‘गुरूकुल लाओ-देश बचाओ’ मेरे जीवन का उद्देश्य : योगी युक्तानंद

  • 2016-03-13 09:30:01.0
  • श्रीनिवास आर्य

‘शक्ति निकेतन रिसर्च फाउण्डेशन’ के संस्थापक अध्यक्ष श्री शिव योगी युक्तानंद जी महाराज देश की संस्कृति और धर्म को लेकर विशेष रूप से चिंतित हैं। इसलिए उनका चिंतन देश निर्माण और धर्म रक्षा पर है। इसके लिए वह एक अभियान पर निकले हैं। इस अभियान को उन्होंने अपना जीवन-व्रत घोषित कर दिया है और उसे नाम दिया है-‘गुरूकुल लाओ देश बचाओ’। पिछले दिनों हमारी महाराज श्री से भेंट हुई तो बातचीत का क्रम यूं चल पड़ा :-

उगता भारत : महाराज श्री कर्मफल व्यवस्था के विषय में आपका क्या कहना है?

महाराजश्री : देखिए! कर्म करने के पीछे कोई न कोई भाव अवश्य होता है। यदि इस दृष्टिकोण से देखा जाए तो कर्म तीन भावों से किये जाते हैं-सात्विकी, राजसी, तामसी। भारतीय संस्कृति की यह मान्यता है कि जो व्यक्ति जैसे भाव से कर्म करेगा, उसे वैसा ही फल मिलेगा।  जैसे तप करने वाले को तपस्वी कहा जाता है, सतोगुणी भाव से तप करने वाला ऋषि-मुनि का जन्म ग्रहण करता है। तप पूर्ण होने पर वह योगी कहलाता है और यही वह अवस्था है-जब ऐसे योगी का परमपिता-परमात्मा से मिलन हो जाता है। ऐसा योगी जीवन-मुक्त हो जाता है। उसे ही मुक्त हो जाने के कारण वास्तविक स्वतंत्रता की अनुभूति होती है, शेष सभी मनुष्य गुलामी का अर्थात कर्मबंधन के पाशों में बंधे होने का जीवन व्यतीत करते हैं।

उगता भारत : यह तो आपने सतोगुणी भाव से किये गये कर्मों के विषय में बताया है। रजोगुणी और तमोगुणी भाव से जो कर्म किये जाते हैं उनके विषय में भी कुछ प्रकाश डालें।

महाराज श्री : रजोगुणी भाव से किये गये कर्मों का फल उच्च कुल में उत्पन्न होने से मिलता है। जहां व्यक्ति जीवन भर राजकीय सुख-ऐश्वर्य संपन्न जीवन व्यतीत करता है। रजोगुणी में उच्च घर राजा का ही माना जाता है। किंतु यदि कोई व्यक्ति तमोगुणी भाव से तप करे तो वह वन का राजा शेर बन जाता है। उसका भाव या जीवन का कुल सार क्रूरता का रहता है, इसलिए वह क्रूर योनि अर्थात शेर जैसी योनि को प्राप्त करता है। स्पष्ट है कि इस जीवन-जगत में यदि कोई उच्च पद प्राप्त करता है तो उसमें उसके पूर्व जन्मों के संस्कारों का प्रबल योग है। तप के पीछे की भावना हमारी प्रार्थना को शब्द देती है और वे शब्द हमारे हृदय की कामना बनकर हमारे अंत:करण पर अंकित हो जाते हैं, जिनसे अगली योनियों का क्रम निर्धारण करने में सुविधा हो जाती है।

उगता भारत : तो क्या पिछले कर्मों के आधार पर ही यह जीवन-जगत व्यापार चल रहा है?

महाराजश्री : यदि ऐसा कहा जाएगा या इसे ही सर्वांशत: सत्य मान लिया जाएगा तो भी मनुष्य में अकर्मण्यता का भाव उत्पन्न हो जाएगा। मनुष्य की इस जन्म की उन्नति या अवन्नति में उसके पूर्व जन्मों के संस्कार निश्चित रूप से सहयोगी होते हैं, परंतु जब तक उसके वर्तमान जन्म में उन संस्कारों की पुष्टि ना हो, तब तक वे पूर्व के संस्कार उसके उत्थान या पतन के लिए पर्याप्त कदापि नही हो सकते। ‘कर्म प्रधान विश्व रचि राखा’ का भाव भी यही है और वेद के उस मंत्र का भाव भी यही है जिसमें वेद हमें बताता है कि मेरे एक हाथ में कर्म है तो दूसरे में विजय है। भाव यही है कि कर्मशील रहते और हुए वेद की आज्ञा का पालन करते हुए हम सौ वर्ष पर्यन्त जीवन जियें।

उगता भारत : महाराज श्री भक्ति कब सफल होती है?

