मजबूत केंद्र से कमजोर होती सुरक्षा

  • 2016-02-25 12:30:40.0
  • उगता भारत ब्यूरो
मजबूत केंद्र से कमजोर होती सुरक्षा

एक मजबूत केंद्र भारतीय बहुलवाद और विविधता की इच्छा को पूरा नहीं कर सकता। देश का क्षेत्रवाद भाषायी या सांप्रदायिक आधार पर टिका हुआ है। लिहाजा जरूरी है कि हमारी शासकीय पद्धति इसे अनिवार्य रूप से संबोधित करे। भाषा या पंथ के आधार लोगों की मिलनसारिता का कोई नुकसान होने वाला नहीं है। यह गुण उन्हें एक समुदाय के तौर पर मिल-जुलकर जीने का व्यावहारिक रास्ता दिखाता है और पहचान की भावना उन्हें गर्व की अनुभूति करवाती हैज्

भारत के संस्थापकों ने स्वतंत्र राज्यों के साथ एक मजबूत केंद्र की संकल्पना गढ़ी थी, लेकिन उनका यह प्रयोग विफल रहा। हमारी राज्य सरकारें पूरी तरह से जवाबदेह नहीं हैं। वे अपने अस्तित्व और आर्थिक संसाधनों के लिए केंद्र पर निर्भर हैं। सामान्यत: लोग स्थानीय प्रभावहीन प्रशासन अथवा ऐसे शासन के सहारे छोड़ दिए गए हैं, जिनका स्थानीय मुद्दों से कोई वास्ता नहीं है। यह शासन को उसी बिंदु पर पंगु बना देता है, जहां पर वह जनता को सबसे ज्यादा स्पर्श करता है। भारत का तथाकथित मजबूत केंद्र आज भी वास्तविक प्रतिनिधित्व या भागीदारी से कोसों दूर खड़ा दिखाई देता है। इसका सबसे भयावह पक्ष यह है कि ऐसी व्यवस्था राष्ट्रीय सुरक्षा और मजबूती प्रदान करने के बजाय इसे खतरे में डाल रही है।

यहां पर देश के दो सवेंदनशील सीमावर्ती राज्यों, जम्मू-कश्मीर और अरुणाचल प्रदेश का जिक्र करना जरूरी हो जाता है। एक तरफ जहां जम्मू-कश्मीर कुछ महीनों से बिना सरकार के है, वहीं अरुणाचल में सरकार गठन को लेकर काफी उठापटक देखने को मिली। जम्मू-कश्मीर में पीडीपी अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती भाजपा के साथ मिलकर सरकार गठन को करीब एक महीने से पुनर्विचार कर रही हैं। उनके पिता मुफ्ती मोहम्मद सईद का मुख्यमंत्री पद संभालने के करीब नौ माह बाद ही देहांत हो गया था और उसके बाद से गठबंधन को आगे बढ़ाने या भंग करने का निर्णय महबूबा ने विचाराधीन रखा है। यह पहली मर्तबा नहीं हो रहा है कि यह राज्य बिना प्रतिनिधित्व वाली सरकार के हो। गठबंधन वाली सरकारों में किसी एक दल द्वारा समर्थन वापस लेने की वजह से यह राज्य छह बार केंद्र के शासन को झेल चुका है। 2015 के शुरू में स्पष्ट बहुमत न मिलने पर भी सरकार गठन के लिए पीडीपी और भाजपा में 49 दिनों की लंबी खींचतान चली थी। नब्बे के दशक में भी राज्य में लगातार सात वर्षों तक राज्यपाल शासन लागू रहा, क्योंकि उस दौरान आतंकी रक्तपात की वजह से चुनाव नहीं हो सके थे। कुछ दिन पूर्व अमरीका से विदेशी मामलों पर प्रकाशित होने वाली एक पत्रिका में प्रकाशित हुआ था, ‘आज की कश्मीर घाटी की स्थिति चिंताजनक ढंग से 1980 के कश्मीर सरीखी दिखती है, जब इस क्षेत्र में आतंकवाद पैदा हुआ था और जिसके कारण भारत-पाक सीमा की स्थिरता प्रभावित हुई थी।’ ठीक इसी तरह सीमांत अरुणाचल प्रदेश भी कई महीने बिना किसी प्रभावी सरकार के रहा। लोकतांत्रिक तरीके से चुनी हुई सरकार को महज एक व्यक्ति यानी राज्यपाल के कहने पर केंद्र ने भंग कर दिया। राज्यपाल की सत्ता और मुख्यमंत्री के अधिकारों संबंधी मामला कोर्ट तक पहुंचा और इसी बीच एक नए तरह के गठबंधन ने आकार लिया। यह वैचारिक दृष्टि से विरोधी दलों के मामूली बहुमत पर आधारित है।

यह गठबंधन कितने दिनों तक चलेगा, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है। केंद्र के इस अनुचित दखल के कारण राज्य की जनता में पैदा हुए असंतोष से क्षेत्रीय समाचार पत्र भरे पड़े थे। इस कपटी राजनीति से सुरक्षा को पैदा होने वाले खतरों पर  एक समाचार पत्र ने लिखा था कि इस तरह के छल से तंग आकर ‘कश्मीरियों ने दिल्ली दरबार की राजनीति से घृणा करनी शुरू कर दी है।’ आगे इसने लिखा था, ‘इस तरह की गलतियां अरुणाचल प्रदेश में दोहराने से बचना होगा, जिसे लंबे समय से चीन अपने कब्जे में लेने के लिए प्रयासरत है।’ आज सुरक्षा यहां दांव पर लगी हुई है, क्योंकि अरुणाचल में केंद्र के हस्तक्षेप की वजह वहां की कमजोर शासन व्यवस्था नहीं, बल्कि यह राजनीति से प्रेरित था। भारतीय इतिहास मेें जब-जब भी किसी राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू हुआ है, इसके पीछे केंद्र में बैठे दल की राजनीतिक हसरतें जिम्मेदार रही हैं। इसने साफ तौर पर हिंसा को बढ़ावा दिया है। जब गहराई में बसे क्षेत्रवाद की अभिव्यक्ति या भागीदारी को दबाने का प्रयास किया जाता है, नागरिक इसके खिलाफ असंवैधानिक रास्ते अपना लेते हैं। यही कारण है कि भारतीय राज्यों में अलगाववादी आंदोलन या बगावत को पर्याप्त अवसर मिलता रहा। ‘वर्किंग इन ए डेमोक्रेटिक इंस्टीच्यूशन : दि इंडियन एक्सपीरियंस’ में भारतीय संविधान के विशेषज्ञ ग्रैनविल ऑस्टिन ने लिखा था, ‘केंद्र व राज्य सरकारों की वास्तविक शिकायतों को सुनने तथा हल करने के प्रति अनिच्छा तथा विकेंद्रीकरण के जरिए सहभागिता को न बढ़ाने के कारण स्थितियां बिगड़ी हैं।’

देश के क्षेत्रीय समूहों में हिंसक गतिविधियों को रोकने में भारतीय संघवाद विफल रहा है। तमिल, सिख, कश्मीरी और नगा समुदाय के अलगाववादी आंदोलनों ने गणतंत्र की स्थापना के कुछ ही वर्षों बाद जन्म ले लिया था और ये आज भी किसी न किसी रूप में हमारे समक्ष हैं। 1967 में पश्चिम बंगाल से शुरू हुआ कम्युनिस्ट (माओवाद) आंदोलन लगातार हिंसक रूप धारण करता जा रहा है। अब तक यह बिहार, झारखंड और देश के कई अन्य हिस्सों में अपनी जड़ें जमा चुका है। वर्ष 2010 में भारतीय सेना में मेजर जनरल पद से सेवानिवृत्त हुए अशोक मेहता ने एक रिपोर्ट में कहा था, ‘1947 में आजादी मिलने के बाद से भारत द्वारा लड़े गए पांच युद्धों की अपेक्षा आंतरिक असुरक्षा से हमने ज्यादा जानें गंवाई हैं।’ उस दौरान उन्होंने इस बात का भी जिक्र किया था कि वर्ष 2010 तक माओवादी देश के 20 राज्यों में अपनी उपस्थिति दर्ज करवा चुके थे

और इनमें से आठ राज्यों के बड़े जनजातीय वन क्षेत्र को इन्होंने अपने नियंत्रण में ले लिया था। विभाजन के दशकों बाद आज भी पंजाब, पश्चिम बंगाल, असम और कश्मीर को कई सांप्रदायिक घटनाएं झेलनी पड़ रही हैं। अभी हाल में ही उत्तर प्रदेश समेत देश के कई अन्य हिस्सों में सांप्रदायिक दंगों की लपटें उठी थीं।

गणतंत्र बनने की शुरुआत से ही भारत के ‘मजबूत’ केंद्र के दृष्टिकोण के विरोध में सुर उठने शुरू हो गए थे। वर्ष 1957 में सी राजगोपालाचार्य ने विचार किया था कि ‘अपकेंद्री हित’ के समाधान के तौर पर राज्यों को अधिक स्वायत्तता प्रदान की जानी चाहिए। उनका मानना था कि केंद्रीकरण बेतुका और चेतावनीपूर्ण’ है। भारत का शासन तंत्र क्षेत्रीय आकांक्षाओं को नजरअंदाज करके आगे नहीं बढ़ सकता। आज भारतीय तंत्र को सबसे ज्यादा जरूरत इस बात को सुनिश्चित करने की है कि कोई भी समूह या क्षेत्र किसी दूसरे समूह या क्षेत्र अथवा अल्पसंख्यकों के अधिकारों का अतिक्रमण न करे।

भारतीयों को आज इसी तरह के संघवाद की तीव्र इच्छा है। वर्ष 1985 में सिख अकाली दल ने साहस के साथ कहा था, ‘कोशिश कीजिए कि भारत वास्तविक रूप में संघवाद बन सकें और सभी राज्यों को केंद्र में समान प्रतिनिधित्व हासिल हो।’ 2012 में जब केंद्र सरकार नीति निर्माण संबंधी एक नई संस्था, नेशनल काउंटर टेररिज्म सेंटर का राज्यों से चर्चा के बगैर गठन करने लगी थी, तो उस पर काफी हो हल्ला मचा था। संविधान के एक प्रख्यात विशेषज्ञ सुभाष कश्यप ने इसे ‘संवैधानिक अनपढ़ता के कारण पैदा हुए औपनिवेशक काल के दुखदायी खुमार अथवा संविधान के रूप को बिगाडऩे का सोचा-समझा प्रयास’ करार दिया था। उसी वर्ष पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल ने विधानसभा में घोषणा की थी, ‘जब तक वास्तविक संघवाद प्रणाली को नहीं अपना लिया जाता, तब तक देश समृद्ध नहीं हो सकता।

-भानु धमीजा

( भानु धमीजा लेखक, चर्चित किताब ‘व्हाई इंडिया नीड्ज दि प्रेजिडेंशियल सिस्टम’ के रचनाकार हैं )