अभिनव क्रांतिकारी स्वातंत्र्य वीर सावरकर

  • 2015-06-27 07:25:12.0
  • अमन आर्य

Savarkarनासिक के समीप भगूर नामक ग्राम में 28 मई, सन् 1883 को जन्मे वीर सावरकर आधुनिक भारत के निर्माताओं की अग्रणी पंक्ति के जाज्लयमान नक्षत्र है। वे पहले ऐसे राष्ट्रभक्त विद्यार्थी थे, जिन्होंने अंग्रेजी सरकार का कायदा-कानून भारत में स्वीकार करने से इन्कार किया और लोगों को भी उस बारे में ललकारा ।

* पूर्ण स्वतंत्रता ही भारत का लक्ष्य है की उद्घोषणा करने वाले सर्वप्रथम नेता वीर सावरकर ही थे ( लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक से भी पहले ) ।

* वीर सावरकर ने सबसे पहले स्वदेशी की आवाज उठायी थी । वह पहले ऐसे नेता थे , जिन्होंने स्वदेशी की अलख जगाने के लिए पुणे में ( सन् 1906 में ) विदेशी वस्त्रों की होली जलाकर ( मोहनदास करमचंद गांधी से भी पहले ) लोगों को विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार करने को कहा था ।

* वीर सावरकर के सरकार विरोधी भाषणों के लिए उन्हें कालेज से निकाल दिया गया था । राजनीतिक कारणों से किसी कालेज से निकाले जाने वाले वह पहले विद्यार्थी थे । परीक्षा के समय कालेज के अधिकारियों ने उन्हें परीक्षा में बैठने की अनुमति दे थी ।

* वीर सावरकर पहले स्नातक थे, जिनसे उनके स्वतंत्रता के लगाव के कारण बम्बई विश्वविद्यालय ने 1911 में डिग्री छीन ली थी ( उसी डिग्री को 1960 में वापस लौटाया ) ।

* वीर सावरकर पहले भारतीय थे, जिन्होंने अंग्रेजी सत्ता के विरोध में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संगठित रूप में बगावत की और दूसरे देशों के क्रांतिकारियों से संबंध प्रस्थापित किया। जिसका लाभ आगे चलकर नेताजी सुभाष चन्द्र बोस और उन की सेना को भी हुआ।

* वीर सावरकर द्वारा लिखित 1857 का स्वतंत्रता समर विश्व की पहली पुस्तक है, जिस पर उसके प्रकाशन से पूर्व ही प्रतिबंध लगा दिया गया। (तब तक अंग्रेजों और अंग्रेजों के चमचों ने इस स्वतंत्रता संग्राम को दुनिया के सामने सैनिक विद्रोह के स्वरूप में ही रखा था।  उन्होंने लंदन में 1857 के स्वतंत्रता समर का अद्र्ध शताब्दी (50 वीं वर्षगाँठ ) समारोह भी धूमधाम से मनाया।

* वीर सावरकर पहले देशभक्त थे , जिन्होंने भारत स्वतंत्र होने से चालीस वर्ष पूर्व ही स्वतंत्र भारत का ध्वज बनाकर जर्मनी के स्टुटगार्ट में होने वाली अंतरराष्ट्रीय परिषद् में मादाम भीखाजी कामा के हाथों दुनिया के सामने लहराया ।

* वीर सावरकर पहले ऐसे विद्यार्थी थे , जिन्हें इंग्लैंड में बैरिस्टरी की परीक्षा उत्तीर्ण कर लेने के बावजूद , ब्रिटिस साम्राज्य के प्रति राजनिष्ठ रहने की शपथ लेने से इन्कार करने के कारण , प्रमाणपत्र नहीं दिया गया ।

* सन् 1909 में जब वीर सावरकर यूरोप में थे , उनके बड़े भाई श्री गणेश दामोदर सावरकर को आजीवन कालापानी की सजा हुई । भारत में ब्रिटिस सरकार ने उनके परिवार की तमाम संपत्ति भी जब्त कर ली । परिवार के लोग सडक़ पर खडे रह गये ।

