मनुष्य का आदिम ज्ञान और भाषा-37

  • 2014-12-14 09:32:51.0
  • देवेंद्र सिंह आर्य

Ancient-Humanगतांक से आगे.........

तिलक महोदय का यह ग्रंथ वारन नामी एक पाश्चात्य विद्वान के Paradise Found in the North Pole नामी ग्रंथ  के बाद लिखा गया है। उस ग्रंथ में वारन महोदय ने दिखलाया है, कि मनुष्यजाति उत्तरध्रुव में ही उत्पन्न हुई, परन्ंतु उत्तरधु्रव निवास नामी पुस्तक में लोकमान्य तिलक ने यह सिद्घ करना चाहा कि किसी समय आर्य लोग वहां रहते थे और आज से करीब दस हजार वर्ष पूर्व उत्तरधु्रव में बर्फ की महान वर्षा हुई। जिससे वे वहां से निकल भागे और भारत, ईरान, योरप आदि में  बस गये। वेदों में आपने इस बात को इस प्रकार सिद्घ करन्ने का प्रयत्न किया है कि उत्तरधु्रव में छह महीने की रात होती है, अत: वेदों में भी छह महीने कीरात का वर्णन है, और यह भी वर्णन है कि उसदीर्घ रात्रि से घबराा कर आर्य लेाग प्रार्थना करते थे कि हे परमेश्वर! शीघ्र सवेरा हो। उत्तरधु्रव में सप्तर्षि नक्षत्र शिर के ऊपर फिरते हैं, अत: वेदों में भी इस घटना का वर्णन है। उत्तरधु्रव में महीनों तक सुहावनी ऊषा होती है, अत: वेदों में भी सूर्य को दक्षिणा पुत्र कहाा गया है। इनकेे अतिरिक्त दो एक छोटन्ी अन्य भी घटनाएं हैं और उनका भी वेदों में वर्णन है। इन तमाम घटनाओं के वर्णन से तिलक महोदय यह अर्थ निकालते हैं कि किसी समय आर्य लोग वहां अवश्य रहते थे। इसलिए आंखों देखे वर्णन वेदों में लिखे जा सके। उनकी इस उक्ति पर कई विद्वानों ने अपने अपने तर्क चलाये हैं। पूनानिवासी नारायण भवानराव पावगी ने आर्याववर्तातील आर्याची जन्मभूमि नामी ग्रंथ में लिखा हन्ै कि आर्य लोग भारत देश से उत्तरधु्रव को गये, वहां यह सब दृश्य देखा और लौटकर फिर इस पर रचना की। बाबू अविनाश चंद्र दास एम.ए. ने अपने ‘ऋग्वेदिक इंडिया’ नामी ग्रंथ में उक्त वर्णनों का अर्थ बदल कर यह दिखलाने की कोशिश की है कि यह सब घटना पंजाब प्रांत की है। इसी तरह बाबू उमेशचंद्र विद्यारल ने मानवेर आदि जन्मभूमि में लिखा है कि तिलक महोदय ने वेदों का अर्थ पाश्चात्यों के अनुसार किया है। उनको वेदार्थ करना ज्ञात नही था इत्यादि।

हम कहते हैं कि जिन मंत्रों का अर्थ तिलक महोदय ने किया है, वे मंत्र कहीं चले तो नही गये? वे अब भी मौजूद हैं। अत: जिसकी इच्छा हो, वह देख ले और अर्थ कर ले। हमने भी उक्त मंत्रों को देखा है। हमारी समझ में तो वेदों के उन मंत्रों में उत्तरधु्रव का ही वर्णन है। चक्राचार उषा, सप्तर्षि, धु्रव और दीर्घ रात्रि संबंधी ऐसे वचन हैं, जिनका दूसरा कुछ अर्थ हो ही नही सकता। सायणाचार्य ने भी दीर्घरात्रिवाले मंत्रों का अर्थ किया है, पर उनको उत्तरधु्रव का अर्थ नही सूझा। इसलिए दीर्घ रात्रि को उन्होंने हेमंत ऋतु की रात समझ लिया, किंतु हेमंत ऋतु की रनत ऐसी नहन्ी होती, जिसके लिए रोया और चिल्लाया जाए। उससे बचने के लिए परमेश्वर से प्रार्थना की जाए और प्राणों पर आ पड़े, यह रात निसंदेह उत्तरधु्रव की है, किंतु प्रश्न यह है कि वेदों में उत्तरधु्रव की घटनाओं का वर्णन कहां से आया? हमारा तो विश्वास है कि यह वर्णन वहां जाने से नही सूझा, प्रत्युत उच्च कोटि के ज्योतिषज्ञान का फल है। वहनं की स्थिति जानकर कभी भी कोई वहां बसने की  इच्छा से नही गया। यहन् हमारी ही कल्पना नही है। इस विषय का एक अच्छा प्रमाण वाल्मीकि रामायण में मिलता है। सुग्रीव वानरों से कहते हैं कि सीता को ढ़ूढऩे के लिए उत्तर कुरू की ओर जाओ , परंतु -

न कथंचन गंतव्यं कुरूणामुत्तरेण व:।

अभास्करममर्यादं न जानीमस्तत: परम्।

खबरदार, तुम लोग उत्तर कुरू के उत्तर हरगिज मत जाना। वहां असीम अंधकार होता है और उसके आगे का हाल कुछ मालुम नही है। यह वर्णन हमको दो बातें बतलाता है। एक तो यह कि यहां वाले वहां की अंधकार आदि सब ज्योतिष संबंधी घटनाओं को जानते थे। दूसरे यह कि वहां कोई जाता नही था। तब सवाल होता है कि बिना गये वहां का हाल कैसे ज्ञात हुआ? हम फिर कहते हैं कि वहां का ज्ञान ज्योतिषशास्त्र और भूगोल शास्त्र की अपार विद्या से ही जाना गया।

आज कल छोटे छोटे बच्चों को स्कूूलों में उत्तरधु्रव की छह महीने की रात और छह महीने का दिन और उत्तरपायण, दक्षिणायन आदि की शिक्षा किस प्रकार दी जाती है? क्या यह सब वहां जाकर दिखलाया जाता है? कभी नही। तब जिस प्रकार सब शिक्षक ग्लोब, नक्शा, लैंप और अन्य साधनों से छोटे बच्चों को वहां का ज्ञान करा देते हैं, उसी तरह वेदों का भी वह ज्ञान परमात्मा की गुरूपरंपरा से आया। इसमें कुछ भी संदेह नही है।

क्रमश: