जनसंख्या की विस्फोटक बाढ़ और मानव अस्तित्व पर मंडराता संकट

  • 2015-10-28 08:00:14.0
  • उगता भारत ब्यूरो

बुध प्रकाश

जनसंख्या की विस्फोटक बाढ़ और मनुष्य की भौतिकवादी जीवन शैली ने मिल कर प्राकृतिक संसाधनों का इतना अंधाधुंध दोहन किया और इसे ही आर्थिक विकास का पर्याय बना दिया कि विश्व में गंभीर पर्यावरणीय समस्याएं उत्पन्न हो रहीं हैं। शहरीकरण व औद्योगीकरण में अनियंत्रित वृद्धि, जंगलों का नष्ट होना, कल-कारखानों से धुआं उगलती चिमनियों से प्रवाहित कार्बन डाइआक्साइड, कचरे से भरी नदियां, रासायनिक गैसों से भरा प्रदूषित वातावरण, सडक़ों पर वाहनों की भरमार, लाउडस्पीकरों की कर्कश ध्वनि, रासायनिक हथियारों का परीक्षण और संचालन आदि ने पर्यावरणीय संकट उत्पन्न करके मानव को भविष्य के प्रति बेहद आशंकित कर दिया है। इसके परिणामस्वरूप पर्यावरणीय असंतुलन के कारण पृथ्वी पर मौजूद जीवन पर ही खतरा मंडराने लगा है। विश्व जलवायु में अप्रत्याशित परिवर्तन आ चुका है। लिहाजा, इस संकट की चपेट में भारत भी है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार भारत के ज्यादातर शहरों में वायु प्रदूषण की स्थिति काफी भयानक है। दुनिया के बीस सबसे प्रदूषित शहरों में तेरह भारतीय शहर शामिल हैं। दिल्ली का स्थान दुनिया के सबसे ज्यादा प्रदूषित शहरों में है।


भारत में वन्यजीवों की समृद्ध विरासत के साथ-साथ जैव विविधता के संरक्षण की लंबी परंपरा रही है। प्राचीन भारत के संत-महात्माओं के आश्रम जीवों की सुरम्य स्थली हुआ करते थे। पेड़-पौधों और पशुओं के प्रति प्रेम का पहला लिखित प्रमाण तीसरी सदी ईसा पूर्व में कौटिल्य के ‘अर्थशास्त्र’ में मिलता है। 242 ईसा पूर्व में सम्राट अशोक ने भी पशु-पक्षियों और वनस्पतियों के संरक्षण पर जोर दिया था। लगभग सभी मुगल शासक भी जैव विविधता के संरक्षण के हिमायती थे। उस समय कल-कल निनाद करती स्वच्छंद सरिताएं, निर्मल झीलें और पावन झरने होने थे। जंगल भी तरह-तरह के जीव-जंतुओं से आबाद थे, लेकिन आज सभी गायब हैं। नदियां प्रदूषित कर दी गईं, जो गंदे नालों के रूप में परिवर्तित होती जा रही हैं। समुद्र भी प्रदूषित हो रहे हैं। झील-झरने सूख रहे हैं। जंगल काटे जा रहे हैं।

वनों से पेड़ और वन्यजीव गायब होते जा रहे हैं। विश्व वन्यजीव कोष के अनुसार विश्व की दस बड़ी नदियों पर सूखने का खतरा मंडरा रहा है। मौत की दहलीज पर खड़ी इन नदियों में हमारी गंगा भी शामिल है। पतित पावनी गंगा अब स्वयं अपनी मुक्ति की गुहार लगा रही है। यह चिंता का विषय है कि आज गंगा जैसी सर्वाधिक पवित्र मानी जाने वाली नदी ही सबसे अधिक प्रदूषित हो गई है।

