मानवाधिकार के बहाने, जलाधिकार के मायने

  • 2015-12-12 05:30:46.0
  • अरूण तिवारी

human rightsक्या गजब की बात है कि जिस-जिस पर खतरा मंडराया, हमने उस-उस के नाम पर दिवस घोषित कर दिए! मछली, गोरैया, पानी, मिट्टी, धरती, मां, पिताज्यहां तक कि हाथ धोने और खोया-पाया के नाम पर भी दिवस मनाने का चलन चल पङा है। यह नया चलन है; संकट को याद करने का नया तरीका।

संकट का एक ऐसा ही समय तक आया, जब द्वितीय विश्व युद्ध की शुरुआत हुई। वर्ष 1939 - पूरे विश्व के लिए यह एक अंधेरा समय था। उस वक्त तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति फैं्रकलिन रुजावेल्ट ने अपने एक संबोधन में चार तरह की आज़ादी का नारा बुलंद किया: अभिव्यक्ति की आज़ादी, धार्मिक आजादी, अभाव से मुक्ति और भय से मुक्ति। छह जनवरी, 1941 को अमेरिकी कांग्रेस श्री रुजावेल्ट के उस संबोधन को ’फोर फ्रीडम स्पीच’ का नाम दिया गया। चार तरह की आज़ादी की यही अपेक्षा, आगे चलकर संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा मानवाधिकार संबंधी घोषणा का आधार बनी। संयुक्त राष्ट्र की आम सभा ने 10 दिसंबर, 1948 को मानवाधिकार संबधी घोषणा की। घोषणापत्र में प्रस्तावना के अलावा 39 धारायें थी। मूल मंतव्य था, मानव के मौलिक अधिकारों का अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर संरक्षण किया जाये। उस घोषणापत्र को दुनिया की 380 भाषाओं में अनुदित किया गया। एक दस्तावेज के इतनी अधिक भाषाओं में अनुदित होना, स्वयमेव एक रिकॉर्ड बनकर गिन्नीज वल्र्ड बुक में दर्ज हो गया। घोषणापत्र, दुनिया में लागू हुआ हो या न हुआ हो, किंतु चार दिसंबर, 1950 को बैठी संयुक्त राष्ट्र संघ की आम सभा ने घोषणापत्र जारी करने की तिथि यानी 10 दिसंबर को औपचारिक रूप से ’विश्व मानवाधिकार दिवस’ घोषित कर दिया। गौर कीजिए कि संयुक्त राष्ट्र संघ की आम सभा आगे चलकर दो पहलुओं पर वैश्विक सहमति बनाने में सफल रही: पहला - आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकार; दूसरा -राजनैतिक और नागरिक अधिकार। तारीख थी -16 दिसंबर,1966। वर्ष 2015-16, एक तरह से मानवाधिकार संबंधी वैश्विक सहमति की पचासवीं वर्षगांठ है। अत: इस वर्ष को उक्त सहमति बिंदुओं को समर्पित किया गया है। संयुक्त राष्ट्र इस विषय पर एक वर्षीय अभियान चलायेगा। इस मौके पर संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव श्री बान की मून ने सभी मानवाधिकार संरक्षण तथा मौलिक आजादी की गारंटी हेतु स्वयं को पुनर्संकल्पित करने का आहृान् किया है, किंतु क्या हमें मानवाधिकार के रूप-रंग, चाल-ढ़ाल, परिभाषा से सचमुच सही-सही परिचित करा दिया गया है ? ऐसा तो नहीं कि मानवाधिकार के नाम पर एक व्यक्ति के अधिकारों की पूर्ति के लिए हम दूसरे व्यक्ति के अधिकार की पूर्ति में खलल डालने के काम में लगे हों ? मानवाधिकार पूर्ति के लक्ष्य और लक्षणों को कई उक्तियां कही गई हैं। उनका संदेश यही है कि मानवाधिकार का उल्लंघन करने का मतलब, मानवता को चुनौती देना है। जरा सोचिए, मानवता को चुनौती देकर क्या कोई मानव, मानव बना रह सकता है ?

