जल प्रदूषण और उसका मानव जीवन पर प्रभाव भाग-1

  • 2015-12-24 07:30:35.0
  • डा. वीरेन्द्र कुमार

डा. वीरेन्द्र कुमार
रहिमन पानी राखिये बिन पानी सब सून। पानी बिना न उभरे मोती मानस चून।।
जल ही जीवन है, इस कहावत से यह चरितार्थ होता है कि जल जीवन की आवश्यक आवश्यकता है। जल को जीवन का आधार माना गया है। जल पृथ्वी के समस्त प्राणियों व वनस्पतियों के अस्तित्व को बनाये रखने हेतु अति आवश्यक है। भारतीय दर्शन में पांच तत्वों में जल वायु के बाद प्रमुख तत्व है। रामायण में चौपाई है ‘क्षिति जल पावक गगन समीरा, पांच तत्व मिलि बना शरीरा।। उपरोक्त चौपाई में गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी जल की महत्ता को महत्व दिया है। पृथ्वी पर लगभग 70 प्रतिशत जल है। किन्तु इसके पश्चात विश्व में पेय जल का संकट निरन्तर बढता जा रहा है। इस संकट को दूर करने के लिए राष्ट्रीय और अन्तर्रष्ट्रीय स्तर पर भरपूर प्रयास किये जा रहे हैं। मानव तथा पशुओं में 80 प्रतिशत बीमारियां दूषित जल से उत्पन्न होती हैं। सरकार की स्वास्थ्य योजनाओं की असफ लता में सबसे बडा योगदान पीने के शुद्वजल की व्यवस्था का अभाव है। आज जो आप कर्नाटक में बिना समय के बरसात और बाढ़ का आना और हिमाचल में नवम्बर के महीने में बर्फ पडऩा देख रहे हैं, ये दोनों हमारे पर्यावरण प्रदूषण के भयावह उदाहरण हैं, क्योंकि जल जीवन देता है तो जल ही सबसे ज्यादा विनाशलीला का कारण बनता है।
जल प्रदूषण
जल का प्राचीन ग्रन्थों में महत्व
प्राचीन भारतीय संस्कृति में जल को देवता के रूप में पूजा जाता था। भारतीय परम्परा में जल को शुद्वता का प्रतीक माना जाता है। किसी भी शुभ कार्य का सम्पादन यहां जल के बिना सम्भव नही होता है। हमारे पूर्वजों ने जल को जीवन का प्रतीक माना है। यहां सामान्य जल से आचमन तथा गंगा जल के छिडक़ाव से ही किसी वस्तु, स्थान या मनुष्य की शुद्वि हो जाती है। भारतीय संस्कृति , धर्म और परम्परा में प्रकृति की अनुपम भेंट नदियों और जल-सम्पदा का विशेष स्थान और महत्व रहा है। प्राचीन भारतीय संस्कृति में जल के महत्च तथा इसके संरक्षण के विभिन्न प्रमाण मिलते हैं।
ऋग्वेद में कहा गया हैं-सर्वेषजम् अप्सू में जीवनां जीवनम् जीजोजगत ।।
अर्थात ‘जल प्राणियों का प्राण है मैने तुम्हारे लिए सभी प्रकार की औषधियां जल में सुरक्षित रख छोड़ा है।’
यजुर्वेद में ऋषि जल से कल्याणकारी होने की प्रार्थना करता है- ‘रौ सौराभि स्वन्तु न: ’
अथर्ववेद में जल की चर्चा करते हुए कहा गया है कि ‘अवस्परतपमृतमप्सु’ अर्थात जल अमृत है।
सामवेद में जल को ऊर्जा स्रोत रोगनाशक तथा पुष्टकारक बताया गया है, जल प्रणियों के लिए शुद्व रूप में कल्याणकारी होता है।
मनुस्मृति के चौथे अध्याय के गृहस्थ नियम के 56 वें श्लोक में कहा गया है-
नात्सु मूत्रं परीषं वाष्ठीवनं वा समुत्सृजते । अमेध्य लिप्तमन्यद्वा लोहितं वा विषाणि वा।।
अर्थात जल में मल मूत्र न त्यागें, थूकें नहीं अथवा दूषित पदार्थ रक्त, मांस या विष आदि न डालें।
पुराणों में गंगा, गोदावरी यमुना कृष्णा कावेरी आदि नदियों को श्रद्वा-विश्वास के साथ पूज्य माना गया है।
‘ओउम् गंगे च यमुने चैव गोदावरी सरस्वती नर्वदे सिंधु कावेरी जल अस्मिन सन्निधि कुरू’
ऋषियों द्वारा जल को जीवन तथा अमृत की संज्ञा दी गई । जल के विभिन्न सा्रेतों को पवित्र घोषित किया गया है। जल स्रोतों से जल ग्रहण करने की नियमावली का निर्धारण किया गया है। जल को दूषित करना पाप घोषित किया गया, और पापों के लिए प्रायश्चित निर्धारित किए गए हैं।
श्रीमद्भागवत पुराण में नागलीला का दृष्टान्त दशवें अध्याय में जल प्रदूषण नियंत्रण की कहानी है। कालिया नाग उस जहर का प्रतीक है जो गंदे नालों के रूप में यमुना अथवा अन्य नदियों में प्रवाहित होता है।
महाभारत के अनुशासन पर्व में कृष्ण द्वैपायन ने लिखा है-
शीतं स्वादु स्वच्छमत्यं तरूच्यं पथ्यं पाच्य पाचनं पापहारी। तृष्णा मोहध्वंसनं दीपनं च प्रजा धत्ते वारि भागीरथीयम्।।
अर्थात गंगा दुग्ध के सदृश्य उज्जवल, घृत के समान स्निग्ध जल से परिपूर्ण है। इसका जल स्वाद युक्त, स्वच्छ पथ्य, भोजन पचाने वाला, प्यास मिटाने वाला क्षुधा और बुद्वि का वद्र्वक है। और महाभारत में ही अन्य श्लोक में कहा गया है। -
भगवान विष्णु रूपी वैद्य ने गंगा जल में तरूणाई को स्थाई रखने वाला साक्षात् औषधितुल्य गंगा जल उपलब्ध कराया है।
शरीरे जर्जरी भूते व्याधि ग्रस्ते कलेवरे। औषधं जाह्रीतोयं वैधो नारायणों हरि:।।
महाकवि कालीदास द्वारा रचित स्रोत रत्नावली के ‘मंगलाष्टक स्रोत्रम्’ के सातवें पद में देश की प्रमुख नदियों और सागर से मंगल प्राप्ति के लिए आशीर्वाद मांगते हुए कहा है-
गंगा सिंधु, सरस्वती च यमुना, गोदावरी नर्वदा,। कावेरी, सरयु, महेन्द्र तनया चर्मण्डवती वेदिका।।
क्षिप्रा वेत्रवती सहासुर नदी क्ष्याता, चयागंण्डकी। पूर्णा: पुर्ण जलै:। समुद्र सहिता: कुर्वन्तु नो मंगलम्।।
ईसा पूर्व चौथी शताब्दी में यूनान में हिप्पोक्रेट्स ने अपने निबन्ध वायु, जल एवं स्थान में लिखा था कि जो सही दवा बनाना चाहते हैं उन्हें जल के गुणों पर अवश्य विचार करना चाहिए क्योंकि जल अपने गुणों में भिन्न-भिन्न होते हैं।
मुहम्मद तुगलक ने अकाल के समय कुएं एवं तालाब खुदवाए।
फीरोज तुगलक ने सिंचाई के लिए नहरें बनवाई। उसने सतलुज और यमुना नदियों से चार नहरों का निर्माण कराया।
बाबर प्रकृति प्रेमी था, उसने ‘बाबरनामा’ में भारत के नदी तालाबों झीलों आदि का मनोहारी वर्णन किया।
शेरशाह सूरी ने भी यात्रियों की सुविधा हेतू कुएं खुदवाए।

