जाति व्यवस्था बनाम बाबासाहेब और गांधी

  • 2016-04-14 06:30:53.0
  • प्रवीण गुगनानी

बाबासाहेब और गांधी

जात जात के फेर में उलझ रहे सब लोग। मनुष्यता को खा रहा, रैदास जात का रोग।
जात-जात में जात है, ज्यों केले में पात । रैदास मानस न जुड़ सकें, जब तक जात न जात।।- संत रैदास

बाबा साहेब अम्बेडकर के विचार विश्व का प्रारम्भ इस उनके इस कथन से माना जाना चाहिए कि बौद्ध विचार को या धम्म को किसी धर्म या पंथ के रूप में नहीं अपितु विकसित मनुष्य, समाज व राष्ट्र के निर्माण की रूपरेखा प्रस्तुत करने वाला मार्ग माना जाना चाहिए। धर्म जीवन और समाज की उत्पत्ति की व्याख्या करते हैं जबकि बुद्धत्व जीवन के विकास की अवधारणा को प्रशस्त करता है। हिन्दू समाहित जाति व्यवस्था को लेकर बोधिसत्व बाबा साहेब का जिस प्रकार का मुखर किन्तु समीक्षात्मक विरोध रहा वह किसी से छुपा नहीं है। जाति व्यवस्था का यह विरोध उनकें द्वारा एक दीर्घ रचना संसार के रूप में प्रकट हुआ है। 1916 में बाबासाहेब द्वारा जाति व्यवस्था पर लिखे शोध निबंध का एक बोध वाक्य है जो जाति व्यवस्था के प्रति उनकें विरोध के पीछे छिपे रचनात्मक, सकारात्मक और विचारात्मक स्वरूप को आमूल प्रकट करता है। उन्होंने लिखा था -समूची दुनिया का इतिहास वर्गीय समाजों का इतिहास है और भारत भी इसका अपवाद नहीं है। स्वतंत्रता पूर्व और स्वातंत्र्योत्तर भारत के पिछले लगभग आठ दशकों के राजनैतिक, सामाजिक और शैक्षणिक वातावरण को दो व्यक्तियों ने सर्वाधिक प्रभावित किया है। पहले गांधीजी जिन्हें भारतीय जनमानस बलात ही महात्मा कहे बिना व्यक्त नहीं कर पाता है और दूजे बाबा साहेब अम्बेडकर जिन्हें बोधिसत्व कहे बिना उन्हें पुर्णत: प्रकट ही नहीं किया जा सकता!! यहां यह स्पष्ट करना उचित होगा कि बाबा साहेब और सुभाषचंद्र बोस के प्रति गांधीजी का व्यवहार उनकें महात्मन भाव को कमतर कर रहा था; वहीँ समस्त पीड़ाओं, उपेक्षाओं और अलगाव के बाद भी बाबासाहेब का देश प्रेम उन्हें बाबा साहेब से बोधिसत्व की ओर अग्रसर कर रहा था। गांधीजी को वैचारिक रूप और कृतित्व रूप में प्रकट करते समय कांग्रेस का उल्लेख आवश्यक हो जाता है। यह भी कहा जा सकता है कि गांधीजी के कृति रूप में आधा योगदान संस्थागत रूप से कांग्रेस जन्य रहा है। एक ध्रुव पर जहां कांग्रेस और गांधी के परस्पर गतिरोधों से राष्ट्रवाद की भावना आहत होती थी वही दुसरे ध्रुव पर महात्मा गांधी और बाबा साहेब की वैचारिक भिन्नताएं देश में उहापोह की स्थिति निर्मित करती रहती थी। महात्मा गांधी के व्यक्तित्व में जहां कांग्रेस एक अभिन्न स्थान और योगदान रखती थी वहीं दूसरी ओर बाबा साहेब के व्यक्तिव को ऐसी किसी संस्था का मंच उपलब्ध नहीं था किंतु वे स्वयं एक संस्था के रूप में संघर्षों को सफलता दिलाते रहे थे। गांधीजी की अपेक्षा अम्बेडकरजी के पास राजनैतिक अवसरों का अभाव होता था। गांधीजी कांग्रेस प्रतिष्ठान के सर्वमान्य प्रतिमान थे वहीं अम्बेडकरजी अति तीक्ष्ण संघर्ष से करने के बाद ही किसी मंच पर अपनी जगह बना पाते थे। गांधीजी कांग्रेस के साथ साथ धर्म नाम की संस्था का भी उपयोग सहजता, सफलता और चपलता से कर लेते थे, वहीं दुसरी ओर, बाबासाहेब के पास न तो कोई बड़ा मंच उपलब्ध था और न ही वे धर्म नाम की संस्था का लाभ उठा पानें की स्थिति में थे; अपितु वे तो धर्म के राजनीति में हस्तक्षेप के विरूद्ध बिगुल बजाये हुए थे। बाबासाहेब धर्म के विरुद्ध नहीं थे किन्तु भारत में हिन्दुवाद के