हिंदुत्व समर्थकों और विरोधियों में सीधे संघर्ष

  • 2015-11-03 12:30:17.0
  • अनिल गुप्ता
हिंदुत्व समर्थकों और विरोधियों में सीधे संघर्ष

श्री नरेंद्र मोदी जी का भारत के प्रधान मंत्री पद पर आरूढ़ होना नियति की इच्छा से संभव हुआ है। माँ भारती पिछले एक हज़ार वर्षों से सिसक रही थी कि कोई तो आये और उसके कष्टों का निवारण करे। सभी हिंदुत्व प्रेमियों के सहयोग से मोदी जी प्रधान मंत्री बने।

पिछले एक हज़ार वर्षों में देश ने कई दौर देखे हैं। मुस्लिम सुल्तानों का दौर देखा, फिर मुग़लिया अत्याचारों का दौर देखा। लेकिन किसी भी दौर में माँ भारती के सपूतों ने प्रतिरोध की ज्वाला ठंडी नहीं पडऩे दी। हर मुस्लिम सुलतान/बादशाह का प्रतिरोध किया।यही कारण था कि एक बादशाह के मरने पर उसके उत्तराधिकारी को पुन: पूर्व में विजित क्षेत्रों को जीतने के लिए अभियान चलाना पड़ा क्योंकि मौका मिलते ही स्थानीय रूप से स्वायत्तता और स्वतंत्रता की घोषणा कर दी जाती थी।यहाँ तक कि मुग़लों के आगमन तक मुस्लिम बादशाहों के राजकाज कि सारी बागडोर हिन्दुओं ने अपने हाथ में ले ली थी।शेरशाह सूरी का सबसे ताकतवर अधिकारी राजा हेमचन्द्र (जिसे इतिहास में हेमू के नाम से जाना जाता है) हो गया था। और मुग़लों के आने के बाद भी हुमायूँ के मरते ही उसने दिल्ली पर अपना राज्य कायम कर दिया था जो दो माह तक चला और बाद में अकबर की फ़ौज़ ने बैरमख़ाँ की नेतृत्व में उससे युद्ध किया जिसमे हेमचन्द्र जीतने ही वाला था कि एक तीर उसकी आँख में आ लगा और वह घोड़े से गिर गया। उसके गिरते ही फ़ौज़ में अव्यवस्था फ़ैल गयी और भगदड़ मच गयी क्योंकि सेकंड लाइन ऑफ़ कमांड नहीं बनायीं गयी थी। बैरम खान ने राजा हेमचन्द्र को पकड़ कर अकबर के सामने पेश किये और अकबर ने अपने हाथों से उस काफिर राजा हेमचन्द्र का सिर कलम कर दिया जिसके कारण अकबर को ग़ाज़ी की उपाधि से नवाजा गया।

अकबर ने बड़ी चालाकी से हिन्दुओं में फुट डालो और राज करो की नीति का अनुसरण किया लेकिन फिर भी महाराणा प्रताप ने अकबर का आजीवन प्रतिरोध किया और देश भक्ति की एक अप्रतिम मिसाल स्थापित की। आगे शिवाजी ने औरंगज़ेब को दक्षिण में उलझाये रखा और वहीँ औरंगाबाद के पास 1707 में उसकी मौत हो गयी। शिवाजी से प्रेरणा लेकर अनेकों हिन्दू राजा उठ खड़े हुए। और औरंगज़ेब के बाद मुग़ल सल्तनत इतनी कमजोर हो गयी कि उसको सिपाहियों की तनख्वाह के भी लाले पड गए। हिन्दू राजा रतन चंद ने उसे आर्थिक सहयोग देकर जजिया समाप्त कराया और अनेकों काम हिन्दू हितों के कराये।1857 तक दिल्ली के बादशाह बहादुरशाह जफ़र का राज केवल पालम तक सिमट गया था। तो ऐसा था हिन्दुओं का स्वाभिमान और स्वतंत्रता की प्रति जोश। आठ शताब्दियों के राज के बाद भी हिंदुत्व की भावना कमजोर नहीं पड़ी थी।

लेकिन अँगरेज़ बहुत चालक था। 1835 में मेकाले नेयह समझ लिया था और उसने इंग्लैंड की संसद को बताया भी था कि हिंदुस्तान कि संस्कृति और हिन्दुओं का तत्वज्ञान दुनिया में सर्वश्रेष्ठ है अत: अगर वहां निरंतर राज्य करना है तो हिंदुत्व को और उनकी संस्कृति को कमजोर करना होगा। और इसी उद्देश्य से अनेकों चर्च केअधिकारियों को संस्कृत का अध्ययन करके हिन्दू शास्त्रों का मनमाने ढंग से अनुवाद करने का कार्य किया गया.जर्मन विद्वान मैक्स मुलर भी इसी योजना का एक हिस्सा था और उसने जानबूझकर वेदों और उपनिषदों का अनुवाद गलत तरीके से किया।

