हमारा नागरिक पराभव

  • 2016-03-14 12:38:55.0
  • शैलेन्द्र चौहान

सामाजिक दायित्व के निर्वहन के प्रति हमारा समाज पूर्णत: उदासीन ही नहीं बल्कि असंवेदनशील भी है। इसमें हमारी राजनीतिक मंशा भी मददगार होती है। यह बेहद दुख की बात है कि भारत में स्वतंत्रता का अर्थ हो गया है अराजकता और उच्छृंखलता। क्या इसका संज्ञान प्रशासन और राज्य को नहीं लेना चाहिए? जब वोट ही सब कुछ निर्धारित करता है तो बाकी बातों पर ध्यान कौन दे। नागरिक जीवन की गुणवत्ता की बात चलते ही हमें गरीबी दिखने लगती है, आबादी का घनत्व दिखने लगता है। तब हम अपने पड़ोसी चीन को नहीं देखते। वहां की आबादी हमसे ज्यादा है, फिर भी वह हमसे अधिक विकसित देश है और वहां का जीवन-स्तर हमसे कई गुना बेहतर है। जबकि आजादी के समय वह हमसे ज्यादा गरीब था। हमारे देश में जन-परक सोच कतई नहीं है। सब कुछ नेताओं के स्वार्थों से नियोजित और संचालित होता है।

गौरतलब है कि अनियोजित शहरीकरण और औद्योगीकरण से भारत की वायु गुणवत्ता में अत्यधिक कमी आई है। विश्व भर में तीस लाख मौतें, घर और बाहर के वायु प्रदूषण से प्रतिवर्ष होती हैं, इनमें से सबसे ज्यादा भारत में होती हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार भारत की राजधानी दिल्ली, विश्व के दस सर्वाधिक प्रदूषित शहरों में एक है। सर्वेक्षण बताते हैं कि वायु प्रदूषण से देश में, प्रतिवर्ष होने वाली मौतों के औसत से, दिल्ली में बारह प्रतिशत अधिक मृत्यु होती है। दिल्ली ने वायु प्रदूषण के मामले में चीन की राजधानी बेजिंग को काफी पीछे छोड़ दिया है। येल विश्वविद्यालय के अध्ययन के मुताबिक, 2.5 माइक्रान व्यास से छोटे कण मनुष्यों के फेफड़ों और रक्त ऊतकों में आसानी से जमा हो जाते हैं, जिसके कारण हृदयाघात से लेकर फेफड़ों का कैंसर तक होने का खतरा होता है।

नागरिक पराभव

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, प्रतिदिन 25 माइक्रोग्राम कण प्रति घन मीटर तक की मात्रा स्वास्थ्य के लिए घातक नहीं है। लेकिन पिछले वर्ष जनवरी के पहले तीन सप्ताह में नई दिल्ली के पंजाबी बाग में प्रदूषण की औसत रीडिंग 473 पीएम-25 थी, जबकि बेजिंग में यह 227 थी। हालांकि दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड का कहना है कि मौजूदा वायु प्रदूषण के पीछे मौसम प्रमुख कारण है और सालाना औसत के लिहाज से दिल्ली अब भी बेजिंग से पीछे है। लेकिन ताजा ‘एनवॉयरमेंट परफार्मेंस इंडेक्स’ (ईपीआई) में 178 देशों में भारत का स्थान 32 अंक गिर कर 155वां हो गया है। वायु प्रदूषण के मामले में भारत की स्थिति ब्रिक्स देशों (चीन, ब्राजील, रूस और दक्षिण अफ्रीका) में सबसे खस्ताहाल है।

सूचकांक में सबसे ऊपर स्विट्जरलैंड है। प्रदूषण के मामले में भारत की अपेक्षा पाकिस्तान, नेपाल, श्रीलंका और चीन की स्थिति बेहतर है, जिनका इस सूचकांक में स्थान क्रमश: 148वां, 139वां, 69वां और 118वां है। इस सूचकांक को नौ कारकों- स्वास्थ्य पर प्रभाव, वायु प्रदूषण, पेयजल एवं स्वच्छता, जल संसाधन, कृषि, मछली पालन, जंगल, जैव विविधता, जलवायु परिवर्तन और ऊर्जा- के आधार पर तैयार किया गया है। दिल्ली पीएम-25 प्रदूषण के मामले में बेजिंग को लगातार पीछे छोड़ती जा रही है। गाडिय़ों की भारी संख्या और औद्योगिक उत्सर्जन से हवा में पीएम-25 कणों की बढ़ती मात्रा घने धुंध का कारण बन रही है।

पिछले कुछ सालों से दिल्ली में धुंध की समस्या बढ़ती ही जा रही है। इसके बावजूद, जहां बेजिंग में धुंध सुर्खियों में छाई रहती है और सरकार को एहतियात बरतने की चेतावनी तक जारी करनी पड़ती है, वहीं दिल्ली में इसे नजरअंदाज कर दिया जाता है। हार्वर्ड इंटरनेशनल रिव्यू के मुताबिक पांच में हर दो दिल्लीवासी श्वसन संबंधी बीमारी से ग्रस्त हैं। लैंसेट ग्लोबल हेल्थ बर्डन 2013 के अनुसार, ‘भारत में वायु प्रदूषण स्वास्थ्य के लिए छठा सबसे घातक कारण बन चुका है।’

भारत में श्वसन संबंधी बीमारियों के कारण होने वाली मौतों की दर दुनिया में सबसे ज्यादा है। यहां दमा से होने वाली मौतों की संख्या किसी भी अन्य देश से ज्यादा है। वायु प्रदूषण के साथ ही जल प्रदूषण के मामले में भी भारत की स्थिति गंभीर है। जल प्रदूषण के कई स्रोत हैं। सबसे अधिक प्रदूषण शहरों की नालियों तथा उद्योगों के कचरे से, नदियों में प्रवाह से फैलता है। फिलहाल इसमें से केवल सोलह प्रतिशत को ही शोधित किया जाता है और यही नदियों का जल अंतत: हमारे घरों में पीने के लिए भेज दिया जाता है, जो कि अत्यधिक दूषित तथा बीमारी उत्पन्न करने वाले जीवाणुओं से भरा होता है। खेतों से निकलने वाले कूड़े-कचरे को भी, नदियों में डाल दिया जाता है। खतरनाक रसायन तथा कीटनाशक पानी में पहुंच जाते हैं।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के एक आंकड़े के मुताबिक, भारत में लगभग 9.7 करोड़ लोगों को पीने का साफ पानी मयस्सर नहीं होता। यह आंकड़ा महज शहरी आबादी का है। ग्रामीण इलाकों की बात करें तो वहां सत्तर फीसद लोग अब भी प्रदूषित पानी पीने को मजबूर हैं। एक मोटे अनुमान के मुताबिक, पीने के पानी की कमी के चलते देश में हर साल लगभग छह लाख लोग पेट और संक्रमण की विभिन्न बीमारियों की चपेट में आकर दम तोड़ देते हैं। अब जब 2028 तक आबादी के मामले में चीन को पछाड़ कर भारत के पहले स्थान पर पहुंचने की बात कही जा रही है, यह समस्या और भयावह हो सकती है। एक ओर तो गांवों में साफ पानी नहीं मिलता, और दूसरी ओर, महानगरों में वितरण की खामियों के चलते रोजाना लाखों गैलन साफ पानी बर्बाद हो जाता है।

पानी की इस लगातार गंभीर होती समस्या की मुख्य रूप से तीन वजहें हैं। पहला कारण है, आबादी का लगातार बढ़ता दबाव, इससे प्रतिव्यक्ति साफ पानी की उपलब्धता घट रही है। फिलहाल देश में प्रतिव्यक्ति एक हजार घनमीटर पानी उपलब्ध है जो वर्ष 1951 में तीन-चार हजार घनमीटर था। सत्रह सौ घनमीटर प्रतिव्यक्तिसे कम उपलब्धता को संकट माना जाता है। अमेरिका में यह आंकड़ा प्रतिव्यक्तिआठ हजार घनमीटर है। इसके अलावा जो पानी उपलब्ध है उसकी गुणवत्ता भी बेहद खराब है। अब यह गर्व की बात तो नहीं हो सकती कि नदियों का देश होने के बावजूद अधिकतर नदियों का पानी पीने लायक नहीं है और कई जगह तो नहाने लायक तक नहीं है। वहीं रासायनिक प्रदूषण को पूरे देश में तेजी से अनुभव किया जा रहा है। यह पाया गया है कि गैर-औद्योगिक क्षेत्रों की तुलना में, औद्योगिक क्षेत्रों में तरह-तरह के कैंसर, विभिन्न त्वचा की बीमारियां, जन्मजात विकृतियां, आनुवंशिक असमानता भी लगातार बढ़ रही है। स्वाभाविक सांस लेने की, पाचन की, रक्त बहाव की, संक्रामक आदि बीमारियों में चौगुना बढ़ोतरी हुई है।

पृथ्वी के सभी जीवों की रक्षा करना हमारा कर्तव्य है। साथ ही वन्य व समुद्री जीवों की रक्षा भी आवश्यक है ताकि पृथ्वी की जीवनदायिनी शक्तियों की रक्षा हो सके। पशुओं की समाप्त हो चुकी प्रजातियों के अवशेषों की खोज को हमें बढ़ावा देना है। प्राकृतिक प्रजातियों तथा वातावरण को नुकसान पहुंचाने वाले कृत्रिम परिवर्तन और कृत्रिम प्रजातियों के विकास पर रोक लगनी चाहिए। जल, मिट्टी, वन्य संपदा, समुद्री प्राणी ये सब ऐसे संसाधन हैं जिन्हें आवश्यकतानुसार प्रयोग में लाया जा सकता है। फिर भी इन्हें सोच-समझ कर प्रयोग में लाया जाना चाहिए जिससे न तो ये नष्ट हों और न ही पर्यावरण को कोई नुकसान पहुंचे। हमें खनिज पदार्थों तथा खनिज तेल का उत्पादन भी सोच-समझ कर करना होगा। ये पदार्थ धरती के अंदर सीमित मात्रा में हैं और इनका समाप्त होना मानव जाति के लिए खतरनाक है। हमारा कर्तव्य है कि हम मिट््टी की उर्वरा-शक्तिकी रक्षा करें और पृथ्वी की सुंदरता को बनाए रखें।

वैज्ञानिक पद्धतियों की जानकारी न होने के बावजूद पर्यावरण को बचाना बहुत आवश्यक है। यदि आपका कार्य पर्यावरण के लिए हानिकारक नहीं है तो इसके लिए आपके पास ठोस सबूत होने चाहिए और यदि आप द्वारा किया जा रहे कार्य ने पर्यावरण को नुकसान पहुंचाया तो इसकी जिम्मेवारी आपकी होगी। हमें इस बात का भी ध्यान रखना होगा कि हमारे द्वारा लिये गए निर्णयों का संबंध मनुष्य द्वारा किए गए कार्यों से हो। इन निर्णयों का प्रभाव लंबे समय के लिए लाभकारी होना चाहिए।
-शैलेंद्र चौहान

शैलेन्द्र चौहान ( 10 )

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