* वीर सावरकर विश्व के प्रथम राजनीतिक बंदी थे जिन्हें विदेशी (फ्रांस) भूमि पर बंदी बनाने के कारण जिनका अभियोग हेग के अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय में चला ।

* वीर सावरकर विश्व इतिहास के प्रथम महापुरूष है , जिनके बंदी विवाद के कारण फ्रांस के प्रधानमंत्री एम. बायन को त्याग-पत्र देना पडा था ।

* वीर सावरकर विश्व मानवता के इतिहास में प्रथम व्यक्ति थे , जिन्हें दो आजीवन कारावास ( 50 वर्ष ) की लम्बी कालेपानी की कैद की सजा दी गई ।

* वीर सावरकर विश्व के प्रथम कैदी कवि थे , जिन्होंने कालेपानी की कठोर सजा ( कोल्हू में बैल की जगह जुतना , चुने की चक्की चलाना , रामबांस कूटना , कोड़ों की मार सहना ) के दौरान कागज और कलम से वंचित होते हुए भी अंदमान जेल की कालकोठरी में 11 हजार पंक्तियों की ‘ गोमांतक ‘ ‘कमला ‘ जैसी काव्य रचनाएँ जेल की दीवारों पर कील और काँटों की लेखनी से लिखकर की । दीवारों को प्रत्येक वर्ष सफेदी की जाती थी , इसलिए उन काव्यों को कंठस्थ करके यह सिद्ध किया कि सृष्टि के आदि काल में आर्यो ने वाणी ( कण्ठ ) द्वारा वेदों को किस प्रकार जीवित रखा ।

* जहाँ गांधी और नेहरू को जेल में क्लास ए की सुविधाएँ उपलब्ध थीं , वही सावरकर की श्रेणी डी ( खतरनाक ) थी, कैद के दौरान उन्होंने घोर अमानवीय यातनाओं को झेलना पढा , जिसमें कोल्हू में तैल पेरना , रस्सी बटना आदि शामिल था ।

* अंदमान जेल में भी जोर- जबरदस्ती हिन्दुओं को इस्लाम धर्म में परिवर्तित किया जाता था , जिसका वीर सावरकर ने प्रबल विरोध किया ।

* वीर सावरकर ने हिन्दुस्थान में सामाजिक परिवर्तन और एकता लाने के लिए जाति - वर्ण भेद के विरोध में ठोस कार्यवाही की , जैसे पतित - पावन मन्दिर की स्थापना , जहाँ सभी वर्ण के लोगों का प्रवेश था । मन्दिर का पुजारी एक अछूत था । अस्पृश्य कहे जाने वाले लोगों से वेद - शास्त्रों का पठन करवाया ।भारतवंशीयों का शुद्धिकरण कर हिन्दू धर्म में वापस लाया गया । समाज को विज्ञाननिष्ठ बनने का आव्हान करते हुए उन्होंने अन्धश्रद्धाओं पर जबरदस्त हमला किया ।

* भाषाई और सांप्रदायिक एकता के लिए वीर सावरकर का योगदान अमूल्य है। वह मराठी साहित्य परिषद के पहले अध्यक्ष थे ।

संस्कृतनिष्ट हिंदी के प्रचार का बिगुल बजाया। इसके लिए उन्होंने एक हिन्दी शब्दकोष की भी रचना की । शहीद के स्थान पर हुतात्मा, प्रूप के स्थान पर उपमुद्रित, मोनोपोली के लिए एकत्व , मेयर के लिए महापौर आदि शब्द वीर सावरकर की ही देन है । वह उस समय के प्रथम ऐसे हिन्दू नेता थे जिनका सार्वजनिक सम्मान शिरोमणि गुरूद्वारा प्रबंधक कमेटी ने किया था ।

* 83 वर्ष की आयु में योग की सवौच्च परंपरा के अनुसार 26 दिन तक खाना व दो दिन तक पानी छोडक़र आत्मसमर्पण करते हुए 26 फरवरी , 1966 को मृत्यु का वरण किया , ऐसे अभिनव क्रांतिकारी थे वीर सावरकर ।