वैज्ञानिकों ने भी स्पष्ट किया है कि कल-कारखानों द्वारा निकले औद्योगिक कचरों को गंगा नदीं में डाल दिए जाने से नदी का जल बहुत दूर तक प्रदूषित हो गया है। काशी हिंदू विश्वविद्यालय के प्रौद्योगिकी संस्थान के प्रोफेसर विश्वंभरनाथ मिश्र के अनुसार बनारस में तैंतीस नालों के जरिए लगभग 350 एमएलडी सीवेज का कचरा गंगा नदी में प्रवाहित हो रहा है। इसके अलावा मणिकर्णिका और हरिश्चंद्र घाट पर वर्ष भर में तैंतीस हजार शव जलाए जाते हैं। इनकी आठ सौ टन राख के अलावा तीन सौ टन अधजला मांस, बच्चों, पुरुषों व महिलाओं के तीन हजार शव और लगभग छह हजार जानवरों की लाशें गंगा नदी में प्रवाहित की जाती हैं। फलस्वरूप विषैले तत्त्वों के मिल जाने से गंगा नदी का जल पारदर्शी नहीं रह गया है, बल्कि गहरा नीला पड़ता जा रहा है। कानपुर में चमड़ा और अन्य उद्योगों से बहाए गए कचरे के कारण गंगा का पानी इतना गंदा हो गया है कि उसमें डुबकी लगाना तो दूर, वहां खड़े होकर सांस तक नहीं ली जा सकती।

भारत की यमुना, महानंदा, गंडक, वरुणा, पारवती, नदियां गंदे नालों में तब्दील हो चुकी हैं। जबकि भारत की गंगा, सिंधु और मिस्र की नील और चीन की यांत्सी नदियां प्रदूषण और जलवायु बदलाव के कारण संकट में है। इस ओर ध्यान नहीं दिया गया तो आने वाले कुछ दशकों में गंगा का अस्तित्व इतिहास के पन्नों पर दर्ज होकर रह जाएगा। भारत में कभी गाय के दूध की नदियां बहा करती थीं, लेकिन आज गायें कूड़े के ढेर में मुंह मार रही हैं। कभी जहां उसे खाने को हरी घास, फल-सब्जियों के छिलके मिल जाया करते थे, उन ढेरों से अब उसे पॉलीथीन में भरा सामान खाने को मिल रहा है, जो अतडिय़ों में फंस कर उसे तड़प-तड़प कर मारने को मजबूर कर रहा है। आज विश्व की आबादी का छठा हिस्सा शुद्ध पेयजल की समस्या से जूझ रहा है। साफ पेयजल की अनुलब्धता बहुत-सी बीमारियों का सबब है। अनेक अध्ययन बताते हैं कि दुनिया में अस्सी फीसद बीमारियां प्रदूषित पानी की वजह से होती हैं। सांस लेने के लिए शुद्ध हवा कम पडऩे लगी है। पेयजल के दिनोंदिन विकराल होते जा रहे संकट ने दुनिया के सामने एक नई चुनौती पैदा कर दी है। प्रदूषित जल पीने से असाध्य बीमारियों का लगातार प्रकोप बढ़ता जा रहा है जिससे हैजा, आंत्रशोध, पीलिया, मोतीझरा, ब्लड कैंसर, त्वचा कैंसर, हड्डी रोग, हृदय तथा गुर्दों के रोग हर साल लाखों लोगों को अपनी चपेट में ले लेते हैं।