यदि हम मानवाधिकार का वर्तमान उल्लंघन जारी रहने देते हैं, तो निश्चित जानिए कि भावी विवादों की नींव रखने वालों में हम भी शामिल हैं। हमें समझना होगा कि न्याय, जब तक पानी की तरह ऊपर से नीचे की तरफ पानी की तरह प्रवाहमान नहीं होता, अधिकार की प्राप्ति एक ऐसी शक्तिशाली नदी की तरह रहेगी, जिसे हासिल करना सहज नहीं। उससे सिर्फ आका्रंत हुआ जा सकता है। कहते हैं कि युद्ध के समय कानून शांत रहता है। ऐसे में मानवाधिकार की रक्षा कानून नहीं, बल्कि हमारी संवेदना और संकल्प के ही बूते की जा सकती है। इसकी तैयारी तभी हो सकती है कि जब हम समझें कि किसी एक के प्रति हुआ अन्याय, हम में से प्रत्येक के लिए एक चेतावनी है। अत: अन्याय के खिलाफ आज ही चेतें; आज ही अपना दायित्व समझें और निभायें। जिनसे हम सहमत हैं, यदि उनसे बातचीत जारी रखना चाहते हैं, तो हमें उनकी अभिव्यक्ति के अधिकारों की रक्षा करनी होगी, जिनसे हम सहमत नहीं हैं; वरना् तय मानिए कि कल को हम इस लायक नहीं बचेंगे कि हमारी सहमति और असहमति का कोई मतलब हो। असहिष्णुता को लेकर छिङी जंग में आमने-सामने खङे पक्षों को यह उक्ति अच्छी तरह याद कर लेनी चाहिए। दरअसल, मानवाधिकार की असली समझ..असली शिक्षा वही है, जो हमें जिंदगी के वास्तविक मुद्दों से जोङती हो और उनमें ऐसे बदलाव के लिए समर्थ बनाती हो, जिनका मानवता के लिए वाकई कोई मतलब हो। हमारे रंग-रूप, वेश-भूषा, प्रांत-बोली, अमीरी-गरीबीज् सब कुछ भिन्न हो सकते हैं, किंतु यदि अवसरों में समान हिस्सेदारी सुनिश्चित कर सकें, तो यही मानवाधिकार है। एक मानव द्वारा दूसरे मानवों के अधिकारों का सम्मान किए बगैर यह हो नहीं सकता। अपनी व्यक्तिगत आज़ादी को सामूहिक तरक्की के लिए इस्तेमाल करके यह हो सकता है; किंतु क्या यह हो रहा है ? वर्ष 2015 के इस मानवाधिकार दिवस पर सोचने के लिए यह प्रश्न काफी है। पानी के भारतीय परिदृश्य को ही लें। परिदृश्य निश्चित ही चिंतित करने वाला है। प्राकृतिक संसाधनों को अपने हक में लाने के लिए अंग्रेजी हुकूमत ने लोगों को कुदरत के दिए इस अनुपम उपहार के हक से वंचित कर दिया। हालांकि ’जिसकी भूमि-उसका भूजल’ का निजी अधिकार पहले भी भूमालिकों के हाथ था और आज भी है, लेकिन नदियां-जंगल आदि सतही स्तोत्र हुकूमत के हो गये। ’रेल नीर’ को कोई कारखाना, किसी इलाके में जाता है, और खेती पर निर्भर लोगों के हक का सारा पानी लाकर पैसा कमाता है। दिल्ली वालों के पास पैसा है, तो वे टिहरी के हक का गंगाजल, अपने शौचालयों में बहाते हैं। जेट पंप वाला, समर्सिबल और समर्सिबल वाला टयुबवैल तथा टयुबवैल वाला किसी के भी कुआं सुखाने के लिए स्वतंत्र है। इससे मानवाधिकार संरक्षण के संकल्प की रक्षा कहां हुई ? शासन ही नहीं, स्वयं हमें भी अपनी हकदारी तो ध्यान है, जवाबदारी याद करने वाले कितने हैं ? मानवाधिकार के नाम पर, क्या हमने नदी, समुद्र, तालाब, झील और न मालूम कितने जीवों से उनके जीने का हक छीन नहीं लिया ? मानवाधिकार की संकल्पना के असल मायने क्या हम भूल नहीं गये है ? सोचिए! गौर कीजिए कि हमारी सरकारों ने हमें पानी पिलाने के लिए जिन पीपीपी मॉडलों को चुनना शुरु किया है, उनमें सिर्फ पैसे वाले के लिए ही पानी है; जिसके पास पैसा नहीं है, उसके लिए पानी नहीं है। यह विडम्बना नहीं तो और क्या है कि निजीकरण के रास्ते आये जल व्यावासायीकरण के कड़वे वैश्विक अनुभवों के बावजूद हम सीखने को तैयार नहीं हैं। अनुभव यह है कि चैबीसों घण्टे निर्बाधित पानी की आपूर्ति के समझौते के एवज में यदि वसूली पूरी न हो पाये, तो टैक्स लगा दो, या पूर्व टैक्स को बढ़ा दो। कंपनियों के मुनाफे के लिए गरीबों से भी वसूली कहां का न्याय हैं ? इसी अन्याय के लिए बस स्टैंडों, रेलवे स्टेशनों तथा अन्य सार्वजनिक स्थलों से सार्वजनिक नल धीरे-धीरे गायब होने लगे हैं और निजी कंपनियों की बोतलें चारों तरफ सज उठी हैं। आजीविका और जीवनज् दोनो केे लिए पानी जरूरी है। क्या पानी पिलाना सरकार का दायित्व नहीं है ? शिक्षा, सेहत, छत, खेती, पानी और परिवहन जैसी बुनियादी जरूरतों की पूर्ति सरकार का दायित्व है। बुनियादी ढांचागत क्षेत्र में मुनाफाखोरी के प्रयासों को परवान चढाना सरकारों का दायित्वपूर्ति से भाग जाना है। दायित्व से भागने वाली ऐसी सरकारों को मानवाधिकार संरक्षक कैसे कहा जा सकता है ? सरकारों के इस शगल के कारण ही आज जीवन जीने का हमारा संवैधानिक अधिकार भी एक मजाक बनकर ही रह गया है।

