दुनिया के सामने नयी महामारी बनता जा रहा है मोबाइल फोन?

  • 2016-05-07 09:30:48.0
  • मृत्युंजय दीक्षित

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वैज्ञानिकों ने मोबाइल फोन का आविष्कार दुनियाभर की जनता व समाज को राहत व लाभ देने के लिए था लेंकिन अब यही मोबाइल फोन, स्मार्टफेान व सोशल मीडिया नेटवर्किग साइटस आदि दुनियाभर के लिए नयी महामारी बनकर सामने आ रही है। आज भारत भर में ही नहीं अपितु पूरी दुनियाभर के देशों में समाज के सभी वर्गो के लोग इनका उपयोग बेहिसाब ढंग से कर रहे हैं। हाल ही घटित विश्वभर की कुछ घटनाओं व हादसों की गहराई से जब जांच की गयी व अध्ययन किया गया तो पता चल रहा है कि दुनियाभर के लोग एक नयी प्रकार की महामारी नोमोफोबिया से ग्रसित हो रहे हैं। एक अध्यन से यह भी भी पता चल रहा है कि मोबाइल फोन व सोशल साइटस के अधिक इस्तेमाल करने के कारण लोगों का सामाजिक व्यवहार भी अब बुरी तरह से प्रभावित होने लग गया है। वाकई में नोमोफोबिया अत्याधुनिक डिजिटलाइजेशन के युग में एक नयी महामारी का रूप ले रहा है।

भारत में भी नोमोफेबिया के कारण कई दु:खद हादसे घटित हो चुके हैं। नोमोफोबिया आखिर है क्या ? नोमफोबिया यानी की नो मोबाइल फेान अर्थात इसका मतलब यह है कि क्या यदि  आपके पास मोबाइल फोन नहीं है तो आपको डर लगने लगता है कि अब क्या होगा ? क्या मोबाइल फोन की बैटरी समाप्त होते ही आपको बैचेनी होने लगती है ? क्या आप अपने फोन पर हर समय मैसेज और नोटिफिकेशन को चेक करते रहते हैं  ? क्या आपको अब ऐसा लगने लग गया है कि आप बिना फोन के एक भी मिनट नहीं रह सकते हैं । क्या आप इंटरनेट  कवरेज से बाहर आते ही चिड़चिड़े हो जाते हैं ? यदि आप इन सब चीजों का अनुभव करने लग गये हैं तो सतर्क हो जायें और थोडा  सा समय निकालकर अपने स्वास्थ्य के बारे में विचार करें कि कहीं आप भी नोमोफोबिया के शिकार तो नहीं हो रहे हैं।

अभी चीन से एक वीडियो आया है जो कि सोशल मीडिया में खूब वायरल हो रहा है और उसका अध्ययन भी किया जा रहा है। इस वीडियो में दिखाया गया है कि  एक महिला सडक़ पर मोबाइल फोन का उपयोग कर रही थी कि तभी अचानक से उसका दो साल का बालक अचानक से सडक़ पार करने लग गया और वह एक कार के नीचे आ गया। जब ड्राइवर को हादसे का एहसास हुआ तो उसने अपनी कार रोकी और कार से उतरकर जब बालक को उठाया तो तब तक वह दम तोड़ चुका था। इस बीच उसकी मां का ध्यान अपने बालक पर गया लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। जब घटना की जांच की गयी तो पता चला कि मां अपने मोबाइल फोन पर इतनी व्यस्त थी कि उसे अपने बालक के बारेमें पता ही नहीं था। यह तो हुई चीन के वीडियो की बात लेकिन पूरे भारतभर में तो इस प्रकार की घटनायें आम होती जा रही है।

