मजहबी उन्माद के घातक उत्पाद

  • 2016-07-12 10:00:24.0
  • कुलदीप नैयर

ढाका में आतंकवाद

दक्षिण एशियाई मुल्कों की सरकारों को अब इस हकीकत से वाकिफ होना होगा कि आतंकवाद को अब सीरिया या यमन के दूरदराज के इलाकों तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता। आईएसआईएस ने न केवल दुनिया के हर कोने में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाई है, बल्कि उसने अब अपने अभियान में स्थानीय लोगों का समर्थन जुटाना भी शुरू कर दिया है। दक्षिण एशियाई मुल्कों को अब इस विषय विशेष पर एक मंच पर आकर गहन मंथन के जरिए कुछ ठोस उपाए खोजने होंगे कि यह क्षेत्र परमाणु अभियान के दुरुपयोग का केंद्र न बने.

ढाका में आतंकियों द्वारा हमले को अंजाम देकर दर्जनों लोगों को मौत के घाट उतारना महज कुछ लोगों का पथ विचलन नहीं माना जा सकता, बल्कि वे तो ऐसे प्रतिबद्ध उत्पाद थे, जिनकी सोच को मजहबी कट्टरपन द्वारा जहरीला बना दिया गया था। बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना ने बिलकुल ठीक कहा कि यह इस्लाम नहीं है, फिर भी विश्व भर में बसे मुसलमानों को इस विषय पर  आत्मनिरीक्षण करना चाहिए कि आखिर उनके सह-मजहबी एक नियमित अंतराल पर इस तरह की घिनौनी करतूतों को क्यों अंजाम दे रहे हैं। बांग्लादेश के सूचना मंत्री हसन-उल-हक ने ढाका में हुए हमले के लिए पाकिस्तान को कसूरवार ठहराया है। हो सकता है कि उनके आरोप सत्य हों, लेकिन इस आरोप के उनके पास पुख्ता सबूत होने चाहिए थे। अन्यथा उनकी यह आलोचना ढाका के इस्लामाबाद के प्रति विद्वेषपूर्ण दृष्टिकोण को ही दर्शाएगा। पहले पैरिस, फिर ब्रसेल्स और अब ढाका में आतंकी हमला, लेकिन हर बार संदेश एक और बिलकुल स्पष्ट है। यदि कोई इस बात को स्वीकार नहीं करता है कि इस्लाम ही खुदा के सबसे करीब का मजहब है, तो उन लोगों को जिंदा रहने का कोई हक नहीं है। इस बात में दो राय नहीं कि यह सोच सेकुलरिज्म और लोकतंत्र सरीखी विचारधाराओं पर भी अघात है, लेकिन यदि इस्लाम की शिक्षाओं को सही रूप में ग्रहण किया जाता है, तो वहां असहमतियों के लिए कोई स्थान शेष नहीं रह जाएगा। विश्व भर में फैले मदरसे इस्लामिक मतों को सिखाने के साथ कुरान को दिल से याद करना जरूरी बनाते हैं। लेकिन यह भी सच है कि विज्ञान या तकनीकी के लिए उनके वहां नाममात्र का स्थान ही बचता है।

संभवतया भारत एकमात्र ऐसा राष्ट्र है, जहां मदरसों में विज्ञान की शिक्षा को अनिवार्य बना दिया गया है। हालांकि मुल्ले और मौलवी कभी इससे खुश नहीं दिखे और दूरदराज के इलाकों में जहां संभव हुआ, उन्होंने मदरसों में विज्ञान की शिक्षा से किनारा कर लिया। हालांकि देश के पूर्व राष्ट्रपति डा. एपीजे अब्दुल कलाम और एक्यू खान सरीखे कुछ अपवाद भी देखने को मिले हैं। बृहद विश्व के समक्ष बेहतरीन उत्पाद पेश करके उन्होंने उत्कृष्ट दिमाग के मिसालें कायम की हैं, लेकिन जिस तरह के हथियार उन्होंने बनाए, वे जानलेवा व संहारक साबित हो सकते हैं। मुझे आज भी बिहार में जन्मे डा. एक्यू खान का लिया गया साक्षात्कार याद है। उन्होंने मुझे चेतावनी दी कि ‘यदि आपने कभी हमें किसी मुश्किल स्थिति में डालना चाहा’, जैसा कि पूर्वी पाकिस्तान के अलग होने के वक्त देखने को मिला था, तो ‘हम बम फोड़ देंगे’। वास्तव में मैंने पाकिस्तान में कई लोगों को कहते हुए सुना है कि वे पहले बमों का इस्तेमाल करके भारत को तबाह कर देंगे। मैंने खान की बात का जवाब देते हुए कहा, ‘आप उत्तरी भारत को तो तबाह कर सकते हो, लेकिन इसी के साथ पाकिस्तान का भी अंत होगा। भारत तब भी दक्षिण के संसाधनों का उपयोग करके भारत के पुनर्गठन करने में समर्थ होगा।’

