महाकालेश्वर के क्षेत्र उज्जयिनी का सुनहरा अतीत

  • 2016-03-30 09:30:47.0
  • अशोक “प्रवृद्ध”

पुरातन भारतीय सभ्यता- संस्कृति के प्रतीक कुम्भ पर्व आयोजित होने वाली चार पवित्र स्थलों में से एक उज्जैन अर्थात उज्जयिनी अति प्राचीन नगरी है और इसका प्राचीन नाम अवन्तिकापुरी है। यह महाकालेश्वर का क्षेत्र है । महाकाल या महाकालेश्वर मालवा प्रदेश में क्षिप्रा नदी  के तट पर उज्जैन  नामक नगरी में विराजमान हैं । उज्जैन अर्थात अवन्तिकापुरी में अवस्थित शिवलिंग को ओंकारेश्वर भी कहते हैं । ओंकारेश्वर का स्थान मालवा प्रान्त में नर्मदा के तट पर अवस्थित है ।उज्जैन से खंडवा जाने वाली रेलवे की छोटी लाइन पर मोरटक्का नामक स्टेशन है । वहाँ से यह स्थान सात मील दूर है । यहाँ ओंकारेश्वर और अमलेश्वर  नामक पृथक- पृथक दो लिंग हैं , परन्तु दोनों एक ही ज्योतिर्लिंग के दो स्वरूप माने गये हैं ।

महाकालेश्वर

कहा गया है-

सौराष्ट्रे सोमनाथं च श्रीशैले मल्लिकार्जुनम् ।
उज्जयिन्यां महाकालमोंकारे परमेश्वरम् ।।
- शिवपुराण कोटिरूद्र संहिता 1/21

कहा जाता है कि कभी महाकालेश्वर के शिखर चालीस कोस दूर से दिखाई पड़ते थे । संस्कृत ग्रंथों में उज्जयिनी  की बड़ी महिमा गाई गई है । कालिदास ने मेघदूत में लिखा है-

स्वल्पीभूते सुचरित फले स्वगिणां गां गतानाम्  ।
शेषे पुण्येह्र्रितमिवदिव: कान्तिमत्खण्डमेकम् ।।

यह नगर क्षिप्रा के तट पर है । विक्रमादित्य ने शकों को पराजित कर नर्मदा (नर्वदा) से पंजाब  की उत्तरी सीमा तक राज्य विस्तार कर अपना संवत चलाया और उज्जैन के वैभव को चोटी तक पहुँचा दिया । विक्रम संवत ईसा संवत अर्थात ईस्वी सन से संतावन वर्ष आगे चलता है । हर बारहवें वर्ष जब सिंह राशि पर वृहस्पति आते हैं, तब उज्जैन में कुम्भ का मेला लगता है । भारतीय ज्योतिष में यह नगरी याम्योतर रेखा का केंद्र है । भारतीय ज्योतिष उसके रेखांश को शून्य मानते हैं और अन्य स्थानों के रेखांश का गणित करते हैं, जैसा कि यूरोप में ग्रीनवीच को मानकर रेखांश की कल्पना करते हैं । भारतीय धर्म , संस्कृति , सामाजिक , राष्ट्रीय एवं आध्यात्मिक चेतना के उत्थान क्रम को जीवित और जागृत रखने के लिए आदि शंकराचार्य द्वारा प्रारम्भ की गई कुम्भ पर्व के चार स्थलों हरिद्वार , प्रयाग, नासिक के साथ ही उज्जैन भी एक है , जहाँ सिंहस्थ कुम्भ का आयोजन किया जाता है । कहा गया है-

कुम्भे गुरौ हरिद्वारे , तीर्थराजे वृषे गुरौ ।
धारायां घटे जीवे , गोदावर्या ककर्गे गुरौ ।।

अर्थात - कुम्भ के गुरु में हरिद्वार , वृष के गुरु में प्रयाग राज, सिंह के गुरु में उज्जैन और कर्क के गुरु में नासिक में कुम्भ होता है । इसी तरह सूर्य की स्थिति को देखकर भी कुम्भ की स्थितियाँ निश्चित करने की परिपाटी है । इसके अनुसार मेष के सूर्य में हरिद्वार , मकर के सूर्य में प्रयाग , मेष के सूर्य में उज्जैन और कर्क के सूर्य में नासिक में कुम्भ का आयोजन होता है । इस वर्ष उज्जैन में आयोजित होने वाली सिंहस्थ कुम्भ का शाही स्नान -22 अप्रैल 2016, शुक्रवार, पूर्णिमा को प्रारम्भ होकर तत्पश्चात नियमित कुम्भ स्नान और फिर 21 मई 2016, शनिवार, पूर्णिमा को शाही स्नान का कार्यक्रम है ।

पौराणिक ग्रन्थों में महाकाल के व्यापक स्वरूप का विशद वर्णन करते हुए उनके महिमा का गान किया गया है  क्योंकि वे कालखंड, काल सीमा, काल-विभाजन आदि के प्रथम उपदेशक व अधिष्ठाता हैं। कहा गया है कि -

अवन्तिकायां विहितावतारं
मुक्ति प्रदानाय च सज्जनानाम?
अकालमृत्यो: परिरक्षणार्थं
वन्दे महाकाल महासुरेशम॥