कई अध्ययनों से यह भी पता चल रहा है कि मोबाइल फोन, स्मार्टफोन व सोशल नेटवर्किग साइटस के अधिक से अधिक इस्तेमाल करने के कारण  दुनियाभर के लोगों का सामाजिक वातावरण व व्यवहार  भी बदल रहा है। अमेरिका के  स्टेनफोर्ड विश्वविद्यालय के एक अध्ययन से पता चला है कि वहां के 75 प्रतिशत छात्र अपना पर्स ले जाना तो भूल जाते हैं लेकिन अपना स्मार्टफोन ले जाना नहीं भूलते। इसी प्रकार शोध से यह भी पता चला है कि 75 प्रतिशत से अधिक लोग सोते समय अपना मोबाइल अपने पास ही रखकर सोते हैं और सोने के पहले व बाद में अपने मोबाइल फोन के मैसेज व नोटिफिकेशन को अवश्य चेक करते हैं।  यह नोमोफोबिया नामक महामारी का एक भयानक रूप है। आस्ट्रेलिया में भी नोमोफोबिया अर्थात मोबाइल फोन की लत का असर जानने के लिये 30 हजार लोगों पर एक शोध किया गया पता लगा कि 10 में से नौ लोगों को उस समय बैचेनी होने लग जाती है जब उनके स्मार्टफोन की बैटरी समाप्त होने लग जाती है। वैज्ञानिकों का मत है कि स्मार्टफोन के स्क्रीन का अधिक उपयोग करने से मनुष्य का  फ्रंटलोब यानि की समाने का हिस्सा बुरी तरह से प्रभावित हो जाता है जिसके कारण मनुष्य में फ्रंटलोब मोटर फंक्शन, भाषा, फैसले लेने की क्षमता व सामाजिक व्यवहार बुरी तरह से प्रभवित होता है। कई मामलों में तो मनुष्य की स्मरणशक्ति भी क्षीण हो रही हे व हो जाती है।  अभी ब्रिटेन से एक समाचार आया है कि वहां पर एक महिला ने कलाई में दर्द की शिकायत लेकर डाक्टर के पास पहुची तो पता चला कि उस महिला ने क्रिसमस के दिन दिनभर व्हाइटएप से मैसेज भेजने का काम किया था जिसे बाद में चिकित्सक ने व्हाएटएपटाइटिसस का नाम दिया। भारत में भी अब मोबाइल फोन का प्रयोग बहुत ही खतरनाक ढंग से बढ़ता जा रहा है जिसके कारण लोग अवसाद व अन्या नोमोफोबिया जैसी बीमारियों से त्रस्त  होते जा रहे हैं। भारत में 24 वर्षीय एक युवक ने केवल इसलिए खुदकुशी कर ली क्योंकि उसके माता- पिता ने उसे स्मार्टॅफोन का कम उपयोग करने की सलाह दी थी। कानपुर में एक लडक़ी ने केवल इसलिए आत्महत्या कर ली क्योंकि वह कुछ नया करना चाहती  थी और इसलिए उसने केवल फेसबुक पर अपने विचारों को शेयर करने के बाद खुदकुशी कर ली। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में भी दिल दहलाने वाली घटना घटी है। यहां के एक अस्पताल में जब एक लडक़ी स्नान करने के लिए बाथरूम के अंदर गयी तो उसे लगाकि मोबाइल फोन के माध्यम से उसकी नहाते हुए तस्वीर ली जा रही है तो वह शोर मचाकर बाहर  आयी ओर केस दर्ज करने के बाद आरोपी को हिरासत में ले लिया गया। इसी प्रकार काकोरी में स्थित मदरसे में छात्र इनामुल रहमान मोबाइल पर बातें करते समय इतना व्यस्त हो गया कि उसें छत की रेलिग नहीं दिखी ।बातें करने की धुन में व दो फुट ऊंची रेलिंग से टकराकर तीन मंजिल से नीचे गिर गया। उसे अस्पताल ले जाया गया और उसकी मौत हो गयी। वहीं झारखंड में एक स्कूल में मोबाइल फोन को ही प्रतिबंधित करना पड़ा क्योंकि वहां पर लडक़े लड़कियों की फोटो ऐसे खींचते थे कि उनके स्कर्ट के नीचे का हिस्सा ही उनके मोबाइल में कैद होता था। भारत में भी मोबाइल फोन का उपयोग एक भयंकर महामारी बनता जा रहा है। फोन के अंधाधुंध प्रयोग से अब निजता का भी उल्ल्ंाधन हो रहा है तथा सामाजिक व्यवहार भी तेजी से बदल रहा है। अब आप किसी पार्टी में चले जाइये व पारिवारिक वातावरण में जायें तो  यह साफ दिखलायी पड़ जाता है कि सभी लोग अपने फोन पर ही व्यस्त हो गये हैं कोई अपानी सेल्फी लेने मे और कोई  कैमरे में तस्वीरें कैद करने में ही व्यस्त रहने लग गया है। यही हाल बच्चों का भी हो गया है । अब बच्चों को शांत करना है तो माता पिता अपने बच्चे को मोबाइल पकड़ा देते हैं जिसमें वह गेम  खेलने लग जता है जिसके कारण बच्चों की याददाश्त की क्षमता व खेलने की क्षमता बुरी तरह से प्रभावित हो रही है।