महाराजश्री  : भक्ति से श्रद्घा का मिलन अनिवार्य है। भक्ति और श्रद्घा मिलकर व्यक्ति को योगी बनाती हैं, और योगी पर अपने प्रियतम की ऐसी दीवानगी बिखेरती हैं कि उसके रोम-रोम से उसकी सुगंधि आने लगती है। उसी दीवानगी को आप मीरा की भक्ति में देख सकते हैं, उसी को आप हमारे कितने ही प्राचीन ऋषियों की जीवन शैली में देख सकते हैं।

जब तक व्यक्ति ‘पागल’ नही होगा तब तक वह किसी भी लक्ष्य को प्राप्त नही कर सकता। पागल का अर्थ है-अपने लक्ष्य के प्रति पूर्ण समर्पण, पूर्ण श्रद्घा, पूर्णनिष्ठा। ऐसा समर्पण कि उसे अपने लक्ष्य के अतिरिक्त कुछ दिखाई देना बंद हो जाए और वह अर्जुन की भांति कह उठे कि-‘गुरूदेव! (द्रोणाचार्य) मुझे अपने लक्ष्य के अतिरिक्त कुछ भी नही दिखाई दे रहा।’ तब सफल होती है भक्ति और तभी सफल होता है यह जीवन।

योगी युक्तानंद

उगता भारत : भारत को आप उसके अतीत के दिव्य प्रकाश की ओर मोडऩा चाहते हैं-जहां से वह अपनी जीवन बैट्री को पुन: चार्ज करे और पूर्ण ऊर्जान्वित होकर अपने गंतव्य की ओर बढ़े-उसके लिए आपकी योजना क्या है?

महाराजश्री : भारत का अभिप्राय ही आभा अर्थात ज्ञान की दीप्ति में रत से है। भारत स्वयं में ज्ञान का उपासक है, यह एक शब्द मात्र नही है, यह तो अपने आप में ही एक धर्म है-एक संस्कृति है, एक लक्ष्य है, एक इतिहास है और एक प्रकाश स्तंभ है। भारत का स्मरण करने मात्र से इसके ऋषियों के ज्ञान विज्ञान की एक लंबी कड़ी हमारी चेतना में प्रकाश करने लगती है। इसका जप हमें मर्यादित आचरण सिखाकर धर्म के आदि स्रोत से जोड़ देता है और इसके ध्यान से हमारी वह संस्कृति जीवंत हो उठती है जहां एक भाई अपने भाई की खड़ाऊंओं को ही भाई की प्रतिनिधि मानकर राज्य करने लगता है।

इस भारत शब्द में अनंत ऊर्जा का स्रोत है, जो निष्प्राण संसार में प्राणों का संचार करने की सामथ्र्य रखता है।

इसे इसके प्राचीन दिव्य स्वरूप से जोडऩे की आवश्यकता है। इसे इसका शूरत्व बोध कराने की आवश्यकता है, इसकी दिव्य शक्तियों का इसे जिस बोध हो जाएगा उस दिन सारा विश्व इसका अनुगामी और अनुचर हो जाएगा। अपने इस लक्ष्य को हम ‘गुरूकुल लाओ-देश बचाओ’ की अपनी योजना के माध्यम से पूर्ण करना चाहते हैं।

उगता भारत : अपनी इस योजना को आप लागू करना चाहते हैं यह तो अच्छी बात है पर इसके लिए साधन कैसे बनेंगे?

महाराजश्री  : देखिए! साधन के साथ साधना उसी प्रकार आवश्यक है जिस प्रकार धन के साथ धर्म का समन्वय आवश्यक है। धन धर्म के बिना हमें निधन की ओर ले जाता है और साधन साधना के बिना हमें लक्ष्य से भटका देता है। हमारे लिए साधना हमारा संकल्प हो और साधन इस देश की वह चेतना मानी जाऐ जो अपने इस पावन देश को ‘विश्वगुरू’ के पवित्र व उच्च स्थान पर विराजमान हुए देखना चाहती है तो हमारा संकल्प निश्चित ही एक दिन क्रियान्वित होगा। सारा देश आज मचल रहा है, उसे लग रहा है कि ऊपर और ऊंचा उठने का समय आ चुका है, यदि समय को नही पहचाना गया तो देर हो जाएगी, मुहूर्त निकला जा रहा है अब विलंब की कतई आवश्यकता नही। मेरे लिए अपने देशवासियों की यह मचलन और उनके हृदय की तीव्र इच्छा ही वह अवलंब है जो हमें अपने लक्ष्य से मिलाएगी और हमें विश्वास है कि-‘हम होंगे कामयाब एक दिन...।’

हमारा कारवां चल चुका है। जिसमें देश के लोगों का भरपूर सहयोग मिल रहा है, लोग आगे आ रहे हैं और कुछ करना चाहते हैं हमें केवल उन्हें सही दिशा देनी है। गुरूकुलों से हम चाहेंगे कि वहां से प्रतिदिन वेद का गीत-संगीत निकले। प्रतिदिन यज्ञ हों, बड़ी-बड़ी गहन चर्चाएं हों और लोग अपने गौरवमयी अतीत से प्रेरणा लेकर अपने वर्तमान को संभालते हुए भविष्य को संवारने के एक महारास के रसिक बन जाएं। मेरी यह साधना जिस दिन पूर्ण हो जाएगी। उसी दिन हमारा भारत महानता का एक नया गीत लिखने में सफल हो जाएगा।
श्रीनिवास आर्य/एलएस तिवारी