नेपाल के पूर्व राजा ज्ञानेन्द्रशाह और भारत नेपाल संबंध

  • 2016-07-01 10:30:57.0
  • पं. बाबा नंदकिशोार मिश्र

gyanendra shah

7 जुलाई नेपाल के पूर्व नरेश श्री ज्ञानेन्द्रवीर विक्रम शाहदेव का जन्म दिवस है। नेपाल के पूर्व नरेश श्री ज्ञानेन्द्र का जन्म 7 जुलाई 1947 को हुआ। अभी वह बालक ही थे कि उनके पितामह श्री त्रिभुवनसिंह ने वनवास ग्रहण कर लिया था। तब बालक ज्ञानेन्द्रशाह को 7 नवंबर 1950 से 8 जनवरी 1951 तक नेपाल नरेश रहने का अवसर मिला। यह उनकी नाबालिगी की अवस्था थी। अपने जन्म के समय श्री ज्ञानेन्द्रशाह को ‘हिज रॉयल हाईनेस प्रिंस ज्ञानेन्द्र ऑफ नेपाल’ की उपाधि मिली थी तो 7 नवंबर 1950 से 8 जनवरी 1951 तक उन्हें ‘हिज मैजेस्टी दि किंग ऑफ नेपाल’ की उपाधि प्रदान की गयी। 8 जनवरी 1951 से 4  जून  2001 तक वह ‘हिज रॉयल हाइनेस प्रिंस ज्ञानेन्द्र ऑफ नेपाल’ के नाम से जाने गये।

जून 2001 में नेपाली राजपरिवार में हुई एक दुखद घटना के पश्चात श्री शाह को नेपाल का राजा बनाया गया। तब 4 जून 2001 से 28 मई 2008 तक श्री शाह को ‘हिज मैजेस्टी दि किंग ऑफ नेपाल’ के नाम से जाना गया। इस प्रकार उन्हें दो बार नेपाल का राजा बनने का सौभाग्य मिला है।

अपने जीवन में पूर्व नेपाल नरेश श्री ज्ञानेन्द्रशाह ने कई उतार चढ़ाव देखे हैं। वह एक संघर्षशील मनोवृत्ति के व्यक्ति हैं और परिस्थितियों को अपने अनुकूल करने की कला को भली प्रकार जानते हैं। वह नेपाल के राजा रहे हैं और इस बात के लिए पूर्णत: आश्वस्त हैं कि वह एक बार पुन: नेपाल के राजा के रूप में लौटेंगे। जैसा कि उन्होंने 2012 में एक इंटरव्यू में स्पष्ट कहा भी था। ऐसा नही है कि श्री शाह की नेपाल नरेश के रूप में वापसी का विचार श्री शाह का व्यक्तिगत ख्याली पुलाव है, सच यह है कि श्री शाह को उनके देश की जनता का एक बड़ा वर्ग भी चाहता है कि वह नेपाल की खुशहाली और विकास के लिए पुन: एक बार राजा बनें। भारत और नेपाल के मध्य संबंधों को सामान्य बनाकर मित्रतापूर्ण स्थिति में लाने के लिए सक्रिय भूमिका निभाने वाले और भारत मित्र के रूप में तेजी से उभरे श्री अर्जुन प्रसाद बस्तोला का कहना है कि नेपाल नरेश रहे श्री ज्ञानेन्द्रशाह को उनके देश के लोग असीम स्नेह करते हैं और यदि श्री शाह पुन: नेपाल नरेश बनते हैं तो इसमें नेपाली जनता की ही भूमिका होगी।

राजा श्री ज्ञानेन्द्र भारत के साथ मित्रतापूर्ण संबंधों के समर्थक हैं। उनका मानना है कि भारत के साथ नेपाल के सदियों पुराने सांस्कृतिक और रोटी बेटी के संबंध हैं जिससे दूरी नही बनायी जा सकती। राजा का मानना है कि एक उन्नत, समृद्घ और विकसित भारत नेपाली हितों के अनुकूल है जो कि नेपाल के लिए बड़े भाई की भूमिका निभा सकता है।

