गुरू नानकदेव की राष्ट्रीय दृष्टि

  • 2015-10-25 08:15:26.0
  • प्रो. राजेन्द्र सिंह

मध्यकालीन भारत के माननीय संत महात्माओं और सिद्घों की श्रेणी में गुरू नानकदेव कदाचित अकेले ऐसी विभूति हैं जिन्होंने इस सर्वप्राचीन राष्ट्र को सांस्कृतिक और राजनैतिक इकाई के रूप में एक देखा, जाना, परखा, समझा और माना। यह उल्लेखनीय है कि आदि श्री गुरू ग्रंथ साहिब जी (श्री आदि ग्रंथ) में 30 से अधिक जिन महानुभाव रचनाकारों की वाणी संकलित है, उनमें से केवल गुरू नानकदेव ने अपनी कालजयी वाणी में दो बार हिंदुस्तान शब्द का प्रयोग राजनैतिक इकाई के रूप में किया है। इस ऐतिहासिक प्रयोग की पृष्ठभूमि को बड़ी गहराई से समझने की आवश्यकता है।
गौ भारतीय संस्कृति का मूल आदर्श है
गौ भारतवर्ष की सांस्कृतिक, राजनैतिक और आर्थिक चेतना का मूल आदर्श और स्रोत है। इसके तीन प्रमुख रूप हैं : वेदवाणी, पृथ्वी और धेनु। राजधर्म के अनुसार इन तीनों की विशेष रूप से रक्षा करना राजा का और सामान्य रूप से रक्षा करना क्रमश: ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य का वर्णानुरूप परम कत्र्तव्य है। किंतु काल के विपर्यय से भारतवर्ष में मुसलमान आक्रांताओं के प्रवेश से उनके द्वारा लादे गये इस्लामी शासनकाल में गो के इन तीनों ही प्रमुख रूपों की शक्ति दिन अनुदिन क्षीण होती जा रही थी। यह प्रत्येक राष्ट्रभक्त भारतीय के लिए गहन चिंता का विषय था। ऐसी विकट परिस्थितियों में श्री नानकदेव ने कार्तिक पूर्णिमा 1526 विक्रमी को भारतभूमि पर अवतरित होने के बाद समय पाकर गौ के तीनों प्रमुख रूपों का उन्नयन किया। इस ऐतिहासिक उन्नयन कार्य से जुड़े तथ्य यहां प्रस्तुत किये जाते हैं :
गुरू नानक द्वारा वेदवाणी का उन्नयन
कवि और इतिहासकार ज्ञानी ज्ञानसिंह अपनी सुप्रसिद्घ रचना श्री गुरू पंथ प्रकाश (1936 विक्रमी) में गुरू नानकदेव के अवतरण के संदर्भ में लिखते हैं :
‘‘सैयद, शेख, मुगल और पठान जाति के मुस्लिम आक्रांता अपने-अपने मुस्लिम देश छोड़-छोडक़र हिंदुस्तान में आ धमकते रहे। जो भी आवे वही लूटे और मारे। सबने हिंदुओं को अधिकाधिक पीडि़त किया। इस प्रकार उन आक्रांताओं ने चार पांच साल तक हिंदुओं को बड़े-बड़े दुख दिये। इस प्रकार भारत की सारी धरा धर्मविहीन हो गयी। यवनों-मुसलमानों ने कोई धर्म ही नही छोड़ा। जब यह अवरोध अधिक बढ़ गया, तब जगत के स्वामी ईश्वर ने सोच विचार किया। फिर सनातन नीति-राजधर्म के पालन और वैदिक धर्म के विस्तार हेतु प्रभु स्वयं गुरू नानक के रूप में भारतभूमि में अवतरित हुए (श्री गुरू पंथ प्रकाश 3/101-102, 110-111)।
गुरू गोविन्द सिंह के दीवान भाई मनीसिंह (1701-1719 विक्रमी) बताते हैं कि अवतरित होने के बाद 5 वर्ष की अवस्था वाले श्री नानक को जब उनके पिताश्री कालू तलवण्डीवासी उपाध्याय पंडित ब्रजनाथ के पास विद्या प्राप्ति हेतु ले गये तो शिष्य की ज्ञानभरी आध्यात्मिक बातें सुन कर उन्होंने कहा : ‘हे कालू! चारों वेदों की विद्या जगत में लुप्त हो रही थी। सो अब तेरा पुत्र चारों वेदों के प्रकाश रूप में वास्तव में प्रकट हुआ है’’ (पोथी जनमसाखी : गिआन रतनावली, पत्थरछापा संस्करण 1947 विक्रमी पृष्ठ 60)।
