जो अर्थ की दृष्टि से शुद्ध है वही शुद्ध है

  • 2015-10-27 06:20:41.0
  • अशोक “प्रवृद्ध”
जो अर्थ की दृष्टि से शुद्ध है वही शुद्ध है

भारतीय परम्परा में धर्म अर्थ, काम और मोक्ष. इन चार पुरुषार्थों को मानव जीवन के लिये अपरिहार्य माना गया है। पुरुषार्थ शब्द से अभिप्राय है. पुरुष का प्रयोजन अर्थात् मानव जीवन का लक्ष्य। साधारण मनुष्य अपने जीवन का प्रयोजन अर्थ और काम समझता है। वर्तमान आंग्ल शिक्षा पद्धति से शिक्षित लोगों के जीवन का अध्ययन करने से ज्ञात होता है कि मनुष्य अर्थ और काम में से अर्थ को प्रधानता देता है और जड़ धन की उपासना में ही सदैव लगा रहता है। और फि र मानवों का काम तो पशुवत ही हो गया है । पशु जड़त्व से सर्वथा भिन्न शरीर की आवश्यकताओं तक सीमित रहता है लेकिन मनुष्य ने काम अर्थात् विषय.वासनाओं की दृष्टि से तो पशुओं को भी पीछे छोड़ दिया है।
यह सर्वविदित है कि भोगों को प्राप्त करने के लिये अर्थ की आवश्यकता होती है और उसे प्राप्त करने में मनुष्य धर्म. अधर्म नीति. अनीति उचित. अनुचित का विचार नहीं करता है और यहीं से उसके पतन का प्रारम्भ हो जाता है। विना उचित रीति से अर्जित किया हुआ धन अर्थ न रहकर अनर्थ बन जाता है। मनुस्मृति 6.92 में धर्म के दस लक्षण. धृतिए क्षमा दमए अस्तेयए शौचए इन्द्रिय.निग्रह धी विद्या सत्य और अक्रोध बतलाये गये है। इनमें से पाँचवाँ स्थान शौच अर्थात् अन्त: और बाह्य शुद्धि का है। शुद्धि का उपाय बतलाते हुए मनुस्मृति में कहा गया है.
सर्वेषामेव शौचानामर्थशौचं परं स्मृतम।
योऽर्थे शुचिर्हि स शुचिर्न मृद्वारिशुचि: शुचि:।।
मनुस्मृति 5.106
अर्थात . सब प्रकार की शुचियों में अर्थ की शुद्धता सबसे बढक़र है। जो अर्थ की दृष्टि से शुद्ध है वही शुद्ध है लेकिन जिसने अपने को मिट्टी जल आदि साधनों से शुद्ध किया है वह शुद्ध नहीं है।
विचारणीय प्रश्न है कि मिट्टी जलए साबुन आदि से मलों को निर्मूल करने वाले साधनों से अपने को शुद्ध करने वाला शुद्ध नहीं है वरन् जिसने न्यायपूर्वक धन को अर्जित किया है वह शुद्ध है ऐसा क्यों मन में उठने वाली इस शंका का समाधान भी मनुस्मृति में ही किया गया है। वहाँ कहा है .
अद्भिर्गात्राणि शुध्यन्ति मन: सत्येन शुध्यति।
विद्यातपोभ्यां भूतात्मा बुद्धिज्र्ञानेन शुध्यति।।
मनुस्मृति 5.109
अर्थात . शरीर की शुद्धि जल से होती है मन की शुद्धि सत्य का आचरण करने से विद्या और तप से आत्मा शुद्ध होती है जबकि ज्ञान से बुद्धि निर्मल होती है।
इसका अभिप्राय है कि शरीर की शुद्धि का एकमात्र साधन जल है जबकि अन्त:करण सहित आत्मशुद्धि के साधन चार है. सत्य, ज्ञान तप और ब्रह्मविद्या। जो व्यक्ति सत्य और ज्ञान पर चल पड़ता है वह अनीतिपूर्वक धन का अर्जन नहीं कर सकता या यह कह सकते हैं कि जिसे अपनी आत्मा को शुद्ध करना है वह सत्य और ज्ञान की उपेक्षा नहीं कर सकता और सत्य एवं ज्ञान के मार्ग पर चलने वाला अनीति का आश्रय कैसे ले सकता है।
इस सम्बन्ध में छान्दोग्योपनिषद् का कथन है .
आहारशुद्धौ सत्त्वशुद्धि: सत्त्वशुद्धौ ध्रुवा स्मृति:।
स्मृतिप्रतिलम्भे सर्वग्रन्थीनां विप्र्रमोचनम।।
छान्दोपनिषद 3.7.25
अर्थात . भोजन की शुद्धि से बुद्धि निर्मल होती है। बुद्धि की निर्मलता से स्मृति निश्चल होती है और स्मृति की निश्चलता से सब ग्रन्थियाँ खुल जाती हैं।
हिन्दी में एक कहावत प्रचलित है . खाओ जैसा अन्न बने वैसा मन। सम्भवत: इसीलिये प्राचीन काल में ऋ षि, मुनि तपस्वी जन प्रत्येक के घर का भोजन स्वीकार नहीं किया करते थे। मनुस्मृति में किस.किसका धन अग्राह्य हैए इसका एक मापदण्ड प्रस्तुत किया गया है .