पेयजल संकट का समाधान निकालने के बजाय इसे बाजार के लिए मुनाफा बटोरने का जरिया बना दिया गया है। बोतलबंद पानी पर निर्भरता बढ़ाई जा रही है। विश्वव्यापी मंदी के दिनों में भी बोतलबंद पानी का कारोबार खूब फला-फूला। लेकिन कितने लोग हैं जो पंद्रह रुपए लीटर पानी का खर्च उठा सकते हैं? अफसोस की बात है कि हमारे नीति नियंता इस सवाल से लगातार आंख चुरा रहे है! वनों की अंधाधुंध कटाई के कारण जीव अपने प्राकृतिक परिवेश से विस्थापित हो रहे हैं। विश्व में प्रतिवर्ष 1.1 करोड़ हेक्टेयर वन काटा जाता है, जिसमें भारत में प्रति वर्ष दस लाख हेक्टेयर वनों की कटाई धड़ल्ले से हो रही है। वनों के विनाश के कारण वन्यजीव लुप्त हो रहे हंै। रूस, इंडोनेशिया, अफ्रीका, चीन सहित भारत के कई अनछुए माने जाने वाले जंगल भी कटाई के शिकार हो चुके हैं। पशु-पक्षी, पेड़-पौधे, जीव-जंतु, मानव और जानवर सभी अपने अस्तित्व के संकट की चपेट में तड़प रहे हैं। पेड़ों के कटने के कारण वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा निरंतर बढ़ती जा रही है। इसके फलस्वरूप धरती का तापमान निरंतर बढ़ रहा है और ओजोन परत के क्षरण और जलवायु बदलाव का संकट पैदा हुआ है। जंगलों के कटते जाने से पशु-पक्षियों की कई प्रजातियां लुप्त हो गई हैं। जंगलों से शेर, चीते, बाघ आदि गायब हो रहे हैं। नब्बे प्रतिशत गिद्ध दुनिया से विदा हो चुके हैं। मौसम में अप्रत्याशित परिवर्तन और असंतुलन निरंतर बढ़ रहा है, जिससे समय-समय पर अतिवृष्टि और अनावृष्टि भी हो रही है। जाहिर है, मौसम में इस तरह के तीव्र उतार-चढ़ाव से दुनिया के सामने खाद्य संकट पैदा हो सकता है। हिमनद सूख रहे हैं। उत्तरी और दक्षिणी ध्रुवों की बर्फ पिघल कर महाविनाश की भूमिका तैयार कर रही है। यह सब पर्यावरण प्रदूषण के परिणामस्वरूप ही हो रहा है। अनुसंधान संस्थान के विशेषज्ञों ने चेताया है कि भारत, पाकिस्तान, श्रीलंका, बांग्लादेश, इंडोनेशिया, विएतनाम और फिलीपींस जलवायु परिवर्तन के दुश्चक्र में फंस चुके हैं। इन देशों के तापमान और समुद्री जल-स्तर में निरंतर वृद्धि हो रही है, जिससे इन स्थानों पर समुद्री तूफान आने की आशंका बनी रहती है। पिछले कुछ वर्षों मेंआए समुद्री तूफानों ने विश्व भर में भारी तबाही भी मचाई है। भारत सरकार वन संरक्षण और वनों के विस्तार की योजना पर गंभीरता से कार्य नहीं कर रही है जिससे उसके अधीनस्थ अधिकारियों, कर्मचारियों और नेताओं की मिलीभगत से सिर्फ कागजों पर पेड़ लगाए जा रहे हैं और उसी पर उग रहे हैं। लेकिन हकीकत में जमीन से पेड़ों की अंधाधुंध कटाई जारी है। शासन-प्रशासन में बैठे लोग, वन विभाग के अधिकारी और पुलिस प्रशासन और ठेकेदारों की मिलीभगत से जारी अवैध कटान ने स्थिति को और विकराल बना दिया है। जिम्मेदार अधिकारी रुपयों के लालच में फंस कर बेशकीमती हरे पेड़ों को अंधाधुंध कटवाने में लगे हुए हैं। फौरी और निजी स्वार्थ से आगे ये कुछ देख नहीं पाते। उन्हें दिखाई नहीं पड़ता कि देश की बहुमूल्य संपदा नष्ट हो रही है। किसी भी देश की प्राकृतिक संपदा वहां की आने वाली पीढिय़ों की भी होती है। अगर इन्हें भविष्य के लिए बचाया नहीं गया, तो आने वाली पीढिय़ां कंगाल हो जाएंगी।

आजादी के बाद से आज तक तिरपन लाख घने जंगल खत्म हो चुके हैं। पर्यावरण मंत्रालय भी वनों को लेकर ज्यादा गंभीर नहीं दिखाई पड़ता है। देश का एक भी मैदानी राज्य ऐसा नहीं है, जो तैंतीस प्रतिशत वनक्षेत्र के मानक पर खरा उतरता हो।

हमें अपना अस्तित्व बचाने के लिए पानी की बर्बादी तथा पर्यावरण प्रदूषण को हर तरह से रोकना होगा, नहीं तो मानव जीवन के सामने इसके भयावह परिणाम आ सकते हैं। देश के सभी सचेत नागरिकों को शपथ लेनी होगी कि हम विरासत में मिली हुई धरोहर पृथ्वी के पर्यावरण को प्रदूषण की समस्या से मुक्त करने का पुरजोर प्रयास करें। साथ ही दुनिया को शस्य श्यामला बनाए रखने के लिए चारों तरफ हरियाली लाएं और वन संपदा तथा जीव-जंतुओं को बचाएं। अगर समय रहते पर्यावरण के संरक्षण, संवर्धन और संतुलन की खातिर ठोस कदम नहीं उठाए गए तो भविष्य में पृथ्वी पर अस्तित्व का संकट खड़ा हो जाएगा।