इसी प्रकार पोथी जनमसाखी वाले जी की के अनुसार भी उपाध्याय पंडित ब्रजनाथ ने कालू के प्रति कहा : ‘हे कालू! चारों वेदों की विद्या जगत में लुुप्त हो रही थी। तेरा पुत्र चारों वेदों को प्रकाशित करने के वास्ते प्रकट हुआ है’ (पोथी जनम साखी भाई बाले जी की, मतबा आफताबे पंजाब, लाहौर, पत्थरछापा संस्करण, चैत्र 1947 विक्रमी पष्ठ 23)
उपरोक्त सारे कथन की पुष्टि कालांतर में स्वयं गुरू नानकदेव ने की। जब वे भाई मरदाना खाबी के पास पश्चिम देशों की यात्रा (1574-1577 विक्रमी) करते हुए मक्का और मदीना में एक वर्ष से अधिक काल तक वहां होने वाले शास्त्रार्थ में विजयी होकर बगदाद (इराक) पहुंचे तो वहां पर पीर मुहीयुद्दीन के प्रश्न का उत्तर देते हुए उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा : ‘‘जगत में हिंदू वेद के धर्म से रह गये थे इसलिए हम वेदों के धर्म की हयाती के वास्ते आये हैं’’ (पोथी जनमसाखी : गिआन रतनावली, चिरागुद्दीन सिराजुद्दीन मुस्तफाई छापाखाना, लाहौर पत्थरछापा संस्करण, 1947 विक्रमी पृष्ठ 429-430)।
पश्चिमी देशों की यात्रा से ठीक पहले गुरू नानकदेव भारतवर्ष के पूर्वी, दक्षिणी और उत्तरी क्षेत्रों की तीर्थयात्रा कर चुके थे जहां उन्होंने क्रमश: तीन, पांच और एक (कुल 9) वर्ष वैशाख 1564 विक्रमी से लेकर 1573 विक्रमी के अंत तक व्यतीत किये थे। उत्तरी भारत के तीर्थयात्राकाल (चैत्र-फाल्गुन 1573 विक्रमी) में जब गुरू नानकदेव सुल्तानपुर से चलकर बिलासपुर, मंडी, कांगड़ा, बैजनाथ और मलाना इत्यादि स्थानों से होते हुए सुमेर कैलाश पहुंचे तो वहां पर नाथपंथी सिद्घों के साथ ज्ञानचर्चा करते समय उन्होंने वेदों के प्रति अपनी चिंता इन शब्दों में व्यक्त की ।
‘‘वेद शास्त्र जो कहता है कि कोई नही करता। सब में ऐसी प्रवृत्ति व्याप रही है कि जो कुछ अपना मन कहे वही करना, शास्त्र कहे वह न करना, मन की ही कही हुई मनमानी ही पूजा करनी और मनमाना ही कर्म करना। जो कुछ शास्त्र कहे उसे भारतवासी नही करते। उन्होंने तुर्कीभाषा पढ़-पढक़र तुर्क मंत्र कलमा और मुसलमानी मान्यताओं पर कान धर कर हृदय में बसाना प्रारंभ कर दिया है। कलिकाल में क्षत्रिय और ब्राह्मण लगे तुर्कभाषा पढऩे। जिन क्षत्रिय ब्राह्मणों को तुर्कभाषा पढऩे का आदेश नही था, वे तुर्कभाषा पढ़-पढक़र मुसलमानों की मुखबिरी करने लगे और दूसरों का बुरा सोचने लगे। कहने लगे कि मैं ही सच्चा हूं। हिंदूधर्म का तो तब ही लोप हो गया जब दूसरों का बुरा सोचा और तुर्क भाषा पढ़ी (मनोहरदास मेहरबान कृत सचखण्ड पोथी: जनमसाखी जनमसाखी श्री गुरू नानक देव जी, मूल रचना 1669 विक्रमी, कृपालसिंह-शमशेरसिंह द्वारा संपादित खालसा कालेज अमृतसर 1962 ईसवी पृष्ठ 387-388)।
वस्तुत: गुरू नानकदेव इस बात से पूर्णत: परिचित थे, कि भारतवर्ष की सांस्कृतिक चेतना का मूल स्रोत वेद है। इसलिए उपरोक्त प्रकार से कष्ट में पड़ा यह राष्ट जब तक वेद के बताये मार्ग पर नही चलेगा, तब तक इसका कल्याण संभव नही। ऐसा समझकर उन्होंने स्पष्ट घोषणा की कि चारों वेद सत्य हैं तथा उन्हें पढऩे-गुणने से सुंदर विचार प्राप्त ज्ञात होते हैं-
चार वेद होए सचिआर।
पड़ाहि गुणाहि तिन्ह चार विचार।।
श्रीआदि ग्रंथ आसा महला 1, पृष्ठ 470।

क्रमश: