हमें यह समझना चाहिए कि हमें भूकम्प नहीं, मारती है लापरवाही

  • 2015-10-29 08:00:32.0
  • अभिषेक कुमार
हमें यह समझना चाहिए कि हमें भूकम्प नहीं, मारती है लापरवाही

इस साल अप्रैल में नेपाल समेत भारत-तिब्बत में और अब अफगानिस्तान-पाकिस्तान के साथ-साथ हमारे देश को भी हिला कर रख देने वाले भूकम्प में एक करीबी समानता सिर्फ यह नहीं है कि इसके झटकों की तीव्रता रिक्टर पैमाने पर 7.5 या इससे ऊपर थी, बल्कि यह भी है कि इन सभी जगहों पर हुए आधे-अधूरे विकास और खराब निर्माण की वजह से ही लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ रही है। अफगान-पाक के ताजा भूकम्प का असर कश्मीर घाटी में भी हुआ है। वहां भी कच्ची नींवों पर खड़ी जर्जर इमारतें भूकम्प को सह नहीं पाईं और ढह गईं। भूकम्प के ये झटके एक बड़ी चेतावनी होने के साथ-साथ हमारे लिए एक सबक भी हैं।

सदियों से निर्माण की प्रक्रिया से गुजर रही पृथ्वी की भूगर्भीय संरचनाओं में चल रहे सतत परिवर्तन भूकम्प पैदा करते हैं। दुनिया के बहुत कम हिस्से ऐसे हैं जो भूकम्प से पूरी तरह निरापद कहे जा सकें। अनुमान है कि हर साल पृथ्वी पर करीब दस करोड़ भूकम्प आते हैं। इनमें से ज्यादातर यानी 98 फीसद समुद्रतल में आते हैं। दो से तीन फीसद भूकम्प जमीन पर आते हैं। इनमें से हमारा ज्यादा वास्ता हिमालय क्षेत्र में आने वाले भूकम्पों से पड़ता है। असल में, जमीन के भीतर भारतीय और यूरेशियाई प्लेटों की आपसी टकराहट ने पूरे हिमालयी क्षेत्र को भूकम्प की सर्वाधिक आशंका वाले इलाके में तब्दील कर रखा है।

काबुल से 256 किलोमीटर दूर हिंदूकुश पर्वतशृंखला ऐसे ही संवेदनशील इलाके में आती है जहां यह ताजा भूकम्प जमीन से करीब दो सौ किलोमीटर नीचे आया। ग्रेट ब्रिटेन ओपन यूनिवर्सिटी के भूगर्भवेत्ता प्रोफेसर डेविड रोथेरी का मत है कि भूकम्प जितनी तीव्रता का था, यदि वह जमीन के इतने भीतर न होकर थोड़ा ऊपर होता, तो और भारी विनाश कर सकता था। इसकी वजह यह है कि पूरे हिमालयी क्षेत्र में भूगर्भीय प्लेटों की टकराहट के कारण भारी मात्रा में ऊर्जा जमा हो गई है, जो बाहर निकलने का रास्ता खोज रही है।

भूगर्भ विज्ञानियों के मुताबिक ये प्लेटें प्रतिवर्ष चालीस-पचास मिलीमीटर तक एक दूसरे में टकराते हुए धंस रही हैं, इसी से यह ऊर्जा जमीन के अंदर जमा हुई है। भूगर्भवेत्ताओं के मुताबिक लाखों साल पहले भारतीय उपमहाद्वीप का विशाल भूखंड एशियाई भूभाग से आ भिड़ा था। इस भूगर्भीय घटना के कारण हिमालय का जन्म हुआ था और इसी कारण उपमहाद्वीप की नींव में मौजूद विशालकाय चट्टानों में लचक आ गई थी। इस लचक और आंतरिक चट्टानों पर पड़ते सतत दबाव के कारण हिमालय की पर्वतशृंखलाओं के निचले तलों में अचानक किसी भी वक्त खिसकन की आशंका जताई जाती रही है।

भूगर्भ विज्ञानी यह दावा करते हैं कि आंतरिक विचलनों के कारण मध्य हिमालय की भूगर्भीय संरचनाओं में दबाव पैदा हो गया है। वे यह भी कहते हैं कि हिमालयी क्षेत्र का भीतरी भूभाग तेरह सेंटीमीटर से ज्यादा का दबाव सहन नहीं कर सकता है। इसीलिए दबाव से पैदा होकर चट्टानों के बीच उत्पन्न हुई घनीभूत ऊर्जा धरती के भीतर से फूट कर बाहर निकलने को तैयार बैठी है। इसी कारण हिमालयी इलाकों में लगभग नौ की तीव्रता तक के भूकम्प की आशंका बनी रहती है।

ऐसा एक अध्ययन अमेरिका के कोलराडो विश्वविद्यालय के भूविज्ञानियों- रोजर विल्म, पीटर मोलनार- और बेंगलुरु स्थित इंडियन इंस्टीट्यूट फॉर एस्ट्रोफिजिक्स के विनोद गौड़ कर चुके हैं। इस टीम ने भी भारत, नेपाल, बांग्लादेश, भूटान और पाकिस्तान के हिमालयी क्षेत्र में तेज भूकम्प आने और करीब पांच करोड़ लोगों पर उसका असर पडऩे की घोषणा कर रखी है। विनाशकारी बारिश-बाढ़ का प्रकोप झेल चुके देश के पर्वतीय राज्य उत्तराखंड में बड़े भूकम्प की आशंका तो गृह मंत्रालय का आपदा प्रबंधन विभाग भी जता चुका है।

इस विभाग ने नेशनल जियोफिजिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिकों के तीन साल के अध्ययन का हवाला देकर कहा था कि उत्तराखंड की पहाडिय़ों पर काफी अलग-अलग ढंग की ढांचागत संरचनाएं मिली हैं जिनसे इस पूरे इलाके की जमीन के भीतर भारी मात्रा में ऊर्जा जमा होने की संभावना है। वर्षों से जमा यह ऊर्जा जब एक झटके में बाहर निकलने का प्रयास करेगी, तो उत्तराखंड समेत पूरे हिमालय क्षेत्र में भारी भूकम्प आ सकता है।

यह तो सही है कि अभी तक हुई वैज्ञानिक तरक्की भूकम्प, समुद्री तूफान, बाढ़, ज्वालामुखी विस्फोट आदि आपदाओं पर पूरी तरह लगाम नहीं लगा पाई है लेकिन सर्वाधिक गंभीर बात यह है कि अमीर-गरीब की खाई इन आपदाओं के वक्त और गहरी होकर नजर आती है। विकसित देश भले ही प्राकृतिक आपदाओं को न रोक पाएं या उनके आने के वक्त का सही-सही आकलन करने में समर्थ न हो पाए हों, पर इतना तो है कि भूकम्प जैसी त्रासदी से भी उनका कुछ विशेष नहीं बिगड़ता।

भारत, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, नेपाल की तरह बड़े भूकम्प जापान, अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया में भी आते हैं, लेकिन वहां ऐसे विनाश के समाचार नहीं मिलते हैं। जापान तो भूकम्प से सबसे ज्यादा पीडि़त देशों में है, लेकिन हादसों की बारम्बारता से सबक लेकर वहां न केवल मजबूत और भूकम्परोधी इन्फ्रास्ट्रक्चर खड़ा किया गया है, बल्कि समय-समय पर लोगों को कुदरती आपदाओं के वक्त किए जाने वाले उपायों की जानकारी भी असरदार तरीके से दी जाती है।

