मुसलमानों की मजबूरी : शरीय : इस्लाम के विद्वानों की दृष्टि में

  • 2016-06-19 12:30:08.0
  • डॉ. पुरुषोत्तम मीणा

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अधिकांश मुस्लिम विद्वान श्रद्घानंद और लाजपत राय को कांग्रेस के साम्प्रदायिक हिंदू नेता कहते आये हैं। मोहम्मद अली और मौहम्मद अली जिन्नाह ने तो गांधीजी को भी घोर साम्प्रदायिक बताकर कहा था कि वह भारत के करोड़ों मुसलमानों को हिंदुओं का गुलाम बनाना चाहते हैं।

मुसलमानों के तीव्र आगह पर सन 1921 में स्वामी श्रद्घानंद को दिल्ली जामा मस्जिद में प्रवचन करने के लिए आमंत्रित किया गया। मस्जिद का आंगन खचाखच भरा था। खिलाफत आंदोलन में अपनी भूमिका के कारण श्रद्घानंद मुसलमानों के हृदय सम्राट बन गये थे। एक काफिर द्वारा जामा-मस्जिद के धार्मिक मंच से मुसलमानों को धार्मिक प्रवचन देने की यह एक अभूतपूर्व घटना थी। किंतु सन 1926 में केवल 5 वर्ष बाद एक मुसलमान अब्दुल रशीद ने उन्ही श्रद्घानंद की रूग्णावस्था में गोली मारकर हत्या कर दी थी। एक राष्ट्रीय मुस्लिम आसफ अली ने हत्यारे की वकालत की।  राष्ट्रीय मुसलमानों की संस्था जमायतुल उलेमा ने एक पत्रक निकालकर निंदा के स्थान पर इस हत्या को और हत्यारे को सम्मानित करने को उचित ठहराया। फंासी के बाद 50,000 मुसलमानों की भीड़ उसके जनाजे के पीछे थी। उसे गाजी और शहीद जैसी उपाधियों से सम्मानित किया गया। उसे सर्वोच्च जन्नत में स्थान दिलाने के लिए मस्जिदों में नमाजें पढ़ी गयीं और कुरान के अखण्ड पाठ किये गये।।

लाला लाजपत राय ने सन 1921 में कहा था-किसी भी दूसरी कौम की गुलामी से हिंदुओं को मुसलमानों की गुलामी करना श्रेष्ठ होगा। उन्हें लाजपत राय को सन 1925 में इस्लाम शरीय: के अध्ययन के पश्चात कहना पड़ा मैं हिंदू मुस्लिम एकता को आवश्यकता समझता हूं। मैं मुस्लिम नेताओं पर विश्वास करने को भी तत्पर हूं। किंतु कुरान और हदीस के आदेशों का क्या होगा? उन पर तो मुस्लिम नेताओं का भी हक नही है।

यह जानना आवश्यक है कि ऐसा क्यों होता है? कुरान और हदीस कके यह आदेश क्या हैं जिनकी उपेक्ष मुस्लिम नेता भी नही कर सकते? जिनके कारण हिंदू मुस्लिम एकता के स्वप्न ध्वस्त होते रहे हैं? जिनका मूल्य हिंदुओं को खून बलात्कार ओर बलात धर्म परिवर्तन के रूप में चुकाना पड़ा है किंतु फिर भी यह एकता मृग मरीचिका ही बनी रही है? शाहाबुद्दीन इमाम बुखारी इत्यादि नेता आये दिन कहते रहते हैं कि शरीय: अमिट है। राष्ट्रीय महत्व के मुद्दे पार्लियामेंट के प्रत्येक आदेश न्यायालय के प्रत्येक निर्णय को यह शरीय: की कसौटी पर कसकर ही स्वीकार या अस्वीकार करेंगे। किंतु अंग्रेजों के समय से आज तक उन्होंने शरीय साक्ष्य और फौजदारी विधानो दो स्त्री साक्षियों को एक पुरूष साक्षी के समान मानना, काफिर के साक्ष्य को न मानना काफिर बध के लिए मुसलमान को दण्ड न देना, चोरी के लिए हाथ पैर काटना व्यभिचार के लिए कोड़े लगाना और पत्थर मार-मारकर बध करना इत्यादि के विपरीत इंडियन ऐविडेंस एक्ट तथा भारतीय दण्ड संहिता को क्यों स्वीकार किया? बेग पूछते हैं क्या इस प्रकार के शरीय: विरोधी विधानों को मानना कुफ्र नही है यह तो मीठा-मीठा हप-हप कड़वा कड़वा थू-थू वाली बात हुई।

