचायतें उड़ा रही हैं न्याय का उपहास

देश की विभिन्न पंचायतों के कुछ फैसलों पर अगर नजर डाली जाए, तो यह बात आईने की तरह साफ हो जाती है। फैसले भी ऐसे, जो किसी को भी दांतों तले उंगली दबाने के लिए विवश कर दें और न्याय नामक मानवीय अवधारणा को शर्मसार। दरअसल, समस्या यह है कि मौजूदा समय में अधिकतर लोग पंचायत नामक संस्था को सही अर्थों में समझ नहीं पा रहे हैं। वास्तव में पंचायत, वह चाहे जाति के आधार पर गठित-स्थापित हो अथवा धर्म-वर्ग के आधार पर, उसका मूल धर्म न्याय होता है। अफसोस इस बात का है कि पंचायतें अपना मूल धर्म, अपने अस्तित्व में आने का मकसद, अपनी हद और देश का कानून यानी सब कुछ भूलती जा रही हैं।

उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर में नगला टोटा गांव की पंचायत ने एक दलित युवक को फांसी की सुना दी और उसे अंजाम भी दे दिया। युवक पर अपने गांव की विवाहित महिला से संबंध रखने का आरोप था। उक्त महिला के पति ने पंचायत बुला कर युवक की शिकायत की, जिस पर पंचायत ने बिना कुछ पूछे-सुने, पहले उसे पीटने और फिर फांसी पर लटकाने का फरमान जारी कर दिया। उत्तर प्रदेश के ही कौशांबी में अमिरसा गांव की पंचायत ने एक पंद्रह वर्षीय किशोरी को कथित प्रेम प्रसंग का आरोपी मानते हुए उसे और उसके परिवार को गांव छोडऩे का हुक्म जारी कर दिया। उक्त किशोरी पड़ोस के किशोर के साथ गांव छोड़ कर कहीं चली गई थी। किशोर के घरवाले दोनों को खोज कर ले आए और उन्होंने पंचायत बुला कर आरोप लगाया कि किशोरी ही उक्त किशोर को बहला-फुसला कर ले गई थी। कथित पंचों ने बिना कोई जांच-पड़ताल किए फरमान सुना दिया कि किशोरी और उसका परिवार गांव छोड़ दे। राजस्थान के राजसमंद जिले के थुरावड़ गांव में एक महिला को निर्वस्त्र करने और बाल काटने के बाद उसे गधे पर बैठा कर इलाके में घुमाया गया। उक्त महिला पर रिश्ते के भतीजे की हत्या में शामिल होने का शक था, इसलिए उसे ऐसी सजा दी गई। उक्त घटनाएं बताती हैं कि हमारी पंचायतों ने अपना विवेक खो दिया है और वे मनमाने फैसले दे रही हैं।