यह देखने में बहुत अजीब लगता है कि उत्तरी कोरिया से लेकर ईरान तक को परमाणु तकनीकों को बड़ी कीमत पर बेचकर भी एक्यू खान पाकिस्तान में हीरो ही बने रहे। यह एक भयावह दृश्य है, लेकिन खान इस बात के लिए जिम्मेदार हैं कि उनके कारण इस्लामिक संसार में हर कहीं एक खतरनाक परमाणु बम की संभावना बन सकी। कल्पना करिए कि यदि यही बम आतंकवादियों के हाथ लग जाएं, तो इसकी कीमत पूरी दुनिया को चुकानी पड़ सकती है। ढाका के आलीशान गुलशन रेस्तरां, जो कि शहर से अलग राजनयिकों के लिए निश्चित किया गया स्थान है,  में आतंकियों ने अंधाधुंध फायरिंग करके कई लोगों की जान ले ली। मान लीजिए उनके पास ऐसे खतरनाक हथियार होते, तो उसका क्या परिणाम होता? इन हमले में जहां कुछ दर्जन लोग मारे गए, वहीं उस स्थिति में मृतकों का आंकड़ा सैकड़ों और हजारों में पहुंच जाता और हमले की लपटें सीमा तक पहुंचतीं।

दक्षिण एशियाई मुल्कों की सरकारों को अब इस हकीकत से वाकिफ होना होगा कि आतंकवाद को अब सीरिया या यमन के दूरदराज के इलाकों तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता। आईएसआईएस ने न केवल दुनिया के हर कोने में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाई है, बल्कि उसने अब अपने अभियान में स्थानीय लोगों का समर्थन जुटाना भी शुरू कर दिया है। दक्षिण एशियाई मुल्कों को अब इस विषय विशेष पर एक मंच पर आकर गहन मंथन के जरिए कुछ ठोस उपाए खोजने होंगे कि यह क्षेत्र परमाणु अभियान के दुरुपयोग का केंद्र न बने। इस दौरान इन देशों को मिलकर रुढि़वादी तत्त्वों के खिलाफ एक साझे अभियान का रोडमैप भी तैयार करना होगा। उदाहरण के तौर पर हैदराबाद के ओवैसी का जिक्र किया जा सकता है, जो मीडिया में प्रचार पाने के लिए कट्टर लोगों के लिए स्टैंड लेते रहे हैं। स्पष्ट तौर पर उनका यह रवैया गलत है, लेकिन मजहबी उन्माद में डूबे लोगों की नजर में उनके ये कदम भी सही हैं। मेरी यही इच्छा है कि आज वह मीडिया में जो प्रचार पा रहे हैं, उस पर रोक लगे, क्योंकि हर वक्त उनकी निगाहें इसी पर लगी रहती हैं कि उन्हें  मीडिया में कितना स्थान मिल रहा है। उस दौरान यह बात भी समझ में आती है कि मीडिया उनके उत्तेजक व जहरीले बयानों को भी नजरअंदाज नहीं कर सकती। यदि हम उपमहाद्वीप के इतिहास पर नजर दौड़ाएं, तो पाएंगे कि लाहौर स्थित दो समाचार पत्रों ने अलगाववाद के बीज बोने का काम किया है, जिनमें जमींदार मुस्लिमों और प्रताप हिंदुओं का प्रतिनिधित्व करता था। इन्होंने दोनों समुदायों को एक-दूसरे के प्रति भडक़ाकर उन्हें यह महसूस करवाने की कोशिश की कि वे दोनों अलग-अलग देशों से संबंध रखते हैं। मुझे आज भी याद है कि किस तरह से लाहौर स्थित लॉ कालेज में अलग होने की भावनाएं पैदा की गई थीं। इस दौरान रसोई घर को भी हिंदुओं और मुस्लिमों के लिए विभाजित कर दिया गया। हालांकि रसोई में विभाजन के बावजूद खाने की मेज पर हम हिंदू-मुस्लिम सभी साथ मिल-बैठकर ही खाते थे।

विभाजन की त्रासदी में हमने स्यालकोट में इस बात को अनुभव किया था कि किस तरह से वहां पुलिस ने लूटपाट और हत्याओं की घटनाओं पर अपनी आंखें मूद ली थीं, क्योंकि पूर्वी पंजाब में भी वैसा ही नजारा बना हुआ था। इस प्रक्रिया में हम एक-दूसरे समुदाय के करीब एक लाख लोगों के कातिल बन बैठे। आज तक उस नरसंहार के लिए किसी की भी जवाबदेही तय नहीं की जा सकी है और मैं व्यक्तिगत तौर पर मानता हूं कि भारत के गैर मुस्लिमों को उन अत्याचारों के लिए मुस्लिमों से माफी मांगनी चाहिए और पाकिस्तान के मुस्लिमों को भी वहां के हिंदुओं से क्षमा याचना करनी चाहिए। इतना करने से इतिहास के उन भयानक अनुभवों को सुधारा तो नहीं की जा सकता, लेकिन इसके जरिए उन जख्मों के भरने की शुरुआत जरूर हो जाएगी।

उस भयावह दौर से पैदा हुए उत्पादों की तब जनता भी निंदा करना शुरू कर देगी और न ही उन्हें वह समर्थन मिल पाएगा, जिसकी उन्हें जरूरत होती है। तब ढाका की घटना भय और अपमान के साथ याद की जाएगी।
-कुलदीप नैयर