जल प्रदूषण:-
जल समस्त जीव जगत का आधार है जो न केवल मानव अपितु जीव-जन्तु वनस्पति आदि का जीवन क्षेत्र है। जल में कार्बनिक या अकार्बनिक पदार्थ मिश्रित हो जाते हैं तो उसकी भौतिक व जैविक संरचना भी बदल जाती है, उसमें दुर्गन्ध उत्पन्न हो जाती है। जो न केवल मानव अपितु वनस्पतियों एवं जीव जन्तुओं को प्रभावित करता है। जल का यह रूप जल प्रदूषण कहलाता है।
जल प्रदूषण के मुख्य रूप से दो प्रकार है-

1. जल प्रदूषण के प्राकृतिक स्रोत्र-इसमें बहते हुए पानी के सम्पर्क में धातुओं के विषैले पदार्थ, पौधों का पत्तियां, प्राणियों के मलमूत्र, खनिज पदार्थ, ह्राूमस, भूक्षरण।

2. जल प्रदूषण के मानवीय स्रोत्र-इसमें तापीय प्रदूषण- औद्योगिक एवं उर्जा इकाइयों, ताप बिजली घर, परमाणु बिजली घर, अपने संयत्र को ठण्डा रखने के लिए जल का प्रयोग करते हंै, निष्कासित जल नदी में, झील या समुद्र आदि में छोड़ा जाता है, जिससे उस जल का ताप बढ़ जाता है और इसमें रहने वाले जीव जन्तु या वनस्पतियों के स्वास्थ पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। इसे तापीय प्रदूषण कहते हैं। तैलीय प्रदूषण रेडियो एक्टिव अपशिष्ट-विभिन्न औद्योगिक स्रोत्र से नदी या अन्य जल स्रोत्रों में तेल या तैलीय पदार्थों के मिलने से तैलीय प्रदूषण जल में फैलता है। नदियों की अपेक्षा समुद्रों में तैलीय प्रदूषण की समस्या बहुत बड़ी है क्योंकि तेल ले जा रहे टैंकरों के जलयानों की दुर्घटना या रिसाव या तेल उतारते समय से इसका प्रभाव ज्यादा दिखाई पड़ता है। (लेखक एक विचारक हैं)