मनुस्मृति की महत्ता एवं प्रभाव

  • 2016-04-27 10:30:09.0
  • पं. बाबा नंदकिशोार मिश्र

मनुस्मृति

भारतीय साहित्य में मनुप्रोक्त स्मृति का मनुस्मृति मनुसंहिता मानवधर्मशास्त्र मानवशास्त्र आदि कई नामों से उल्लेख आता है। मनुस्मृति भारतीय साहित्य में सर्वाधिक चर्चित धर्मशास्त्र है क्योंकि अपने रचनाकाल से ही यह सर्वाधिक प्रामाणिक, मान्य एवं लोकप्रिय ग्रंथ रहा है। स्मृतियों में इसका स्थान सबसे ऊंचा है। यही कारण है कि परवर्ती काल में अनेक स्मृतियां प्रकाश में आयीं किंतु मनुस्मृति के प्रभाव के समक्ष टिक न सकीं, अपना प्रभाव न जमा सकीं, जबकि मनुस्मृति का वर्चस्व आज तक बना हुआ है।

मनुस्मृति एक विधि विधानात्मक शास्त्र है। इसमें जहां एक ओर वर्णा..... रूप में व्यक्ति एवं समाज के लिए हितकारी धर्मों, नैतिक कत्र्तव्यों, मर्यादाओं, आचरणों काा वर्णन है, वहां श्रेष्ठ समाज व्यवस्था के लिए विधानों-कानूनों का निर्धारण भी है और साथ ही मानव को मुक्ति प्राप्त कराने वाले आध्यात्मिक उपदेशों का निरूपण है। यों कहिए कि यह भौतिक एवं आध्यात्मिक शिक्षाओं का मिला जुला अनूठा धर्मशास्त्र है। इस प्रकार यह व्यक्ति एवं आज के लिए धर्मशास्त्र एवं आचारशास्त्र है तो साथ ही सामाजिक व्यवस्थाओं को सुचारू रूप में रखने के लिए संविधान भी है।

मनुस्मृति को इतना अधिक महत्वशाली, सम्मान तथा लोकप्रिय बनाने वाले कारणों में जहां इसके व्यक्ति और समाज के लिए हितकारी व्यावहारिक एवं युक्तियुक्त विधि विधान हैं, वहां इसकी प्राचीनता एवं वेदानुकूलता भी उल्लेखनीय कारण है। सर्वप्राचीन सर्वाधिक मान्य और श्रद्घेय होने से वेद की समस्त भारतीय साहित्य के मूलस्रोत हैं तभी तो मनु ने भी वेदों को ही प्रधानरूप से अपनी स्मृति का आधार बनाया है। उनकी दृढ़ मान्यता है कि-

वेदोखिलो धर्ममूलम् (मनु 2 : 6)
अर्थात-वेद ही धर्म के मूलाधार हैं।

मंत्रार्थों के साक्षाद्रष्टा ऋषि-मुनियों ने वेदों के मौलिक सिद्घांतों को समझकर ही वेदांग, ब्राह्मण, दर्शन धर्मशास्त्र आदि ग्रंथों की रचना की, जिसके मानव ज्ञान को प्राप्त करके अज्ञान को छोडक़र अपने चरमलक्ष्य मोक्ष को प्राप्त कर सकें। मनु ने भी मनुस्मृति में वर्णों एवं आश्रमधर्मों के रूप में व्यक्ति एवं समाज के लिए हितकारी धर्मों कत्र्तव्यों विधानों का वर्णन वेद के आधार पर ही किया है और धर्म जिज्ञासा में वेद को ही परम प्रमाण माना है-

‘‘धर्मजिज्ञासमानानां प्रमाणं परमं श्रुति:’’ (मनु. 2 । 13)