शाहबानों केस में सर्वोच्च न्यायालय के फैसले शरीय : विरूद्घ कहकर सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को सरकार के एक मुस्लिम मंत्री ने क्यों तेली तम्बोली तक कह डाला? उसके अभद्र व्यवहार के प्रति न पार्लियामेंट ने न सर्वोच्च न्यायालय ने उसके विरूद्घ कार्यवाही की?

संसार के समस्त देशों में भारत में मुसलमानों की संख्या सर्वाधिक है। उन्होंने भारत पर लगभग 1000 वर्ष तक राज्य किया है। किंतु स्व. मानवेन्द्रराय के शब्दों में संसार का कोई भी सभ्य समाज इस्लाम के विषय में इतना अनभिज्ञ नही है जितना हिंदू समाज है। भारत की एकता और अखण्डता की रक्षा की बात सोचने से भी पहले इस अनभिज्ञता का अंत आवश्यक है।

अरबी में एक सुंदर उक्ति द्वारा उपदेश दिया गया है-यदि तुम्हें मालुम नही है तो विद्वानों से पूछो। मुसलमान इसका अक्षरश: पालन करते हैं। इस प्रकार के पूछे गये प्रश्नों के उत्तर में ही इस्लाम के विद्वान फतवे जारी करते हैं जिनका पालन करना प्रत्येक मुसलमान के लिए अनिवार्य है।

इस्लाम में इन उलेमा की परंपरा अद्वितीय है। अनुयाइयों की संख्या के अनुसार इस्लाम संसार के महान धर्मों में ईसाई मत के पश्चात दूसरे नंबर पर है। उसने संसार के महानतम साम्राज्य पर शताब्दियों राज्य किया हे। अनगिनत युद्घ और संधियां की हैं। विजय और पराजय का मुख देखा है। इन सभी अनुभवों का विश्लेषण कुरान और हदीस के प्रकाश में समर्पित उलेमा भावी मार्ग दर्शन के लिए करते रहे हैं। इस प्रकार एक विशाल साहित्य का सृजन हुआ है। इनमें कुछ उलेमा ऐसे भी हैं जिन्होंने महाबलशाली और क्रूर सुल्तानों के सामने ऐसी व्यवस्थाएं दी हैं जिनके कारण उन्हें अपना जीवन भी दांव पर लगाना पड़ा है।

उलेमा, मौलवी, मुफ्ती, काजी इत्यादि धर्माचार्य मुस्लिम समुदाय के महत्वपूर्ण व्यक्ति हैं। हर प्रकार के नियंत्रण के बाहर सहस्रों मदरसे लाखों मस्जिदों में चलने वाले छोटे-छोटे मकतब, जिनमें मुस्लिम शिशुओं की मानसिकता का निर्माण होता है इन्हीं के द्वारा चलाये जाते हैं। देहरादून में किये गये एक सर्वेक्षण के अनुसार वयस्क मुस्लिम पुरूषों का लगभग 53 प्रतिशत जन समुदाय भारत की लाखों मस्जिदों में और त्यौहारों और विशेष अवसरों पर भी नमाज के बाद इन्हीं के प्रवचन धार्मिक श्रद्घा भाव से सुनता है।

