महर्षि दयानंद सोलह कला सम्पूर्ण थे

  • 2015-11-01 05:30:50.0
  • अमन आर्य

महर्षि दयानंद का जीवन तप और त्याग से भरपूर था। योगिराज भगवान कृष्ण के पस्चात अगर कोई सोलह कला सम्पूर्ण था तो ऋषि दयानंद ही थे। इन कलाओ का संछिप्त वर्णन इस प्रकार है ।


1) त्याग - महाराजा उदयपुर ने लाखो रूपए की गद्दी भेट की मगर महर्षि दयानंद ने उसे त्याग दिया ।


2) निर्भय -महाराजा जोधपुर के साथ नन्ही जान को देख लेने पर कहा की शेर की गोदी में कुतिया शोभा नहीं देती ।


3) शारीरिक बल - राव करणसिंह की तलवार छीनकर टुकड़े टुकड़े कर दिये ।


4) वैराग्य - बहिन और चाचा की मृतयु पर ऐसा वैराग्य हुआ की सन्यासी बन जाने पर पीछे मूढ़ कर नहीं देखा बल्कि सरे संसार का उपकार किया।


5) ब्रम्हचर्य - राजा विक्रमसिंह की दो घोड़ो की बग्घी को पीछे से एक हाथ से रोक दिया ।


6) तप - हिमालय पर्वत की सर्दी में कोपीन (लंगोटी) पहनकर कई वर्ष लगातार तप किया ।


7) नम्रता - महर्षि ने कहा यदि में कपिल ,कानाद के समय होता तो साधारण विद्वानों में गिना जाता ।आप तो हमे ऋषि महर्षि कहते हो ।


8) सत्य - सचाई मुझे कोई तोप के गोले के सामने खड़ा करके पूछे तो भी में सत्य ही कहूँगा की वेद् ही सत्य ग्रन्थ है ।dayanand_400


9) उपकार - हमे अपनी उन्नति में संतुष्ट नहीं रहना चाहिए किन्तु सबकी उन्नति में अपनी उन्नति समझनी चाहिए।


10) अहिंसा - गोकरुणानिधि लिखकर अहिंसा का पाठ पढ़ाया ।


11) सहनशीलता - ऋषि एक जगह उपदेश कर रहे थे की लोगो ने इटो की वर्षा कर दी ।ऋषि ने हस्ते हुए कहा आज जो लोग इटो की वर्षा कर रहे है कुछ दिनों में ही वो हमारे ऊपर फूलो की वर्षा करेंगे ।


12)दया - हत्यारे जगन्नाथ को जेब से रुपयो की थैली दे कर कहा के तुम नेपाल देश को भाग जाओ और अपनी जान बचा लो में किसी को कैद कराने नहीं आया संसार को कैद से छुढाने आया हूं।


13)धर्म - महर्षि ने जीवन भर वेदिक धर्म का प्रचार किया ।


14) ज्ञानवान


15)विद्यावान


16)तेज - वैश्या बदनाम करने आई महर्षि के चेहरे के तेज को देख कर इतनी प्रभावित हुई की जेवर उतार कर महर्षि के चरणों में रख दिए और संकल्प किया की आज से वैश्य कर्म नही करुँगी ।महर्षि ने कहा की माता में सन्यासी हूं में इन् जेवरों का क्या करूँगा इन्हें ले जाओ ।


NOTE
-दीपावली (निर्वाण दिवस) को इन कलाओ को याद कर उनको श्रधांजलि अर्पित करे ।