नाम पर चल रहे जातीय कुचक्र के कारण वे राजनीति, शासन और प्रशासन में धर्म निषेध के कट्टर पक्षधर हो गए थे। सामाजिक न्याय की उनकी अवधारणा में हिन्दू धर्म का विरोध नहीं बल्कि जातीय कुचक्र से बाहर निकल आनें का मूल तत्व था। यह मूल तत्व गांधीजी की और बाबासाहेब के मध्य मतभेदों में एक अनावश्यक वितंडा भर बनकर नहीं रहा तो इसका कारण केवल बाबा साहेब का तेजस अंतस और सहनशील स्वभाव रहा। पूना पैक्ट इन दोनों नेताओं के बीच एक एतिहासिक प्रसंग है जिससे इन दोनों नेताओं के कृति रूप प्राकट्य का एक महत्वपूर्ण भाग माना जाना चाहिए। जाति व्यवस्था को लेकर इस पैक्ट द्वारा जो आरक्षण की व्यवस्था की गई वह भारत का एक सर्वाधिक महत्वपूर्ण सामाजिक दस्तावेज है। इस पैक्ट में सदियों से चली आ रही जाति व्यवस्था को एक अभिनव रूप दिया और यहीं से भारत राष्ट्र अपनी नागरिक ईकाई से मानसिकता के स्तर पर एक विशिष्ट अपेक्षा करता दृश्यगत हुआ। पूना समझौते के पूर्व और पश्चात महात्मा गांधी और बाबा साहेब के मध्य जिस प्रकार का वैचारिक द्वंद प्रकट हुआ वह अनपेक्षित था। विद्यार्थी जीवन के पश्चात संभवत: इस द्वंद ने बाबा साहेब को सर्वाधिक प्रभावित किया होगा। यह समझौता दो व्यक्ति डा। भीमराव और मोहनदास गांधी के मध्य नहीं अपितु एक समाज के दो ध्रुवों के मध्य हो रहा था। इस समझौते में मृदुता का अभाव स्वातंत्र्योत्तर भारत में सामाजिक समरसता के ह्रास का एक बड़ा कारण बना। पूना पैक्ट तक की यात्रा तक में बाबा साहेब भारत की एक बड़े दलित राजनैतिक केंद्र के रूप में स्थापित हो चुके थे। ब्रिटिशर्स और गांधी दोनों के ही प्रति जातिगत व्यवस्थाओं में परिवर्तन को लेकर उदासीनता को लेकर वे खिन्नता प्रकट करते थे। दलितों की स्वतंत्र राजनैतिक परिभाषा और पहचान को लेकर वे संघर्ष को तीक्ष्ण कर रहे थे उस दौर में बाबा साहेब ने गांधी के प्रति यह नाराजगी भी प्रकट की थी कि गांधीजी दलितों को हरिजन कहनें के पीछे जिस भाव को प्रकट करते हैं उससे दलित एक करुणा की वस्तु बन कर रह गयें हैं। लंदन गोलमेज में उन्होंने दलितों, अछूतों को पृथक निर्वाचन अधिकार देनें के लिए पुरजोर स्वर दिया, वहीं गांधी जाति के आधार पर निर्वाचन अधिकार दिए जानें को लेकर आशंका प्रकट कर रहे थे. अंतत: 1932 में अंग्रेजों में दलितों को पृथक निर्वाचिका दे दी और इसके विरोध में महात्मा गांधी के पुणे की यरवदा जेल में किये आमरण अनशन नें इन दोनों नेताओं के बीच एक गहरी लकीर खींच दी. गांधीजी के साथ यरवदा में कुछ अनहोनी हो जायेगी देश में ऐसा भय जागृत हो गया. सामान्य जनमानस में गांधी के प्रति सुहानुभूति और दलितों के प्रति रोष का भाव जन्मा और अनहोनी की स्थिति में दलितों की सुरक्षा खतरे में दिखनें लगी. इस महत्वपूर्ण राजनैतिक घटनाक्रम में बाबा साहेब नें गांधीजी के व दलितों के प्राणों के भय के अतीव दबाव में  पृथक निर्वाचिका की मांग वापिस ली और तब गांधीजी ने अपना अनशन समाप्त किया. लंदन में इन दोनों नेताओं के मध्य खिंची लकीर यरवदा की घटना से हिन्दू समाज में एक लकीर के रूप में परिवर्तित हो जायेगी ऐसा भय उस समय के बुद्धिजीवियों और समाज शास्त्रियों ने आभास किया किन्तु समाज में खिंची इस विभाजनकारी लकीर की को उस समय आश्चर्यजनक रूप से अनदेखा किया गया! यद्दपि इस घटना के परिणाम स्वरूप दलितों को सीटों के आरक्षण की बात स्वीकार कर ली गई थी तथापि सामाजिक समरसता के स्तर पर इस घटना ने गहरी क्षति अंकित कर दी थी।
-प्रवीण गुगनानी