पूर्व नरेश का मानना है कि नेपाल के लोग भारत के साथ रहकर आत्मिक प्रसन्नता की अनुभूति करते हैं, पर पिछले दिनों से जिस प्रकार भारत को नेपाल से दूर करने का प्रयास किया गया है, उसमें अंतर्राष्ट्रीय षडय़ंत्र है। जिससे दोनों देशों को सावधान रहने की आवश्यकता है।


वैसे जहां तक भारत के हितों की बात है तो एक हिंदू राष्ट्र के रूप में प्रतिष्ठित रहा नेपाल ही भारत के हितों के अनुकूल है। नेपाल की सामाजिक और धार्मिक परिस्थितियों को जितना परिवर्तित करने का प्रयास किया जाएगा उतना ही नेपाल भारत से दूर जाएगा। जिसके दूरगामी परिणाम होंगे। यूपीए के शासनकाल में कांग्रेस अध्यक्षा श्रीमती सोनिया गांधी नेपाल गयी थीं, तो उन्हें वहां पशुपतिनाथ मंदिर में प्रवेश नही करने दिया गया था। दोनों देशों में ऐसे बहुत से लोग हैं जिनकी मान्यता है कि नेपाल को धर्मनिरपेक्ष बनाने की तैयारी उसी दिन हो गयी थी जिस दिन श्रीमती गांधी को पशुपतिनाथ मंदिर में प्रवेश से रोका गया था। पर एक बात ध्यान देने की है कि राजा ज्ञानेन्द्रशाह के रहते भारत की लगभग 1200 किलोमीटर लंबी सीमा की सुरक्षा से भारत मुक्त रहता था, पर आज भारत को इस  सीमा की सुरक्षा पर 65000 करोड़ रूपया प्रतिवर्ष खर्च करना पड़ रहा है। सोनिया गांधी ने दण्ड नेपाल को दिया या फिर भारत को दिया? यह तो किसी ने विचार ही नही किया।

नेपाल को अपनी हिंदू राष्ट्र की पहचान दिलाने के लिए राजा ज्ञानेन्द्र कहीं अधिक गंभीर हैं। वैसे हिंदू राष्ट्र नेपाल एक स्थिर भरोसेमंद और हर प्रकार से विश्वसनीय मित्र भारत के लिए हो सकता है। जिन परिवर्तनों को इस नेपाल में ‘समय की आवश्यकता’ के नाम पर होने दे रहे हैं वे वास्तव में हमारे लिए कष्टप्रद ही सिद्घ होंगे। उनके प्रति निरपेक्षभाव बरतना भारत के लिए उचित नही होगा। नेपाल के पूर्व नरेश श्री ज्ञानेन्द्र शाह के प्रयासों को बल मिलना चाहिए।

यह माना जा सकता है कि समय परिवर्तनशील है, पर समय भी हमसे बहुत से प्रश्नों के उत्तर प्राप्त करने की अपेक्षा रखता है। ऐसे प्रश्नों में से सबसे बड़ा प्रश्न है कि क्या नेपाल के पूर्व नरेश श्री ज्ञानेन्द्रशाह भारत के लिए पूर्णत: अप्रासंगिक हो चुके हैं?

दूसरा यह भी कि क्या भारत को अपनी विदेशनीति में नेपाल के परिवर्तन को अपने हितों के अनुकूल रोकने या होने देने पर विचार नही करना चाहिए। हम नेपाल के पूर्व नरेश श्री ज्ञानेन्द्रशाह के उज्ज्वल भविष्य की कामना करते हुए उन्हें हिंदू महासभा की ओर से इतना ही शुभकामना संदेश देना चाहेंगे कि वे आयुष्मान, तेजस्वी, वर्चस्वी, यशस्वी और श्रीमान हों।
बाबा नंदकिशोर मिश्र