देश की पंचायतों को हरियाणा की कुछ पंचायतों के हालिया फैसलों से सबक लेना चाहिए, जिनके तहत उन्होंने शादी-ब्याह में दहेज न लेने, डीजे-शराब पर प्रतिबंध, कम से कम भोज और सीमित संख्या में बाराती-मेहमान बुलाने जैसे कदम उठाए हैं। देश की पंचायतों को उत्तराखंड के देहरादून की चकराता-बणगांव खत महापंचायत से भी सबक लेना चाहिए, जिसने पर्यटक युगल को लूटने, महिला के साथ बलात्कार के बाद दोनों की हत्या करने वाले चार स्थानीय टैक्सी चालकों को एक स्वर में फांसी की सजा देने की मांग उठाई। महापंचायत ने यह भी तय किया कि कोई शख्स आरोपियों की मदद नहीं करेगा और जो ऐसा करेगा, उसका सामाजिक बहिष्कार किया जाएगा। ऐसे फैसले निश्चित तौर पर पंचायतों की प्रतिष्ठा को बढ़ाते और जन-सामान्य का विश्वास मजबूत करते हैं। कोई अपराध कितना गंभीर है, इसका अंदाजा लगाने के लिए किसी डिग्री-डिप्लोमा की जरूरत नहीं होती। सामान्य व्यक्ति भी बता सकता है कि अमुक अपराध की सजा क्या होनी चाहिए, जिससे पीडि़त का दर्द खत्म नहीं, तो कम जरूर हो सके। लेकिन, बहुधा देखा जाता है कि पंचायत के पंच इस सामान्य समझ को ताख पर रख कर, मुंहदेखी बातें करते हैं। न्याय नामक बिंदु तक पहुंचने की राह में उनके सामने संबंध और प्रलोभन बाधा बन कर खड़े हो जाते हैं। यही वजह है कि वे न्याय के मंच पर बैठ कर अक्सर अन्याय कर बैठते हैं। इसका उदाहरण है, ग्रेटर नोएडा के चैपाइया पट्टी गांव की पंचायत, जिसने आठ वर्षीय बच्ची के साथ दुष्कर्म करने वाले पंद्रह वर्षीय किशोर को सिर्फ ग्यारह जूते मारने की सजा देकर मामला खत्म कराने का प्रयास किया। बच्ची के घरवाले जब शिकायत लेकर जेवर कोतवाली पहुंचे, तो पुलिस ने उन्हें बदनामी का डर दिखा कर वापस लौटा दिया। मामला पंचायत पहुंचा, तो पंचों ने किशोर को सजा तो सुनाई, लेकिन सिर्फ ग्यारह जूते। उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान से अक्सर ऐसे मामले सामने आते हैं, जिनमें पंचायतों द्वारा दिए गए फैसले बहुत कुछ सोचने के लिए मजबूर कर देते हैं। उत्तर प्रदेश के भदोही जिले की एक पंचायत ने एक नवविवाहिता की शादी महज इस आरोप पर तुड़वा दी कि वह खाना बनाते समय आटा ज्यादा गूंध देती है, जिससे अन्न बर्बाद होता है। पंचायत ने महिला को समझाने के बजाय, बिना उसका पक्ष जाने, उसे पति से अलग रहने का हुक्म जारी कर दिया। मजेदार बात यह कि महिला का पति एमए का छात्र था और उसने खुद अपनी पत्नी को अन्न की बर्बादी के प्रति सचेत न करके उस पंचायत का सहारा लिया, जिसके सदस्य न्याय नामक मानवीय गुण से कोसों दूर थे। पंचायत ने यह भी कहा कि उसका फैसला अंतिम है। इलाहाबाद के कप्सा गांव में एक विधवा के साथ दुष्कर्म का प्रयास करने वाले शख्स को पंचायत ने गांव-भोज का दंड देकर बरी कर दिया। यह शख्स गांव के एक हजार लोगों को भोजन करा कर अपने पाप से मुक्त हो गया। पीडि़त महिला चाहती थी कि उसे गांव-स्तर पर ही न्याय मिल जाए और पुलिस-मुकदमे के चक्कर में न फंसना पड़े। लेकिन उसके हाथ सिर्फ बदनामी लगी। अक्सर देखा जाता है कि पंचायतें दबाव में आकर मनमाना अथवा एकपक्षीय फैसला सुना देती हैं।

ऐसे फैसले, जो न्याय के बजाय अन्याय कर बैठते हैं और गांव के अशिक्षित व सीधे-सादे लोग उसे ईश्वर की मर्जी मान कर चुप्पी साध लेते हैं। वे तनिक विरोध नहीं करते। पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले की लाभपुर पंचायत के तेरह लोगों ने दूसरे समुदाय के युवक से प्यार करने वाली आदिवासी युवती के साथ सामूहिक बलात्कार किया। पंचायत ने पहले युवती के घरवालों पर पचास हजार रुपए का जुर्माना थोपा और जब घरवालों ने जुर्माना भर पाने में असमर्थता जताई, तो पंचायत के फरमान पर युवती के साथ सामूहिक बलात्कार किया गया। मध्यप्रदेश के इंदौर के खजराना क्षेत्र में एक प्रेमी युगल को पंचायत ने अनोखी सजा सुनाई। पंचों ने कहा कि युवक का लिंग काट दिया जाए और उसके परिवार को समाज से निकाल दिया जाए। युवक के परिवार पर ग्यारह लाख रुपए का जुर्माना भी लगाया गया और युवती को जिंदगी भर शादी न करने की सजा दी गई। इसी तरह तमिलनाडु के धर्मपुरी में एक प्रेमी युगल ने मंदिर में शादी कर ली। गैर-दलित परिवार की इस युवती के पक्ष ने पहले तो पंचायत के जरिए दबाव बनाया कि वह वापस आ जाए, लेकिन जब युवती ने अपने पिता के घर वापस आने से इनकार कर दिया, तो गैर-दलित समुदाय के करीब ढाई हजार लोगों ने एकराय होकर एक सौ अड़तालीस दलितों के घर आग के हवाले कर दिए। हालांकि युवा वर्ग कभी-कभार ऐसे फैसलों व फरमानों के खिलाफ आवाज उठाता है, लेकिन उस आवाज को पश्चिमी सभ्यता से प्रेरित और समाज से बगावत के तौर पर प्रचारित करके उसकी धार कुंद कर दी जाती है। यह एक चिंताजनक स्थिति है। आज जबकि हमारे देश की न्यायपालिका इतनी सजग है, सतर्क है और बेखौफ फैसले देने के लिए जन-सामान्य में सम्मान की नजर से देखी जा रही है, तब भी एक तीखा सच अभिशाप की तरह हमारे माथे पर चस्पां है कि न्याय गरीब-साधनहीन तबके से कोसों दूर है।
-महेंद्र अवधेश