मुशीरूल हक के अनुसार-मदरसों और फतवों की  प्रणाली के माध्यम से मुस्लिम जन साधारण की सोच पर उलेमा की निसंदेह जबरदस्त पकड़ है वह उनको जिस दिशा में चाहे मोड़ सकते हैं। डा. ताराचंद का भी कहना है कि फतवों और मदरसों के माध्यम से इन उलेमा की जनसाधारण पर जबदरस्त पकड़ है वह अपढ़ कारीगरों किसानों और मजदूरों को उत्तेजित कर ऐसा उन्माद पैदा कर सकते हैं कि जिसके कारण वह अपना जीवन भी न्यौछावर करने को उद्यत हो जाते हैं।


इसी कारण से उलेमा का राजनीतिक मूल्य भी बहुत है। एक आध साम्प्रदायिक हिंदू कहे जाने वाले राजनीतिक दलों को छोडक़र सभी उनका आशीर्वाद प्राप्त करने के इच्छुक रहते हैं। उलेमा उन्हें यह आशीर्वाद कड़ी शर्तों और मूल्य पर देने को तैयार होते हैं। इसी कारण साम्प्रदायिकता पनपती है।

इस प्रकार के प्रभावशाली वर्ग द्वारा अपने धर्म इस्लाम और शरीय: कानून की व्याख्या अथवा समीक्षा को अनदेखा नही किया जा सकता। दुर्भाग्यवश भारत में इनके विचारों, समीक्षाओं व्यवस्थाओं इत्यादि का हिंंदू विद्वानों द्वारा अध्ययन लगभग नही के बराबर है। इस उपेक्षा के कारण देश का विभाजन जैसे रक्त रंजि परिणाम देखने वाले अभी पर्याप्त लोग जीवित होंगे।

अब स्थिति यह हो गयी है कि भारतीय संविधान के परिप्रेक्ष्य में इन विद्वानों के विचारों की यदि और उपेक्षा की गयी तो भारत का धर्मनिरपेक्ष जनतांत्रिक विश्व बंधुत्व और मानवतावादी ढांचा चरमरा कर टूटने ही वाला है। इसलिए यह अध्ययन तुरंत अत्यावश्यक है। भारतीय मुसलमान मोटे तौर पर दो भागों में बंटे हुए प्रतीत होते हैं। पहले समूह में जो अल्पसंख्यक है अधिकतर आधुनिक शिक्षा पाये हुए मुसलमान है। उनका मत है कि एक आस्था के रूप में धर्म का धर्मनिरपेक्षता के साथ सह अस्तित्व संभव है। दूसरा समूह जिसका नेतृत्व उलेमा करते हैं इस बात पर अटल है कि धर्म केवल आस्था ही नही शरीय भी है। धर्मनिरपेक्षता के साथ आस्था का सह अस्तित्व भले ही संभव हो पर शरीय: का नही।

पहले वर्ग के विद्वानों का मुसिलम जन साधारण पर प्रभाव नगण्य है इसके लिए पिछले 45 की राजनीति भी जिम्मेदार है क्योंकि मुसलमानों के वोट पाने के लिए कांग्रेस और उससे ही टूटी बिखरी विरोधी पार्टियों ने इस वर्ग को कभी महत्व न देकर दूसरे वर्ग के कट्टर वादी उलेमा को ही बढ़ावा दिया है।

मुसलमानों के ऐसे प्रभावशाली और आदरणीय विद्वानों के विचारों की उपेक्षा करना और इस्लाम की मनमानी व्याख्या करना न मुसलमानों के प्रति न्यायपूर्ण है न गैर मुसलमानों के हित में है। इससे उपर्युक्त अनभिज्ञता के मिटने के स्थान पर उसे बढ़ावा मिलता है।

उलेमा की दो शीर्षस्थ संस्थाएं हैं जमाते-इस्लामी हिंद और जमायत उन उलेमाये हिं। लगभग सभी मुसलमान उन में से एक अथवा दूसरे के साथ जुड़े हुए हैं।
- पुरूषोत्तम