इसके बरक्स नेपाल-भारत-पाक जैसे देशों को देखें, तो यहां आज भी पुरानी जर्जर इमारतों में लाखों-करोड़ों लोग भूकम्प की परवाह किए बगैर रह रहे हैं। यही नहीं, नई बन रही इमारतों में भी आग व भूकम्प से बचाव के कायदों की सतत अनदेखी हो रही है। देश में शहरीकरण के नाम पर जैसा अनियोजित और अनियंत्रित विकास हो रहा है, वह एक गंभीर मर्ज बन चुका है। दिल्ली और उसके आसपास के राष्ट्रीय राजधानी परिक्षेत्र में तो ऐसी सैकड़ों बहुमंजिला इमारतें हैं, जिन्हें साधारण भूकम्प भी ढहा सकता है। यह भूलना नहीं चाहिए कि गुजरात के भुज क्षेत्र में रिक्टर पैमाने पर 7.9 की तीव्रता वाले भूकम्प ने उन इमारतों को भी ध्वस्त कर दिया था, जिन्हें बने तीन या चार साल ही हुए थे। सच्चाई यही है कि देश के तकरीबन हर शहर में ऐसी अनगिनत विशाल और ऊंची इमारतें सतत बन रही हैं, जिनकी भूकम्प सहने की क्षमता संदिग्ध है। यह उल्लेखनीय है कि भूकम्प की दृष्टि से संवेदनशील हिमालयी क्षेत्र का आशय सिर्फ उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर से नहीं है, बल्कि इसमें दिल्ली, उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे विशाल आबादी वाले उत्तर भारत के अनेक राज्य शामिल किए जा सकते हैं। दिल्ली और एनसीआर के इर्दगिर्द जमीन के नीचे जो फॉल्ट लाइंस मौजूद हैं, वे देश की राजधानी को भी संवेदनशील इलाके में ला देती हैं। हालांकि पिछले कुछ बरसों में हल्के भूकम्पों (रिक्टर पैमाने पर डेढ़ से दो की तीव्रता वाले) ने राजधानी दिल्ली की जमीन में गहरे जमा होती ऊर्जा को निकाल कर यहां बड़े भूकम्प की आशंका पर कुछ अंकुश लगाया है, तो भी विशेषज्ञ इसे बहुत बड़ी राहत नहीं मानते। हैरत की बात है कि हम आपदा प्रबंधन के नाम पर ऐसे संकटों से बचाव का कोई ठोस जतन करने के बजाय क्षति हो जाने के बाद की स्थितियों से जूझने में ही अधिक दिलचस्पी दिखाते हैं। हमारे यहां भूकम्प से बचाव की तैयारियों का आलम यह है कि गुजरात और उत्तरकाशी जैसे अनुभव के बाद भी भूकम्प से पूर्णतया सुरक्षित इमारतों के निर्माण की ठोस पहल सिरे से नदारद है। यही आलम आपदाओं से खुद बचाव के वास्ते शिक्षण और भविष्यवाणी का ठोस मैकेनिज्म बनाने में नजर आता है।

कहने को 1992 में केंद्र सरकार ने नौ करोड़ रुपए खर्च करके प्राकृतिक आपदा प्रबंधन कार्यक्रम की शुरुआत भी कर दी थी और इसके तहत हर साल दर्जनों आयोजन करके व्यापक स्तर पर जन-जागरूकता का कार्यक्रम चलाया जाता है। पर अब तक का हासिल यह है कि कुछ ही राज्यों ने भूकम्प जैसी आपदा से निपटने की चंद तैयारियां की हैं। किसी बड़े भूकम्प के बाद सरकार की ओर से जानकारी देने वाले विज्ञापन प्रकाशित करवा कर कर्तव्य की इतिश्री कर ली जाती है।

यही हाल भूकम्प की पूर्व सूचना का है। यों कहा जाता है कि इस मामले में देश-विदेश के वैज्ञानिक हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठे हैं। वे कई विधियों से धरती के अंदर चल रही हलचलों की टोह लेने की कोशिश करते हैं। सीस्मोलॉजिस्ट यानी भूकम्पवेत्ता धरती की भीतरी चट्टानों की चाल, अंदरूनी फाल्ट लाइनों की बढ़वार और ज्वालामुखियों से निकल रही गैसों के दबाव पर नजर रख कर पूवार्नुमान लगाने का प्रयास कर रहे हैं। जापान और कैलिफोर्निया में जमीन के अंदर चट्टानों में ऐसे सेंसर लगाए गए हैं जो बड़ा भूकम्प आने से तीस सेकेंड पहले इसकी चेतावनी जारी कर देते हैं। दावा है कि मौसम संबंधी उपग्रहों से मिले चित्रों के आधार पर साल की शुरुआत में नेपाल के बड़े भूभाग से रेडॉन गैसों की बड़ी मात्रा निकलने की बात कही गई थी, पर इन सूचनाओं का विश्लेषण कर भूकम्प की चेतावनी जारी नहीं की जा सकी।