दशसूनासमं चक्रं दशचक्रसमो ध्वन:।
दशध्वजसमो वेशो दशवेशसमो नृप:।।
मनुस्मृति 4.85
अर्थात. जो चक्र के द्वारा जीविका अर्जित करते हैं जैसे. कुम्हार, गाड़ी, परिवहन से सम्बन्धित व्यवसाय करने वाले। इन लोगों के कार्य में जीव हिंसा अधिक होती है और प्राणियों का पालन और रक्षण कम होता है उनके अन्न खाने वाले के मन पर दशहत्या करने के बराबर दूषित प्रभाव पड़ता है। जो मदिरा निकालकर बेचने वाले हैं उन पर चक्र वाले अन्न की अपेक्षा दस गुना दुप्रभाव पड़ता है। जो लोग बाहर के दिखावे वेशभूषा आडम्बर और ढोंग से जीविका का उपार्जन करते हैंए उनका अन्न पहले से दस गुना अधिक मन को दूषित करता है। मर्यादा का पालन न करने वाले राजा का अन्न वेशभूषा और बाह्य आडम्बर से आजीविका का उपार्जन करने वाले की अपेक्षा दस गुना अधिक मन को दूषित करता है। यही कारण है कि मर्यादा का अतिक्रमण करने वाले राजनेता राजनीति में प्रवेश करने के साथ ही भ्रष्ट और चरित्रहीन हो जाते हैं और आराध्य मानकर उनके आगे.पीछे चक्कर लगाने वाली जनता भी उक्त दोषों से बच नहीं पाती है।
एक अन्य स्थल पर मनुस्मृति में कहा है कि वेद का स्वाध्याय और उपदेश, दान, यज्ञ, यम नियमों का आचरण और तप का अनुष्ठान. ये सभी उत्तम आचरण जिसकी भावना शुद्ध नहीं है उसे कोई लाभ नहीं पहुँचा सकते.
वेदास्त्यागाश्च यज्ञाश्च नियमाश्च तपांसि च।
न विप्रदुष्टभावस्य सिद्धिं गच्छन्ति कर्हिचित।।
मनुस्मृति 297
महाभारत 6.41.36 में युधिष्ठिर को उपदेश देते हुए शरशैय्यारत भीष्म पितामह कहते हैं :-
हे युधिष्ठिर! मनुष्य अर्थ का दास है अर्थ किसी का दास नहीं है। इसी अर्थ के कारण मैं कौरव पक्ष से बँधा हुआ हूँ। यहाँ भीष्म नीति और अनीति को जानते हुए भी सत्य का जो युगधर्म भी है साथ देने से कतरा रहे हैं।
इसका कारण जो मनु ने बताया है वही है कि राजा का अन्न अन्य किसी धन की अपेक्षा हजार गुना अधिक मन को दूषित कर देता है। आज का मनुष्य पहले की अपेक्षा अधिक शिक्षित होते हुए भी अधिक पथभ्रष्ट हो गया है इसके मूल में अर्थ की पवित्रता को भूल जाना है।
संस्कृत साहित्य में कहा गया है कि मूर्ख लोगों ने थोड़े से लाभ के लिये वेश्याओं के समान अपने आपको सजाकर दूसरों के अर्पण कर दिया है.
अबुधैरर्थलाभाय पण्यस्त्रीभिरिव स्वयम।
ऐसे में प्रश्न उठता है कि क्या हमें धन की उपेक्षा कर देनी चाहियेघ् नहीं कदापि नहीं क्योंकि वैदिक ग्रन्थसमृद्ध और सुखमय जीवन यापन करने का उपदेश देते है.
पतय: स्याम रयीणाम। ऋग्वेद 10.121.10
जिनके पास धन उपलब्ध है उन्हें धन का उपयोग किस प्रकार करना चाहियेए इस सम्बन्ध में भी वेद में बतलाया गया है। ऋग्वेद कहता है:.
मोघमन्नं विन्दते अप्रचेता: सत्यं ब्रवीमि वध इत्स तस्य।
नार्यमणं पुष्यति नो सखायं केवलाघो भवति केवलादी।।
ऋग्वेद 10.117.6
अर्थात . जो स्वार्थी व्यक्ति अकेले ही सब कुछ खाना चाहता है मैं सत्य कहता हूँ कि यह उसकी मृत्यु है क्योंकि इस प्रकार खाने वाला व्यक्ति न अपना भला कर सकता है और न मित्रों का। केवल अपने ही खाने.पीने का ध्यान रखने वाला व्यक्ति पाप का भक्षण करता है।
जीवकोपार्जन हेतु ऐसा कौन.सा मार्ग हैए जिस पर चलकर मनुष्य ससम्मान जीवन यापन कर सकता है इस सन्दर्भ में संस्कृत में एक श्लोक प्रचलित है.
अकृत्वा परसन्तापमगत्वा खलमन्दिरम।
अनुल्लङ्घय़ सतां मार्गं यत् स्वल्पमपि तद्बहु।।
अर्थात . दूसरों को सन्ताप दिये विनाए दुष्ट के आगे सिर झुकाये विना तथा सन्मार्ग का उल्लंघन न करते हुए जो भी प्राप्त हो जायेए वही धन स्वल्प होते हुए भी बहुत है।
यदि व्यक्ति उपरोक्त मार्ग का अनुसरण करता हैए तो उसका धन पवित्र धन है।
इस प्रकार के अन्न का उपभोग करने वाला व्यक्ति यदि साधना पथ पर बढ़ता है तो उसे अवश्य सफ लता मिलती है।