अर्थात धर्म की जिज्ञासा रखने वालों के लिए वेद ही परम प्रमाण है। उन्सी से धर्म अधर्म का निश्चय करें। मनु की वेदों के प्रति गहन श्रद्घा है। वे वेदों को अपौरूषेय मानने हैं। क्योंकि वेदज्ञान अपौरूषेय होने से निभ्र्रान्त ज्ञान है, धर्म का मूल स्रोत है एवं परमप्रमाण है अत: वह कुतर्कों द्वारा खण्डनीय है। जो कुतर्क आदि का आश्रय लेकर वेदज्ञान का खण्डन अवमानना या निंदा करता है उसे वे नास्तिक जैसे तिरस्कारपूर्ण शब्द से संबोधित करते हैं-

ते सर्वार्थेष्वमीमांस्ये ताभ्यां धर्मो हि निर्बभौ।।
योअवमन्येत ते मूले हेतु शास्त्राश्रयाद द्विज।
स साधुभिर्बहिष्कार्यों नास्तिको वेदनिन्दक:

अर्थात-श्रुति और स्मृति ग्रंथों की किसी भी अवस्था में आलोचना नही करनी चाहिए क्योंकि उन्हीं से धर्म की उत्पत्ति हुई है। वही धर्म के मूल स्रोत हैं। जो व्यक्ति तर्कशास्त्र का आश्रय लेकर कुतर्क आदि से उनकी अवमानना निंदा करता है तो साधु श्रेष्ठ लोगों को चाहिए कि उसे समाज से बहिष्कृत कर दें क्योंकि वेद की निंदा करने वाला वह व्यक्ति नास्तिक है।

मनुस्मृति को गौरव प्रदान कराने वाले कारणों में यह कारण भी विशेष स्थान रखता है कि मनु अपने समय के एक प्रख्यात तत्वद्रष्टा, धर्मवेत्ता ऋषि थे और अपने समय में धर्मनिष्ठ, न्यायकारी प्रजाप्रिय शासक रहे थे। इसका प्रमाण मनुस्मृति की भूमिका में उल्लिखित वचनों से मिलता है। जिज्ञासु ऋषियों ने धर्मज्ञान के लिए महर्षि मनु को चुना, क्योंकि अपने समय के वही एकमात्र अधिकारी एवं विशेषज्ञ विद्वान थे जो धर्मों को यथार्थरूप में बतला सकते थे। धर्मों के मूलस्रोत अपौरूषेय अचिन्त्य अपरिमित ज्ञान वाले वेदों के ज्ञाता और उनमें निर्दिष्ट धर्मों के ज्ञाता केवल मनु ही हैं ऐसा ऋषियों ने अनुभव किया। निश्चय ही मनु अतिमतौजा-अत्यधिक ज्ञानशक्ति से संपन्न व्यक्ति थे। इस बात से भी उनकी अगाध विद्वत्ता का संकेत मिलता है कि उन्होंने धर्मप्रवचन का अधिकार केवल उन्हीं विद्वानों को दिया है जिन्होंने पूर्ण ब्रह्मचर्यपालन करते हुए धर्मपूर्वक सांगोपांग वेद पढ़े हैं और जिन्होंने वेदार्थों का प्रत्यक्ष किया है वे ही धार्मिक और परोपकारी विद्वान धर्मनिर्णय करने के अधिकारी हैं। उन्हीं के वचन और आचरण धर्म में प्रमाण माने जा सकते हैं। जो व्यक्ति धर्मनिर्णय में केवल उपर्युक्त विद्वानों को ही प्रमाण मान रहा है वह स्वयं विशिष्ट विद्वान अवश्य रहा होगा, फिर ऐसे अधिकारी विद्वान द्वारा प्रोक्त धर्मशास्त्र की प्रामाणिकता और महत्ता को कौन नही स्वीकार करेगा? यही कारण है कि समस्त भारतीय साहित्य में मनु के वचनों को आदर की दृष्टि से देखा गया है और प्रामाणिक माना है। यहां कुछ भारतीय एवं भारतीयेतर उदाहरण प्रस्तुत किये जाते हैं, जिनसे मनुस्मृति की महत्ता, प्रामाणिकता, प्रभावशालिता एवं लोकप्रियता का निश्चय आसानी से किया जा सकता है।
क्रमश:
नंदकिशोर