अर्थात- जिन्होंने अवन्तिका नगरी (उज्जैन) में संतजनों को मोक्ष प्रदान करने के लिए अवतार धारण किया है, अकाल मृत्यु से बचने हेतु मैं उन ‘महाकाल’ नाम से सुप्रतिष्ठित भगवान आशुतोष शंकर की आराधना, अर्चना, उपासना, वंदना करता हूं।

इस मंत्र से नि:सृत अर्थध्वनि भगवान शिव के सहस्र रूपों में सर्वाधिक तेजस्वी, जागृत एवं ज्योतिर्मय स्वरूप सुपूजित श्री महाकालेश्वर की असीम, अपार महत्ता को दर्शाती है।

शिव पुराण की कोटि-रुद्र संहिताके सोलहवें अध्याय में तृतीय ज्योतिर्लिंग भगवान महाकाल के महिमा का प्रवृद्ध वर्णन करते हुए कहा गया है कि अवन्ती नगरी में एक वेद कर्मरत ब्राह्मण हुआ करता था। वह ब्राह्मण पार्थिव शिवलिंग का निर्माण कर उसका प्रतिदिन पूजन किया करता था। उन दिनों रत्नमाल पर्वत पर दूषण नामक राक्षस ने ब्रह्माजी से वरदान प्राप्त कर समस्त तीर्थस्थलों पर धार्मिक कर्मों को बाधित करना प्रारम्भ कर दिया था ।

दूषण अवन्ती नगरी में भी आया और सभी ब्राह्मणों को धर्म-कर्म छोड देने के लिए कहा , परन्तु किसी ने उसकी आज्ञा नहीं मानी। फलस्वरूप उसने अपनी दुष्ट सेना सहित पावन ब्रह्म तेजोमयी अवन्तिका में उत्पात मचाना प्रारम्भ कर दिया। इस पर जन-साधारण त्राहि-त्राहि करने लगे और उन्होंने अपने आराध्य भगवान शंकर की शरण में जाकर प्रार्थना, स्तुति प्रारम्भ कर दी। तब जहाँ वह सात्विक ब्राह्मण पार्थिव शिव की पूजा- अर्चना किया करता था ,उस स्थान पर एक विशाल गड्ढा हो गया और भगवान शिव अपने विराट स्वरूप में उसमें से प्रकट हुए।

विकट रूप धारी भगवान शंकर ने भक्तजनों को आश्वस्त किया और ‘मैं दुष्टों का संहारक महाकाल हूँ’ का गगनभेदी हुंकार भरते हुए दूषण व उसकी हिंसक सेना को भस्म कर दिया। कहा जाता है कि इस पर अवन्तिका वासियों ने शंकर की प्रार्थना करते हुए उन्हें इसी स्थान पर बस जाने और दुष्ट दलन करने का निवेदन किया- महाकाल, महादेव! दुष्ट दंड कर प्रभो।

मुक्ति प्रयच्छ न: शम्भो संसाराम्बुधित: शिव ।।
अत्रैव्? लोक रक्षार्थं स्थातव्यं हि त्वया शिव ।
स्वदर्श कान्? नरांछम्भो तारय त्वं सदा प्रभो ।।

अर्थात - हे महाकाल ,महादेव ,दुष्टों को दंडित करने वाले प्रभु ! आप हमें संसार रूपी सागर से मुक्ति प्रदान कीजिये । जनकल्याण एवं जनरक्षा हेतु इसी स्थान पर निवास कीजिये एवं अपने इस स्वयं स्थापित स्वरूप के दर्शन करने वाले मनुष्यों को अक्षय पुण्य प्रदान कर उनका उद्धार कीजिये ।

इस प्रार्थना से अभिभूत होकर भगवान महाकाल स्थिर रूप से वहीं विराजित हो गए और सम्पूर्ण अवन्तिका नगरी ही शिवमय हो गई।

पौराणिक मान्यतानुसार दैत्यों और देवताओं के द्वारा किये गये समुद्र मंथन से निकले रत्नों अर्थात सामग्रियों का बंटवारा उज्जैन में ही किया गया था और जिस स्थान पर किया गया था उसे रत्नसागर तीर्थ के नाम से जाना जाता है। समुद्र मंथन सेविष, बहुत सा धन (रत्न मोती),माता लक्ष्मी, धनुष, मणि, शंख, कामधेनु गाय, घोडा, हाथी, मदिरा, कल्प वृक्ष, अप्सरायें, भगवान चंद्रमा और हाथों में अमृत के कलश को लेकर निकले भगवान धनवंतरि निकले थे। एक और पौराणिक मान्यतानुसार भगवान शिव की तपस्या कामदेव के द्वारा भंग किये जाने पर शिव के तीसरी आँख के खोलने मात्र से कामदेव भस्म हो गये तब उनकी पत्नी रति  ने शिव से कामदेव को जीवीत करने के लिए प्रार्थना की तब शिव ने उन्हें क्षिप्रा स्नान ओर शिवलिंग की उपासना के लिए लिए कहा ।इस पर रति ने वेसा ही किया जिससे कि उन्हें कामदेव पुन: पति रूप मे मिले ।
-अशोक प्रवृद्ध