मेनका गांधी का पशुप्रेम और नीलगाय

  • 2016-06-26 05:44:03.0
  • देवेंद्र सिंह आर्य

Maneka Gandhi

केन्द्रीय मंत्री श्रीमती मेनका गांधी अपने पशुप्रेम के लिए विशेष रूप से जानी जाती हैं। पशुप्रेम के माध्यम से वह पर्यावरण संरक्षण का संदेश देना चाहती हैं और समाज को इस ओर सोचने के लिए प्रेरित करती रहती हैं। इस समय श्रीमती मेनका गांधी ने केन्द्र सरकार में महिला एवं बाल विकास मंत्री हैं।

अभी पिछले दिनों श्रीमती मेनका गांधी ने नीलगाय नामक पशु के न मारने की वकालत की है। यह नीलगाय इस समय किसानों की फसल को उजाडऩे में सबसे अधिक सहायक सिद्घ हो रही है। बेचारा किसान सर्दी, गर्मी, बरसात की चिंता न करके रातों रात अपने खेतों पर रखवाला बनकर बैठा रहता है। क्योंकि रात्रि में अक्सर ये नीलगायें किसानों के खेतों में झुण्ड के रूप में हमला करती हैं और बड़ी मात्रा में खेती को उजाड़ डालती हैं। किसानों को शिकायत है कि उनकी फसल की सुरक्षा इन नीलगायों से की जाए।

इस पर केन्द्रीय मंत्री श्रीमती मेनका गांधी का कहना है कि नीलगाय की हत्या करना उचित नही है। इसको लेकर श्रीमती गांधी की अपने ही साथी एक केन्द्रीय मंत्री से नोंकझोंक भी हो गयी है।

वास्तव में श्रीमती गांधी जिस पशु को नीलगाय कह रही हैं वह नीलगाय है ही नही। उन जैसी पशुप्रेमी महिला से यह अपेक्षा की जाती है कि वह स्वयं यह स्पष्ट कर देतीं कि नीलगाय वास्तव में कौन सा पशु है? जिस पशु को नीलगाय कहा जा रहा है वह नीलगाय न होकर ‘रोज’ नामक पशु है। मुझे भी नीलगाय को हिसार के चिडिय़ाघर में देखने का अवसर मिला था। नीलगाय की शारीरिक आकृति लगभग देशी गाय के जैसी ही होती है, नीलगाय और हमारी देशी गाय में एक मौलिक अंतर यह है कि नीलगाय के खुर घोड़े की सुम की आकृति जैसे होते हैं, अर्थात वह बीच से खुला हुआ या फटा हुआ नही होता, अपितु गोलाकार होता है, घोड़े के खुर की यह बनावट उसे तेज दौडऩे में सहायता करती है। नीलगाय भी तेज दौड़ जाती है तो उसका कारण उसके खुरों की बनावट है। नीलगाय और गाय के इस मौलिक अंतर के अतिरिक्त नीलगाय की गर्दन में नीचे की ओर लगभग आधा फुट से एक फुट नीले रंग के मोर के पंख जैसे चमकदार बाल होते हैं, जो इस पशु को प्राकृतिक सौंदर्य प्रदान करते हैं। नीलगाय के ये चमकदार बाल उसे अन्य पशुओं से अलग करते हैं। ये चमकदार बाल अगले पैरों के बीच वाली गद्दी तक जाते हैं। इसके अतिरिक्त नीलगायों के कानों पर भीतर की ओर लंबे नीले काले बाल होते हैं।

अब जिस पशु को हम नित्यप्रति देखते हैं इनके घोड़े जैसी सुम तो होती है, लेकिन इसकी गर्दन पर मोरपंख जैसे नीले रंग के बाल नही होते हैं। इस रोज नाम के पशु की गर्दन अपेक्षाकृत नीलगाय की गर्दन से कुछ अधिक लंबी होती है। इसका संपूर्ण विकसित शरीर भी नीलगाय की तुलना में छोटा होता है, इस प्रकार नीलगाय और रेाज में अंतर स्पष्ट हो जाता है। इन्हें पहचानना कोई बड़ी बात नही है, परंतु इसके उपरांत भी रोज नामक पशु को ही नीलगाय माना जा रहा है। इस भ्रांति का निवारण किया जाना आवश्यक है। नीलगाय शब्द के बोले जाने से हिंदुओं की धार्मिक भावनाएं उभर आती हैं। जिससे एक अनावश्यक विवाद उत्पन्न होने की संभावना बनी रहती है।

सन 2000 ई. में जनपद गौतमबुद्घ नगर के तत्कालीन जिलाधिकारी से कई गांवों के किसानों को लेकर मैं मिला था। जिलाधिकारी को मैंने रोज व नीलगाय का अंतर स्पष्ट किया था। इस पर जिलाधिकारी ने किसानों की फसल उजाडऩे में सहायक रोज नामक पशु का वध करने के आदेश भी उस समय दिये थे। मेरा मंतव्य किसी भी पशु के वध को प्रोत्साहित करना कराना नही है। पशु हिंसा निषेध भी किन्हीं परिस्थितियों में आवश्यक ही नही अनिवार्य भी है। इसलिए पशुहिंसा निषेध कराने का श्रीमती मेनका जी का विचार उचित ही है। पर जिस रोज नामक पशु के द्वारा हमारे किसानों की फसल नष्ट हो रही है उनका उपाय खोजना भी आवश्यक है।

हमारा किसान तो वैसे ही फसल उत्पादन का उचित मूल्य न मिल पाने से पहले ही खिन्न है और आत्महत्या कर रहा है। किसानों को इस प्रवृत्ति से रोका जाना नितांत आवश्यक है। इसके लिए रोज नामक पशु को किसानों की फसल उजाडऩे या नष्ट करने से रोकने के लिए श्रीमती गांधी इन पशुओं को पकडक़र जंगलों की ओर छुड़वा सकती है। ऐसे स्थानों पर भी इन्हें छोड़ा जा सकता है जो कि वनाच्छादित हों, या फिर ऐसे स्थानों पर भी ले जाया जा सकता है जहां एक बड़े क्षेत्र की बाड़ाबंदी हो गयी हो और जिसमें इन पशुओं के खाने पीने की कमी ना हो, पर ये चार दीवारी लांघकर बाहर जाने में असमर्थ हों। हमारा मानना है कि केवल बहस करने से काम नही चलेगा कार्य तो करना पड़ेगा। यदि उपरोक्त ढंग को अपनाया जाता है तो इससे जहां पर्यावरण की रक्षा होगी वहीं श्रीमती गांधी के बयान और उनके पशुप्रेम की रक्षा भी स्वयं ही हो जाएगी।