भारतीय जलनीति, हमारे जलाधिकार पर स्वयंमेव एक कुठाराघात है। इसका सबसे खतरनाक कदम भूजल को निजी हक से निकालकर सार्वजनिक बनाना है। जलनीति में लिखा है - ’’भारतीय भोगाधिकार अधिनियम-1882 सिंचाई अधिनियम जैसे अन्य मौजूदा अधिनियमों में उस सीमा तक संशोधन करना पङ सकता है, जहां ऐसा प्रतीत होता है कि अधिनियम भूमि स्वामी को उसकी भूमि  के नीचे के भूजल का मालिकाना हक प्रदान करता है।’’ अपनी मंशा को और साफ करते हुए नीति कहती है कि राज्य को सेवाप्रदाता से धीरे-धीरे सेवाओं के नियामकों और व्यवस्थापकों की भूमिका में हस्तांतरित होना चाहिए। अतिदोहन रोकने के नाम पर उठाये जा रहे इस एक कदम से करोङों गरीब भ्रष्टाचार की भेंट चढने को मजबूर हो जायेंगे। जिनके पास पैसा है, वकील हैं, दलाल हैंज् वे जलनिकासी की अनुमति पा जायेंगे। गरीब, मजदूर और किसान तो कलक्टर-पटवारी-पतरौल की मेज तक भी नहीं पहुंच पायेगा। भू-मालिक से जलाधिकार छीन जायेगा, बदले में बदहाली हाथ आयेगी।