नई संभावनाओं को स्वीकारने का समय

  • 2016-01-08 12:30:21.0
  • पीके खुराना
नई संभावनाओं को स्वीकारने का समय

शीघ्र ही हम एक बार फिर गणतंत्र दिवस मना रहे होंगे। भानु धमीजा की पुस्तक एक शुभ संकेत है जो हमें पुराने पड़ चुके विचारों को तिरोहित करके नई स्थितियों के अनुसार नई समस्याओं के नए हल तलाशने के लिए प्रेरित करती है। नई संभावनाओं की तलाश की मुहिम ही देश के गतिमान होने का सूचक होती है, जो अंतत: नवनिर्माण का कारण बनती है। आशा की जानी चाहिए कि हमारा देश नई संभावनाओं को अंगीकार करने में पीछे नहीं रहेगाज्आदमी उम्र से नहीं, विचारों से बूढ़ा होता है। जब हम नए विचार ग्रहण करना बंद कर देते हैं तो हम बूढ़े हो जाते हैं। देश के समग्र विकास के लिए यह आवश्यक है कि हम अन्य व्यक्तियों के दृष्टिकोण के प्रति दिमाग खुला रखें और उनसे लाभ लेने के लिए आवश्यक माहौल तैयार करें। युवा शक्ति की प्रशंसा इसीलिए की जाती है कि उनमें ऊर्जा तो बहुत होती है, पर पूर्वाग्रह नहीं होता और वे दूसरों के दृष्टिकोण के प्रति खुले दिमाग से सोचते हैं। अगर देश के सभी नागरिक हर मामले में युवा वर्ग के इसी दृष्टिकोण का अनुसरण करें, तो हमारा देश ‘यंगिस्तान’ बन जाएगा। ‘यंगिस्तान’ का मतलब है खुला दिमाग, दूसरों के नजरिए के प्रति सहनशीलता, नई बातें सीखने का जज्बा, काम से जी न चुराना, तकनीक का लाभ उठाने की योग्यता, प्रगति और रोजगार के नए और ज्यादा अवसर, आपसी भाईचारा तथा देश और क्षेत्र का समग्र विकास! भारतीय संविधान की मूल भावना है, ‘जनता की सहभागिता के द्वारा शासन’ यानी हमारे संविधान निर्माता हर स्तर पर आम आदमी, सरकार और प्रशासन में उसकी भागीदारी को सर्वोच्च प्राथमिकता देते थे। इसी के जरिए लोगों में रचनात्मकता, नवाचार और पहल की भावनाओं का विकास होता है। किसी भी राष्ट्र के संपूर्ण विकास में ऐसी भावनाएं अपेक्षित रहती हैं। भारतीय प्रशासनिक एवं राजनीतिक प्रणाली की संरचना इस प्रकार की गई थी कि यह एक लोक कल्याणकारी राज्य बने, जिसमें हर धर्म, वर्ग, जाति, लिंग और समाज के व्यक्ति को देश के विकास में भागीदारी के बराबर के अवसर मिलें।क्या यह संभव है कि देश के विकास में नागरिकों की सार्थक भागीदारी सुनिश्चित करके देश में सच्चे प्रजातंत्र का माहौल बनाया जाए? अगर ऐसा हो सका तो यह देश में प्रजातंत्र की मजबूती की दिशा में उठाया गया एक सार्थक कदम सिद्ध होगा। लोकतंत्र में तंत्र नहीं, बल्कि ‘लोक’ की महत्ता होनी चाहिए। तंत्र का महत्त्व सिर्फ इतना सा है कि काम सुचारू रूप से चले, व्यक्ति बदलने से नियम न बदलें, परंतु इसे दुरूह नहीं होना चाहिए और लोक पर हावी नहीं होने देना चाहिए। जब ऐसा होगा तभी हमारा लोकतंत्र सफल होगा। ऐसा वातावरण विकसित करने के लिए हमें अपने आप को बदलना होगा, हर नागरिक को अपने आप को बदलना होगा। यह काम कोई सरकार नहीं कर सकती, प्रशासन नहीं कर सकता, लोग कर सकते हैं।  हमें याद रखना होगा कि सरकारें कभी क्रांति नहीं लातीं। क्रांति की शुरुआत सदैव जनता की ओर से हुई है। अब जनसामान्य और प्रबुद्धजनों को एकजुट होकर एक शांतिपूर्ण क्रांति की नींव रखने की आवश्यकता है। ई-गवर्नेंस, शिक्षा का प्रसार, अधिकारों के प्रति जागरूकता और भय और लालच पर नियंत्रण से हम निरंकुश अधिकारियों और राजनीतिज्ञों को काबू में रख सकते हैं। हमारे देश के सामने कई समस्याएं दरपेश हैं, पर आम जनता में उनको लेकर कुंठा तो रहती है। कोई सार्थक बहस नहीं होती या और अगर यह होती भी है, तो इतने छोटे स्तर पर कि उसका प्रशासन और सरकार पर असर नहीं होता या फिर सिर्फ बहस ही होती रह जाती है।जीवन में चार तरह की स्वतंत्रताएं महत्त्वपूर्ण हैं। पहली अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, दूसरी धर्म की स्वतंत्रता, तीसरी अभावों से छुटकारा और चौथी भय से आजादी। भारतवर्ष में हमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्राप्त है, लेकिन हमारे देश में अभी अभावों से आजादी और भय से आजादी एक सपना है। शिक्षा सेवा, सामान्य चिकित्सा सेवा का अभाव, पीने योग्य पानी की समस्या, सफाई का अभाव, रोजगार की कमी, भूख और कुपोषण आदि समस्याएं, महंगाई, भ्रष्टाचार आदि समस्याएं विकराल हैं और आम आदमी को इनसे राहत की कोई राह नजर नहीं आती। पर क्या सचमुच इनका हल नहीं है? क्या इस कद्र बिगड़े हालात के लिए सचमुच सारा दोष प्रशासन और सरकार का ही है?क्या हम सेमिनार और भाषण से आगे बढक़र कुछ और नहीं कर सकते? क्या हमारे पास इन समस्याओं से छुटकारा पाने का कोई भी साधन नहीं है? गरीबी और बेरोजगारी से छुटकारा संभव है। यदि गरीबी और बेरोजगारी से छुटकारा मिल जाए तो शिक्षा, चिकित्सा, सफाई, पानी, कुपोषण, महंगाई आदि समस्याएं खुद-ब-खुद हल हो जाती हैं। बहुत से लोग अज्ञानता के कारण अथवा अपने निहित स्वार्थों की खातिर विकास के विरोध में खड़े नजर आते हैं। कई एनजीओ और राजनीतिक नेता जानते-बूझते भी विरोध की राह पकड़ते हैं और आम आदमी उनके षड्यंत्र का शिकार हो जाता है। हाल ही में ‘दिव्य हिमाचल’ के यशस्वी चेयरमैन भानु धमीजा की रचना ‘व्हाई इंडिया नीड्ज दि प्रेजिडेंशियल सिस्टम’ ने एक नया नजरिया पेश करके देश में एक नई बहस को जन्म दिया है। भानु धमीजा 18 वर्षों तक अमरीका में रहे और वहां के निजाम को बारीकी से परखा। नब्बे के दशक के अंत में वह भारत आ गए और यहां की शासन व्यवस्था को देखा, परखा और भुगता! भारतीय जनता को शासन की ओर से आने वाली कठिनाइयों को देखते हुए उन्होंने सोचना आरंभ किया। वर्षों तक शोध किया, दस्तावेज इक_े किए, उस सारी मेहनत का परिणाम उनकी इस पुस्तक के रूप में निकला।

