महगाई के दौर में गरीब की दाल कैसे गलेगी

  • 2016-04-23 08:30:46.0
  • प्रमोद भार्गव

महगाई के दौर

कालाबाजारी और जमाखोरी के चलते एक बार फिर दालों की कीमतें आसमान छूने को उत्सुक हैं। हालांकि केंद्र सरकार इस जमाखोरी पर नजर रखे हुए है। केंद्रीय पर्यावरण एवं वनमंत्री प्रकाश जावडेकर ने सभी राज्यों को जमाखोर व्यापारियों के खिलाफ कड़ाई बरतने के निर्देश दिए हैं। दालों में उछाल का दूसरा कारण महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, राजस्थान और झारखंड में पड़ा सूखा भी है। दालों की पैदावार में बढ़ोतरी के लिए सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य में दो सौ रुपए प्रति क्विंटल की वृद्धि करने पर विचार कर रही है। धान पर भी साठ रुपए प्रति क्विंटल की मूल्यवृद्धि हो सकती है। ये सिफारिशें कृषि लागत व मूल्य आयोग (सीएसीपी) ने कृषि मंत्रालय से की हैं। बावजूद सरकार दालों की सट्टेबाजी रोकने के लिए दालों को वायदा व्यापार की सूची से बाहर क्यों नहीं कर रही है, यह समझना मुश्किल है। दालों का इस सट्टे के लिए बड़े पैमाने पर भंडारण किया जा रहा है।

आहार में पौष्टिक तत्त्वों का कारक मानी जाने वाली दालें, बढ़ते दामों के कारण गरीबों की पहुंच से दूर होती जा रही हैं। ये हालात मानसून के दौरान औसत से कम बारिश होने से तो उत्पन्न हुए ही, किसान के नकदी फसलों की ओर रुख करने के कारण भी हुए हैं। यही नहीं, यह स्थिति इसलिए भी बनी, क्योंकि गलत नीतियों के चलते किसानों को खाद्यान्न के बजाय, ईंधन, प्लास्टिक और फूलों की फसल उगाने के लिए प्रोत्साहित करने की खातिर कृषि विभाग ने जागरूकता अभियान चलाया। यही वजह रही कि भूमंडलीकरण के दौर में दालों की पैदावार लगातार कम होती चली गई। बीते चार चाल में दाल का रकबा लगभग पंद्रह हजार हेक्टेयर कम हुआ है। नतीजतन दाल-उत्पादन में दो दशक पहले आत्मनिर्भर रहा भारत, ऊंची कीमतों पर दालें आयात के लिए विवश हो गया है।

हमारे यहां दलहन का कुल उत्पादन चालू फसल वर्ष में 1.73 करोड़ टन हुआ है, जबकि पिछले साल 1.71 करोड़ टन हुआ था। मगर 2013-14 में दलहन का कुल उत्पादन 1.93 करोड़ टन था। इस लक्ष्य तक पहुंचना अब मुश्किल दिखाई दे रहा है। जबकि भारत में दालों की सालाना खपत 220 से 230 लाख टन है। मांग और आपूर्ति के इस बड़े अंतर के चलते जमाखोरों और दाल के आयातक व्यापरियों के खूब बारे-न्यारे हो रहे हैं। दाल के क्षेत्र में कृषि दुर्दशा का लाभ बहुराष्ट्रीय कंपनियां भी धड़ल्ले से उठा रही हैं। यही वजह है कि आंकड़ों में थोक महंगाई दर भले शून्य के नीचे चली गई हो, पिछले सत्रह महीनों में दालों की कीमतों में चौंतीस फीसद तक की वृद्धि दर्ज की गई है।