शुरू में कुछ जर्मन विद्वानों ने संस्कृत के प्रति पूरी श्रद्धा दिखाई और संस्कृत के अध्ययन को बढ़ावा दिया। 1783 में कलकत्ता में सर विलियम जोंस प्रधान न्यायाधीश बना और उसने 1789 में कालिदास की अभिज्ञान शाकुंतलम का और 1794 में मनुस्मृति का अंग्रेजी में अनुवाद किया।और उसी वर्ष उसका देहांत हो गया। 1805 में विलियम जोंस के कनिष्ठ सहयोगी सर हेनरी टामस कोलब्रुक ने ओन दी वेदाज नामक एक वेद विषयक निबंध लिखा। सन 1818 में जर्मनी के बोन विश्वविद्यालय में ऑगस्ट विल्हेल्म फान श्लेगल प्रथम संस्कृत अध्यापक बना।उसका भ्राता फ्रेडरिक श्लेगल था जिसने सन 1808 में हिन्दुओं के वाग्मय और प्रज्ञा पर (अपॉन दी लैंग्वेजेज एंड विजडम ऑफ़ दी हिंदूज) नामक ग्रन्थ लिखा था।दोनों भाईयों ने संस्कृत के प्रति अगाध प्रेम प्रदर्शित किया था। ऑगस्ट श्लेगल ने भगवद्गीता का अनुवाद लिखा। जिसके कारण हर्न विल्हेल्म फान हम्बोल्ट का ध्यान इस ओर आकर्षित हुआ।ओर उसने टिप्पणी कि, विश्व की यह संभवत: सबसे अगाध ओर उच्चतम वस्तु है। (इट इज परहैप्स दी डीपेस्ट एंड लॉफ्टिएस्ट थिंग दी वल्र्ड हेज टू शो.)उन्ही दिनों जर्मन दार्शनिक आर्थर शोपेनहावर ने फ्रेंच लेखक अंक्वेटिल दू पैरों द्वारा दारा शिकोह के उपनिषदों के फ़ारसी अनुवाद सीरे अकबर का लेटिन में किया गया अनुवाद पढ़ा।उसने उपनिषदों के तत्वज्ञान से प्रभावित होकर लिखा कि, उपनिषद मानव-ज्ञान की सर्वोच्च उपज हैज् इनमे प्राय: श्रेष्ट मानवीय विचार निहित हैं। अनुवाद रूप में ही सही, उपनिषदों का अध्ययन उनके लिए बहुत पेरणादायक ओर आत्मसंतोष का साधन बना।

उन्होंने लिखा, इसका पाठ संसार में उपलब्ध या सम्भाव्य सबसे अधिक संतोषप्रद ओर आत्मोन्नति का साधन है,यह मेरे जीवन की लिए सांत्वना दायक रहा है ओर यह मेरी मृत्यु की समय भी सांत्वना देगा। यह सुविख्यात है की लेटिन औपनेखत (उपनिषद) ग्रन्थ सदैव उनकी मेज पर रखा रहता था औ शयन से पूर्व वो नित्य ही नियमपूर्वक इसका अध्ययन किया करते थे।

ऐसे लेखों ने जर्मन विद्वानों को संस्कृत सीखने के लिए अधिकाधिक आकर्षित किया और उनमे से अनेकों भारतीय संस्कृति को श्रद्धास्पद समझने लगे। प्रो.विंटरनिट्ज़ ने उनकी भावना ओर उत्साह के बारे में लिखा, जब पश्चिम ने सर्वप्रथम भारतीय वाग्मय का परिचय प्राप्त किया तब भारत से आने वाली प्रत्येक साहित्यिक कृति को वहां के लोग सहज ही अति प्राचीन युग की मान लेते थे।वे भारत को मनुष्य जाति का अथवा कम से कम मानव सभ्यता का उद्गम-स्थल मानते थे।

सच्चाई के प्रेमी इन विद्वानों के लेखों और भारतीय वाग्मय की इस मुक्त प्रशंसा से रूढि़वादी यहूदी और ईसाई बौखला गए। इस सम्बन्ध में हेनरी जि़म्मर ने लिखा, पाश्चात्य विद्वानों में शोपेनहावर पहले व्यक्ति थे जिन्होंने यूरोप के ईसाई वातावरण के भारी मेघगर्जन की बीच भी इस सम्बन्ध में अतुलनीय ढंग से उद्घोष किया। (न्यू इंडियन एन्टीक्वारी,1938 प.67).

वास्तव में यहूदी आर्यों के ही वंशज थे।लेकिन बाद में वो यह बात भूल गए। 1654 में आयरलैंड के आर्कबिशप उशर ने घोषणा की कि सृष्टि का निर्माण ईसा से 4004 वर्ष पूर्व हुआ है। अत: पश्चात्वर्ती ईसाई और यहूदी विद्वानों के लिए यह स्वीकार करना कठिन हो गया कि कोई जाति या सभ्यता उनके इस काल निर्धारण से प्राचीन कैसे हो सकती है।