कस्बाई पत्रकार ने दिखाया अपना अनूठा कमाल

  • 2015-12-11 07:30:58.0
  • प्रमोद भार्गव

प्रथम तो यह कि हमारे देश में यह पहली बार संभव हुआ है कि किसी वन्य जीव का सफल पुनर्वास हुआ है,वह भी बड़ी संख्या में! दूसरे यह कि इस पुनर्वास की हरेक गतिविधि का फिल्म के रूप में दस्तावेजीकरण किया गया है। ‘रर्निंग द क्लॉक बैक ऑफ द बांधवगढ़ गौर‘ शीर्षक से बनाई गई इस डॉक्यूमेंट्री का निर्माण व निर्देशन अनिल यादव ने किया है। अनिल मध्यप्रदेश की विदिशा जिले की तहसील गंज बसौदा में रहकर पत्रकारिता को आजीविका का साधन बनाने वाले कस्बाई पत्रकार हैं। हालांकि अनिल ने बासौदा में रहते हुए ‘जनसत्ता‘ और ‘नईदुनिया‘ जैसे समाचार पत्रों के लिए पत्रकारिता की। नईदुनिया के सहयोगी अखबार ‘नवदुनिया‘के अनिल अभी भी जिला संवाददाता हैं। यह फिल्म बन तो 2014 में ही गई थी,लेकिन वह महत्व नहीं मिला,जो एक अद्वितीय व साहसिक कार्य को मिलना चाहिए था। अलबत्ता अब जरूर दोनों चर्चा में हैं। इसलिए,क्योंकि अब 39 मिनट की इस फिल्म को दिल्ली में चल रहे ‘दिल्ली अंतर्राष्ट्रीय फिल्म मेला‘में शामिल कर लिया गया है। इस मेले में 68 देशों की 221 फिल्में दिखाई जाएंगी। यह शायद पहला अवसर है,जब एक नितांत गैरव्यावसायिक और अंग्रेजी नहीं जानने वाले कस्बाई पत्रकार द्वारा वन्य प्राणी पर निर्मित फिल्म को डीआईएफएफ की प्रतिस्पर्धा में भागीदारी का अवसर मिला है। हालांकि पूरी तरह स्थानीय स्तर पर तैयार इस फिल्म की स्क्रीनिंग इसी साल सिंतबर माह में दिल्ली में आयोजित ‘वुडपैकर अंतर्राष्ट्रीय फिल्म मेला‘ में भी की गई थी। इसमें अनिल यादव ‘वुडपैकर अचीवर एवॉर्ड‘ से सम्मानित किए गए थे।

वन्य-जीवों का पुनर्वास जितना जटिल व जोखिम भरा काम है,उतना ही कठिन काम प्राकृतिक रूप में अठखेलियां कर रहे किसी वन्य प्राणी पर फिल्म बनाना भी है। हमारे यहां अब तक इस काम को गैरव्यावसायिक रहते हुए रमेश बेदी और उनके पुत्र नरेश व राजेश बेदी ने किया है। गंगा के घडिय़ालों से लेकर हिमालय की शिखर गुहाओं में रहने वाले हिम चीता पर फिल्में पहले-पहल उन्होंने ही बनाई हैं। जंगल की दुनिया पर हिंदी में विपुल व रोचक लेखन रामेश बेदी ने ही किया है। पांच खंडों में सचित्र प्रकाशित उनका ‘वनस्पति कोष ‘दुर्लभ ग्रंथ है।