संसदीय प्रणाली और राष्ट्रपति प्रणाली की तुलना करते हुए धमीजा बताते हैं, ‘संसदीय प्रणाली की मूल कमी यह है कि यह बहुमत का शासन नजर आती है, परंतु किसी एक दल के बहुमत की सरकार न हो तो यह अराजकता का शासन हो सकती है और यदि किसी एक दल का बहुमत हो तो एक व्यक्ति के शासन में बदल सकती है। लिहाजा सत्ता का केंद्रीकरण पूरे शासन तंत्र को नकारात्मक रूप से प्रभावित करता है। भारतीय संसद के इतिहास में दोनों तरह के उदाहरण मौजूद हैं। राष्ट्रपति प्रणाली की खासियत यह है कि यहां व्यक्ति नहीं, संस्थाएं शक्तिमान होती हैं और शक्तियों का बंटवारा तर्कसंगत होने की वजह से लोकतंत्र मजबूत होता है। इसी प्रकार संसदीय शासन प्रणाली में राज्य की महत्ता बहुत कम हो जाती है, जिससे नागरिकों का सीधा संपर्क होता है, जबकि राष्ट्रपति प्रणाली में नागरिकों को रोजमर्रा के छोटे कामों के लिए भ्रष्ट अधिकारियों का मुंह नहीं ताकना पड़ता। इससे भ्रष्टाचार पर लगाम लगती है और ‘तंत्र’ के बजाय ‘लोक’ की महत्ता सुनिश्चित होती है।’शीघ्र ही हम एक बार फिर गणतंत्र दिवस मना रहे होंगे। भानु धमीजा की पुस्तक एक शुभ संकेत है जो हमें पुराने पड़ चुके विचारों को तिरोहित करके नई स्थितियों के अनुसार नई समस्याओं के नए हल तलाशने के लिए प्रेरित करती है। नई संभावनाओं की तलाश की मुहिम ही देश के गतिमान होने का सूचक होती है, जो अंतत: नवनिर्माण का कारण बनती है। आशा की जानी चाहिए कि हमारा देश नई संभावनाओं को अंगीकार करने में पीछे नहीं रहेगा।