खुले शोषण को रोकने हेतु सख्त कानून जरूरी

  • 2016-04-04 09:30:07.0
  • डॉ. पुरुषोत्तम मीणा

वर्ष 1991 में जैसे नरसिम्हा राव की सरकार ने सत्ता संभाली या यह कहना अधिक उचित होगा कि वीपी सिंह एवं चन्द शेखर की सरकार द्वारा बरबार अर्थव्यवस्था के सुधार के लिये जैसे ही रिजर्व बैंक ऑफ इण्डिया के पूर्व गर्वनर डॉ. मनमोहन सिंह ने भारत के वित्तमंत्री के रूप में जिम्मेदारी संभाली भारत को फिर से कॉर्पोरेट के गुलाम बनाने की शुरूआत हो गयी। खुले बाजार और विश्व अर्थव्यवस्था के साथ प्रतियोगिता के नाम पर डॉ. मनमोहन सिंह की नीति को पीवी नरसिम्हाराव के बाद अटलबिहारी वाजपेयी और अन्तत: स्वयं डॉ. मनमोहन सिंह की सरकार ने उत्तरोत्तर प्र?गति के साथ जारी रखा। जिसके चलते भारत का पहले से कमजोर तबका लगातार वंचित और बेहाल हो गया तथा किसान आत्महत्या करने को मजबूर हो गये। स्त्रियों की स्थिति बद से बदतर हो गयी। निम्न श्रेणी की सरकारी नौकरियां समाप्त करने की प्रकिया शुरू हो गयी।

वर्तमान नरेन्द्र मोदी सरकार भारत की अर्थव्यवस्था में निजी क्षेत्र को सौ फीसदी हिस्सेदारी प्रदान करके सम्पूर्ण रूप से कॉर्पोरेट घरानों पर मेहरबान है। जिसके चलते जहां एक ओर भ्रष्टाचार चरम पर है, वहीं दूसरी ओर आम व्यक्ति, किसान, स्त्री और वंचित तबका बेहाल है। अपरिहार्य तकनीकी पदों को छोडक़र ग्रुप डी की सरकारी नौकरियां समाप्त हो चुकी हैं। जिसके चलते वंचित तबकों को प्रशासन में प्राप्त संवैधानिक प्रतिनिधित्व/आरक्षण का मूल अधिकार हमेशा के लिये नेस्तनाबूद किया जा चुका है।

शोषण

यहां जो सबसे महत्वूपर्ण और विचारणीय तथ्य है, वह यह कि—सरकारी क्षेत्रों में जिन कार्यों के लिये, जितनी पगार मिला करती थी या वर्तमान में मिल रही, उसी कार्य के लिये ठेकदार द्वारा एक चौथाई पगार पर वंचित तबके के लोगों को कार्य पर रखा जा रहा है। जिसके चलते वंचित वर्ग का खुला शोषण हो रहा है। लेकिन इसकी ओर 1991 से आज तक किसी भी सरकार या जनप्रतिनिधि ने जरा सा भी ध्यान नहीं दिया। दुष्परिणामस्परूप वर्तमान में जो कार्य ग्रुप डी सरकारी कर्मचारी 25 से 40 हजार रुपये महावार वेतन में करता है, वही कार्य ठेकदार के अधीन कार्यरत मजदूर 9 से 12 हजार प्रतिमाह में करने को विवश है। जिसे अन्य किसी प्रकार की कोई सुविधा या कानूनी संरक्षण भी प्राप्त नहीं हैं।

इस शोषक व्यवस्था के कारण कारोबारी, ठेकेदार, कॉर्पोरेट घराने और ठेका प्रदान करने वाले सरकारी अफसर लगातार मालामाल होते जा रहे हैं। हों भी क्यों नहीं, जब कार्य की लागत का अनुमान/ऐस्टीमेट सरकारी दर पर बनाया जाता है और ठेकेदार द्वारा मजदूरों से सरकारी दर की तुलना में मात्र एक चौथाई दर पर कार्य करवाया जाता है। इसमें जो मुनाफा होता है, उसकी आपस में बन्दरबांट होती है, जिसका निर्धारित हिस्सा सरकार में उच्चतम स्तर तक? पहुंचता है। इसी काले धन के कारण भ्रष्ट धनकुबेरों और भ्रष्ट अफसरों की संख्या में बेतहासा बढोतरी हो रही है। इसी के चलते चुनावों में बेतहासा धन खर्च/विनियोग किया जाता है। जीतने के बाद खर्चे गये/विनियोग किये गये खर्चे का सैकड़ों गुणा वसूला जाता है। जिसका सरलतम रास्ता है—ठेकादारी/अनुबन्ध प्रथा।

डॉ. मनमोहन सिंह द्वारा बिना पर्याप्त कानून बनाये और वंचित तबके के संवैधानिक अधिकारों को संरक्षण प्रदान किये शुरू की गयी खुली अर्थव्यवस्था के कारण वर्तमान में हर एक जिले में हजारों भ्रष्ट लोग तो मालामाल हो गये, लेकिन लाखों—करोंड़ों लोगों को हमेशा—हमेशा के लिये दलित, वंचित और शोषित बना दिया गया है। जिसकी ओर कोई भी ध्यान देने की जरूरत नहीं समझता है। वर्तमान में निर्वाचित होकर विधायिका में पहुंचने वाले जनप्रतिनिधियों में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से बहुत बड़ी संख्या शोषक ठेकेदारों की भी है। इस कारण इस बारे में कभी भी विधायिका में कोई सुधारात्मक चर्चा नहीं होती है। ऐसे में वंचित तबका लगातार शोषण के दुष्चक्र और गरीबी के अंधकूप में समाता जा रहा है। जिसके चलते दैहिक शोषण सहित अनेकों प्रकार के अपराधों में वृद्धि हो रही है। किसान आत्महत्या करने को विवश हैं और देश का मोस्ट वर्ग प्रशासन में प्रस्तावित संवैधानिक हिस्सेदारी के मूल अधिकार से असंवैधानिक तरीके से वंचित किया जा रहा है।

इस प्रायोजित समस्या का समाधान उन्हीें सत्ताधारी लोगों अर्थात् डॉ. मनमोहन सिंह के मानसपुत्रों के अधिकार क्षेत्र में है, जिन्होंने इसे अर्थव्यवस्था में सुधार के नाम पर जन्म देकर पोषित किेया है। अर्थात् कार्यपालिका और विधायिका द्वारा न्यायसंगत कानून बनकार ठेकेदारों के अधीन कार्यरत मजदूरों एवं कर्मकारों को न्यायसंगत वेतन, भत्ते, भविष्य निधि, चिकित्सा सुविधा, आपात निधि आदि की व्यवस्था करके इस समस्या का स्थायी निराकरण सम्भव है, लेकिन ऐसे जरूरी और न्यायसंगत कानून बनाते ही ऊपर तक पहुंचने वाला कमीशन मिलना बन्द हो जायेगा। इस कारण स्थित विकट हो चुकी है।
-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा निरंकुश