पौष्टिक आहार देश के हरेक नागरिक के स्वास्थ्य से जुड़ा अहम प्रश्न है। दालें प्रोटीन और पौष्टिकता का महत्त्वपूर्ण जरिया हैं। पर बढ़ते दामों के कारण यह नौबत आ गई है कि कम आमदनी वाले लोगों के लिए दालें खाना मुश्किल हो गया है। हालात इतने खराब हैं कि दालों का आयात टाल दिया जाए तो इनकी कीमतें आसमान छूने लग जाएंगी। फिर हाशिये के लोगों के अलावा बहुत-से मध्यवर्गीय परिवारों की थाली से भी दाल गायब होती जाएगी। दाल व्यक्तिकी सेहत से जुड़ी है और बीमारी की हालत में तो रोगी को केवल दाल-रोटी खाने की सलाह चिकित्सक देते हैं। वर्ष 1951 में दालों की प्रतिव्यक्ति उपलब्धता साठ ग्राम थी, जो वर्ष 2010 में घट कर चौंतीस ग्राम रह गई। जबकि अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार यह मात्रा अस्सी ग्राम होनी चाहिए। यही स्थिति बनी रही तो कुछ तबकों पर ही नहीं, देश के मानव-विकास सूचकांक पर भी इस कमी का विपरीत असर पड़ेगा।

दालें भारत में प्रोटीन का प्रमुख स्रोत मानी जाती हैं। लेकिन स्थानीय मांग पूरी करने के लिए दाल उत्पादन में किसान को बड़ी मशक्कत करनी पड़ती है। तुअर दाल की फसल आठ माह में तैयार होती है। बावजूद किसान को उचित दाम नहीं मिलते हैं। गोया, किसान साल में एक फसल उगाने में रुचि कैसे लें? विदेशों में रहने वाले भारतीय भी सबसे ज्यादा तुअर की दाल खाना पसंद करते हैं। दलहन में देश में सबसे अधिक चने और अरहर की खेती होती है। चना का उत्पादन सत्तर लाख टन प्रतिवर्ष है, वहीं अरहर की पैदावार सत्ताईस लाख टन है। दलहन के कुल उत्पादन में इनका योगदान क्रमश: इकतालीस फीसद और सोलह फीसद है। इनके अलावा मूंग और उड़द की दालें पैदा होती हैं।

देश में दस राज्यों के किसान दालों की खेती करते हैं। इनमें सबसे अधिक उत्पादक राज्य महाराष्ट्र है। दालों के कुल उत्पादन में महाराष्ट्र की भागीदारी करीब पच्चीस फीसद है। इसके बाद कर्नाटक में 13.5 फीसद, राजस्थान में 13.2 फीसद, मध्यप्रदेश में दस फीसद और उत्तर प्रदेश में आठ फीसदी दालें उगाई जाती हैं। दालें मुख्य रूप से खरीफ की फसल हैं, जो वर्षा ऋतु में बोई जाती हैं। इस ऋतु में कारीब सत्तर प्रतिशत दालों की पैदावार होती है। पर औसत से कम बारिश होने के कारण अधिकतर राज्यों में फसल चौपट हो गई है। इस कारण दालों के दामों में उत्तरोत्तर वृद्धि तो हो ही रही है, आयात की मात्रा भी बढ़ानी पड़ रही है। नतीजतन विदेशी मुद्रा भी बड़ी मात्रा में खर्च हो रही है।

वाणिज्य एवं उद्योग मंडल का मानना है कि दालों की मांग और आपूर्ति के बीच संतुलन बनाए रखने के लिए सरकार को एक करोड़ टन दालें आयात करनी होंगी। वित्तवर्ष 2013-14 में 1.9 अरब डॉलर की दालें आयात की गई थीं। जबकि 2014-15 में आयात में 36.8 प्रतिशत की वृद्धि हुई, यानी 2.6 अरब डॉलर की दालें आयात की गईं। 2015-16 में पचपन लाख टन दालें व्यापारियों के जरिए आयात की गई हैं। यह आंकड़ा पिछले वित्तवर्ष की तुलना में दस लाख टन अधिक है।

