क्या कहते हैं महामति चाणक्य

  • 2016-03-20 12:30:57.0
  • पं. बाबा नंदकिशोार मिश्र

सिंहादेकं बकादेकं शिक्षेच्चत्वारि कुक्कुटात् ।
वायसात्पञ्च शिक्षेच्च षट् शुनस्त्रीणि गर्दभात् ।।-(6/14)

भावार्थ:-मनुष्य को सिंह और बगुले से एक-एक,मुर्गे से चार,कौए से पांच,कुत्ते से छह और गधे से तीन गुण सीखने चाहिएँ।

प्रभूतं कार्यमल्पं वा यन्नर: कर्तुमिच्छति ।
सर्वारम्भेण तत्कार्यं सिंहादेकं प्रचक्षते ।।-(6/15)

भावार्थ:-मनुष्य को जो भी बड़ा या छोटा कार्य करना चाहे,उसे पूर्ण शक्ति लगाकर करे,यह शिक्षा सिंह से लेनी चाहिए।

इन्द्रियाणि च संयम्य बकवत् पण्डितो नर: ।
देशकालबलं ज्ञात्वा सर्वकार्याणि साधयेत् ।।-(6/16)

भावार्थ:-बुद्धिमान मनुष्य को चाहिए कि अपनी इन्द्रियों को वश में और चित्त को एकाग्र करके तथा देश,काल और अपने बल को जानकर बगुले के समान अपने सारे कार्यों को सिद्ध करे।

प्रत्युत्थानं च युद्धं च संविभागं च बन्धुषु ।
स्वयमाक्म्र्य भुक्तं च शिक्षेच्चत्वारि कुक्कुटात् ।।-(6/17)

भावार्थ:-यथासमय जागना,युद्ध के लिए उद्यत रहना,बन्धुओं को उनका हिस्सा देना और आक्रमण करके भोजन करना-इन चार बातों को मुर्गे से सीखना चाहिए।

विमर्श:-यथासमय जागना मुर्गे से सीखना चाहिए।घड़ी गलत हो सकती है,मुर्गा गलत नहीं हो सकता।वह ठीक समय पर सूर्योदय से पूर्व जागकर बाँग देता है।मनुष्य को भी सूर्योदय से पूर्व उठ जाना चाहिए।
वेद में कहा है-

उद्यन्सूर्यं इव सुप्ताना द्विषतां वर्च आ ददे।-(अथर्व0 7/13/2)

एक वैदिक वीर की घोषणा है-जैसे उदय होता हुआ सूर्य सोते हुए आलसियों के तेज को हर लेता है,उसी प्रकार मैं भी शत्रुओं के तेज और बल को खींच लेता हूं।

भारतीय संस्कृति में सूर्योदय के पश्चात् और सूर्यास्त के समय सोना पाप माना गया है।जब भरत ननिहाल से लौट आये,उस समय उन्होंने अपनी निर्दोषता सिद्ध करने के लिए कुछ सौगन्ध=कसमें खाई थीं।उनमें से एक यह थी-

उभे सन्ध्ये शयानस्य यत् पापं परिकल्प्यते ।
तत्पापं भवेत् तस्य यस्यास्स्र्योस्नुमते गत: ।।-(वा0 रामा0 अयो0 75/44)

महामति चाणक्य

अर्थात् जिसकी सम्मति से आर्य राम को वन में भेजा गया हो,उसे वह पाप लगे,जो पाप दोनों सन्ध्याओं (प्रात: सायं) के समय सोने वाले मनुष्य को लगता है।

बन्धुओं को उनका भाग देना चाहिए।भाइयों को उनका भाग न देने के कारण दुर्योधन का नाश हो गया।
वेद में कहा है-

केवलाघो भवति केवलादी।-(ऋ0 10/117/6)
अकेला खाने वाला पाप ही खाता है।
बह्राशी स्वल्प सन्तुष्ट: सुनिद्रो लघुचेतन: ।
स्वामिभक्तश्च शूरश्च षडेते श्वानतो गुणा: ।।-(6/19)

भावार्थ:-बहुत खाने की शक्ति रखना,न मिलने पर थोड़े में ही सन्तोष कर लेना,गाढ़ निद्रा में सोना,तनिक-सी आहट से ही जाग जाना,स्वामी-भक्ति और शूरवीरता-ये छह गुण कुत्ते से सीखने चाहिएँ।

सुश्रान्तोस्पि वहेद् भारं शीतोष्णं न च पश्यति ।
सन्तुष्टश्चरते नित्यं त्रीणि शिक्षेश्च गर्दभात् ।।-(6/20)

भावार्थ-अत्यन्त थक जाने पर भी बोझ ढ़ोते जाना,सरदी-गरमी की परवाह न करना और सदा सन्तोष से जीवन बिताना-इन तीन गुणों को गधे से सीखना चाहिए।

ओ3म् स पर्यगाच्छुक्रमकायब्रह्ममस्ना विरं शुद्धमपापविद्धम् ।
कविर्मनीषी परिभू: स्वयम्भूर्याथा तथ्यतोह्यर्थान्व्यदधाच्क्षाश्वतीभ्य: समाभ्य: ।।-(यजुर्वेद  अ. 40/म. 8)

अर्थ-वह अक्षर अर्थात् अखण्ड अविनाशी ब्रह्म सब जगह पहुंचा हुआ है अर्थात् सर्वत्र विद्यमान है।वह तेजोरुप है।शरीर के बन्धन से रहित है,चक्षु,श्रोत्र,मुख,नासिका आदि छिद्रों से रहित है,वह नस-नाडिय़ों आदि के बन्धनों से रहित है,वह अत्यन्त शुद्ध पवित्र है,सर्वज्ञ होने से पापों से शून्य है,वह परम ज्ञानी और अन्तर्दृष्टा है,सर्वव्यापक है,स्वयं अपनी सत्ता से सदा विद्यमान है।उसने अपनी समस्त सनातन प्रजाओं के लिए वैज्ञानिक क्रम से अथवा पूर्व कल्प की भांति असंख्य भोग्य पदार्थों को रचा है।