देश में अब तक दुर्लभ वन्य प्राणियों के सरंक्षण की दृष्टि से जो भी प्रयोग हुए हैं,वे असफल ही रहे हैं। पुनर्वास के क्रम में बड़ी कोशिश मध्य प्रदेश के ही शिवपुरी में स्थित माघव राष्ट्रिय उद्यान में बाघों की हुई थी। 1989 में स्वर्गीय माधवराव सिंधिया के विशेष प्रयासों से उद्यान के 10 हैक्टेयर क्षेत्र में तारों की बाड़ लगाकर टायगर सफारी बनाई गई थी। इसमें तारा और पेटू नाम के मादा व नर बाघ छोड़े गए थे। आरंभ में तो यह प्रयोग सफल रहा,क्योंकि बाघों के रहवास के अनुकूल आवास,आहार व प्रजनन की प्राकृतिक सुविधाएं मिल जाने के कारण इनके वंष में उत्तरोत्तर वृद्धि होती रही। किंतु जब बाघों की संख्या बढक़र 13 हो गई तो वन प्रबंधन  संकट में आ गया। तारा जो इस कुटुम्ब की जननी थी,नरभक्षी हो गई और उसने उद्यान में काम करने वाली दो महिलाओं का शिकार कर लिया। इन घटनाओं से अन्य बाघों के भी आदमखोर हो जाने की आशंका बढ़ गई। नतीजतन वन-प्रबंधन के हाथ पैर फूल गए और सफारी के बाघ देश के चिडिय़ाघारों में भेजकर,इसे हमेशा के लिए बंद कर दिया गया। दूसरा अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पुनर्वास का प्रयास सोनचिडिय़ा अभयारण्य, करैरा के कृष्ण मृगों का हुआ था। इस हेतु अमेरिका के वन्य प्राणी विशेषज्ञों की देखरेख में इन काले हिरणों का विस्थापन करैरा से शिवपुरी के माधव राष्ट्रिय उद्यान में किया जाना था। हिरणों को पकडऩे के लिए अभरायण्य क्षेत्र में अनेक तकनीकि रूप से सक्षम जाल बिछाए गए थे। लेकिन हिरणों को शायद पूर्वाभास हो गया कि ये जाल उनके जीवन के लिए संकट का सबब हैं। गोया कि,तीन दिन की जबरदस्त मशक्त के बावजूद देशी-विदेशी प्राणी विशेषज्ञों का एक सैकड़ा से भी ज्यादा लोगों का समूह एक भी हिरण नहीं पकड़ पाया। तकनीक प्रबंध और किताबी ज्ञान धरे रह गए। हिरण जालों के समीप तक नहीं आए। विस्थापन की इस प्रक्रिया का गवाह यह लेखक स्वयं भी रहा हैं। तब मैंने पत्रकार राजेश बादल के सहयोग से समाचार स्टोरी बनाई थी। जिसका प्रसारण दूरदर्शन के ‘परख‘ प्रकरण में ‘मृग प्रसंग‘ शीर्षक से हुआ था। इस कार्यक्रम के प्रस्तोता विनोद दुआ थे। विस्थापन की तीसरी बड़ी प्रक्रिया की जद्दोहद राष्ट्रिय स्तर पर गिर के सिहों को श्योपुर जिले के कूनो-पालपुर अभयारण्य में बसाने की चल रही है। आजादी के पहले इन्हीं सिहों को इसी वनप्रांतर में बसाने की पहल ग्वालियर स्टेट के महाराजा माधोराव सिंधिया ने 1905 में की थी। तब गिर के जंगल जूनागढ़ के नबाबों के अधीन थे। उन्होंने सिंह देने से साफ इनकार कर दिया था। दरअसल 1904 के ईदगिर्द लार्ड कर्जन शिवपुरी, श्योपुर व मोहना के जंगलों में सिंह व बाघ का शिकार करने आए थे। परंतु उस समय तक इन वनखंडों से सिंह पूरी जरह लुप्त हो वुके थे,लिहाजा कर्जन की शिकार की मंशा पूरी नहीं हो पाई थी। तब कर्जन ने ही इथेपिया के शासक को सिंह देने के बाबत एक सिफारिशी पत्र लिखा,जिसे वन्य जीवन के पारसी जानकर डीएम जाल लेकर इथोपिया गए और वहां से जहाज के जरिए 10 सिंह शावक बंबई लेकर आए। हालांकि इनमें से तीन रास्ते में ही मर गए थे। बचे सात में तीन सिंह और चार सिंहनियां थीं। इनकी अगवानी के लिए स्वयं ग्वालियर महाराज बंबई पहुंचे थे। इन शावकों का पहले ग्वालियर के चिडिय़ाघर में लालन-पालन किया गया। जब ये व्यस्क हो गए तो दो मादाओं ने गर्भधारण किया और पांच शावक जने। इन सिंहों के बड़े होने के बाद इन्हें शिवपुरी व श्योपुर के जंगलों में स्वछंद विचरण के लिए छोड़ दिया गया। किंतु जल्दी ही ये सिंह नरभक्षी हो गए और इन्होंने दर्जन भर लोगों को मार गिराया। प्रजा में हाहाकार मचने के बाद इन्हें पकड़वा लिया गया। अब फिर,ढाई दशक से भी ज्यादा समय से सिंहों के पुनर्वास की कोशिश चल रही है,किंतु गुजरात सरकार सिंह नहीं दे रही है। जबकि इस परियोजना के क्रियान्वयन के चलते 22 आदिवासी ग्राम उजाड़े जा चुके हैं। करोड़ों रुपए खर्च कर दिए जाने के बावजूद सिंहों के पुनर्वास की कवायद किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंची है। सफेद शेरों की भी अपने आदिम क्षेत्रों में पुनर्वास की कोशिश  चल रही है। एक समय रीवा,सीधी एवं शडहोल के जंगलों में इनका नैसर्गिक रहवास था। 27 मई 1951 को पहली बार रीवा के महाराज गुलाब सिंह ने एक पीले रंग की काली पट्टी वाली शेरनी को चार शावकों के साथ देखा था। इनमें तीन पीले और एक सफेद था। रीवा महाराज ने इस अद्भुत शावक को पकड़वा लिया। इसका नाम ‘मोहन‘ रखा गया। व्यस्क होने पर इसका ‘राधा‘नाम की शेरनी के साथ संगम कराया गया।