तय है, दाल के क्षेत्र में डरावनी तस्वीर पेश होनी है। केंद्र सरकार ने इस वर्ष के आम बजट में राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन के अंतर्गत दलहनी फसलों की उत्पादकता बढ़ाने के लिए पांच सौ करोड़ रुपए का प्रावधान किया है। दालों की उत्पादकता बढ़े इस मकसद से वर्ष 2016 को ‘दलहन उत्पादन वर्ष’ घोषित किया गया। उपभोक्ता मामलों के केंद्रीय मंत्रालय के अनुसार दालों के तात्कालिक भाव एक सौ पचहत्तर रुपए से दो सौ रुपए किलो तक हैं। भावों में इस उछाल का कारण जमाखोरी और सट््टेबाजी के साथ आयात का कुच्रक है। टाटा, मंहिद्रा, ईजी-डे और रिलायंस जैसी बड़ी कंपनियां जब से दाल के व्यापार से जुड़ी हैं, ये जब चाहे तब मुनाफे के लिए दाल से खिलवाड़ करने लग जाती हैं। जब कंपनियां बड़ी मात्रा में दालों का भंडारण कर लेती हैं, तो भावों में कृत्रिम उछाल आ जाता है। मीडिया दाल के बढ़ते भावों को गरीब की थाली से जोड़ कर उछालता है। तब सरकार दाल के आयात के लिए विवश हो जाती है।

देशी-विदेशी कंपनियों के हर हाल में पौ-बारह रहते हैं। प्रशासन अक्सर इनके गोदामों पर छापे डालने का जोखिम नहीं उठा पाता है। लिहाजा, कालाबाजारी बदस्तूर चलती रहती है। ये कंपनियां मसूर और मटर की दाल कनाडा से, उड़द और अरहर की दाल म्यांमा से, राजमा चीन से और काबुली चना आस्ट्रेलिया से आयात करती हैं। इनके अलावा अमेरिका, रूस, केन्या, तंजानिया, मोजाम्बिक और तुर्की से भी दालें आायात की जाती हैं। इस वर्ष हालात ये हैं कि भारत में दालों की बढ़ती मांग के चलते अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी दालों के भाव में उम्मीद से ज्यादा उछाल आ गया है। कनाडा ने मसूर दाल के भाव पिछले साल की तुलना में दोगुने कर दिए हैं। एशियाई देशों में दालों का सबसे ज्यादा निर्यात करने वाला देश कनाडा ही है।

दलहन और तिलहन में भारत को परावलंबी बनाने वाली नीतियों को बढ़ावा मिला है। इस परिप्रेक्ष्य में पूर्व कृषिमंत्री बलराम जाखड़ ने सलाह दी थी कि भारत अफ्रीका में दालें उगाए और फिर आयात करे। इसी तरह यूपीए सरकार में कृषिमंत्री रहे शरद पवार म्यांमा और उरुग्वे में दालें पैदा कराकर आयात करना चाहते थे। ये सुझाव समझ से परे हैं। आखिर ऐसा क्या रहस्य है कि हमारे नीति-नियंता विदेशी धरती पर तो दाल उत्पादन को प्रोत्साहित करना चाहते हैं, पर देश के किसानों को लाभकारी मूल्य देना नहीं चाहते? ऐसे सुझाव देश की खाद्य सुरक्षा को संकट में ही डालेंगे।

दालों का गरीबों की पहुंच से दूर होते जाना बेहद चिंताजनक स्थिति है। मध्यप्रदेश के आदिवासी बहुल जिले झाबुआ में 2009 में दाल की कमी के चलते पैदा हुए कुपोषण ने महामारी का रूप ले लिया था। सामाजिक संगठनों के अध्ययन बताते हैं कि जब दालें गरीब की थाली से लुप्त होने लगती हैं तो आदिवासी बस्तियों में बटला और सूखी दालों का इस्तेमाल बढ़ जाता है।

ये दालें अन्य दालों की तुलना में सस्ती तो होती हैं लेकिन सेहत पर बुरा असर डालती हैं। ये हालात खाद्य सुरक्षा को संकट में डालने वाले हैं। पूर्व कृषि व खाद्य मंत्री शरद पवार ने संसद में बताया था कि हर साल पचास हजार करोड़ रुपए के कृषि उत्पाद रख-रखाव की लापरवाही से बर्बाद हो जाते हैं। इसी तरह एफएओ का कहना है कि देश में चालीस फीसद फल-सब्जियां उपभोक्ता तक पहुंचने से पहले नष्ट हो जाती हैं। जाहिर है, दालों की कीमतों पर काबू पाने और आम आदमी की थाली में दालों की वापसी के लिए एक कारगर नीति बनाने और उस पर सख्ती से अमल करने की जरूरत है।
-प्रमोद भार्गव