ग्लोबल वार्मिंग बनता जा रहा है विकट समस्या

  • 2016-03-10 09:30:45.0
  • सीमा जावेद

इस सदी में कार्बन उत्सर्जन के अनुमानित खतरों में से सबसे भीषण समुद्र के जल-स्तर में बढ़ोतरी का है। ग्लोबल वार्मिंग की वजह से वर्ष 1880 तक समुद्री जल-स्तर में करीब आठ इंच तक की बढ़ोतरी हो चुकी थी, और जल-स्तर में वृद्धि की दर लगातार चढ़ रही है। समुद्र के जल-स्तर में लगातार चढ़ाव भारत जैसे देश के लिए बहुत संकट भरा हो सकता है, जो तीन तरफ से समुद्र से घिरा है। चीन, जापान, बांग्लादेश, विएतनाम, इंडोनेशिया, हांगकांग, आयरलैंड, नीदरलैंड, ब्राजील, डेनमार्क, जर्मनी, फ्रांस, मलेशिया, संयुक्त अरब अमीरात, ताइवान, फिलीपींस व भारत समेत बीस देश चढ़ते समुद्र के खतरों का सामना कर रहे हैं। अगर यही हाल रहा तो एक दिन मॉरीशस, लक्षद्वीप, अंडमान द्वीपसमूह, श्रीलंका और बांग्लादेश का अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा। सबसे ज्यादा आबादी वाले वैश्विक तटीय महानगरों में शंघाई, हांगकांग, कोलकाता, मुंबई, चेन्नई, ढाका, जकार्ता तथा हनोई शामिल हैं।
ग्लोबल वार्मिंग


एशिया के बाहर अमेरिका ऐसा देश है जो समुद्र के चढ़ते जल-स्तर के सबसे गहरे खतरों के साये में है, जहां मोटे तौर पर ढाई करोड़ लोग प्रभावित क्षेत्र में रहते हैं। समुद्र-स्तर में वृद्धि से सबसे अधिक चीन प्रभावित होगा। इस समय उसके 14.50 करोड़ नागरिक जलमग्न होने की आशंका वाले इलाकों में रह रहे हैं। उसके बाद दूसरा नंबर भारत का है । भारत की करीब पच्चीस प्रतिशत आबादी तटीय इलाकों में रहती है। ऐसे में ग्लोबल वार्मिंग महज एक वैज्ञानिक कारक से कहीं ज्यादा जीवन-मरण का सवाल है। भारत में करीब 6 करोड़ 30 लाख लोग तटीय क्षेत्रों के पचास किलोमीटर के दायरे में रहते हैं। इन क्षेत्रों को ‘कम ऊंचाई वाले तटीय जोन’ की श्रेणी में रखा गया है। इसमें ऐसे तटीय क्षेत्रों को रखा गया है जो समुद्र के जल-स्तर से दस मीटर ऊपर हैं। ये ऐसे इलाके हैं जो समुद्री जल-स्तर में बढ़ोतरी होने से सबसे पहले डूबेंगे। इन इलाकों में शहरी तथा ग्रामीण आबादी बराबर अनुपात में रहती है और अगर समुद्र का जल-स्तर बढ़ा तो करीब छह हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र बाढ़ से घिर जाएगा। कुछ समय पहले क्लाइमेट सेंट्रल की ‘ग्लोबल सी लेवल राइज 2015’ रिपोर्ट के मुताबिक कार्बन उत्सर्जन की मौजूदा परिस्थितियों में भविष्य में कोई बदलाव न होने पर समुद्र का जल-स्तर इतना बढ़ जाएगा कि सैंतालीस करोड़ से छिहत्तर करोड़ लोगों के वासस्थल के बराबर जमीन डूब जाएगी। ऐसी स्थिति में मुंबई के करीब एक करोड़ लोग बेघर हो जाएंगे; उनके वासस्थल जलमग्न हो जाएंगे। कार्बन उत्सर्जन में कटौती के प्रस्तावित पेरिस में हुई वैश्विक जलवायु संधि के अंतरराष्ट्रीय लक्ष्य से तापमान में दो डिग्री सेल्सियस (3.6 डिग्री फारेनहाइट) की कमी लाने की स्थिति में खतरा तो कम हो जाएगा, फिर भी तेरह करोड़ लोगों के वासस्थलों के बराबर जमीन जलमग्न होने की आशंका बनी रहेगी। इस सदी में कार्बन उत्सर्जन से ये अनुमानित खतरे उत्पन्न हो सकते हैं लेकिन उससे जुड़े समुद्री जल-स्तर में चढ़ाव के लंबे समय यानी सदियों तक असर दिखने की संभावना है शोधकर्ताओं ने पाया है कि पिछले अ_ाईस सौ सालों के दौरान समुद्री जल-स्तर इतनी तेजी से नहीं चढ़ा जितनी तेजी से पिछली एक सदी के दौरान चढ़ा है। वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि इस सदी में समुद्री जल-स्तर अ_ाईस से चौंतीस सेंटीमीटर तक बढ़ सकता है। यह अध्ययन रिपोर्ट पिछले महीने नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज की कार्यवाही में प्रकाशित की गई है।

अनुसंधानकर्ताओं में शामिल प्रमुख लेखक तथा अर्थ ऐंड प्लेनेटरी साइंसेज के रटगर्स डिपार्टमेंट में एसोसिएट प्रोफेसर रॉबर्ट कोप, उनके सहयोगी कार्लिंग हे, एरिक मॉरो और हार्वर्ड विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जेरी मित्रोविका ने रिपोर्ट में कहा है कि वे पंचानबे फीसद सुनिश्चितता के साथ कह सकते हैं कि उनके द्वारा बीसवीं सदी में समुद्र जलस्तर में पाई गई पांच इंच से ज्यादा की बढ़ोतरी का कम से कम आधा भाग सीधे तौर पर ग्लोबल वार्मिंग के कारण वजूद में आया है। उन्होंने करीब तीन हजार वर्षों के दौरान दलदल, कोरल प्रवाल द्वीप तथा दुनिया भर के चौबीस क्षेत्रों में पुरातात्त्विक परिदृश्य रूपी भौगोलिक समुद्र जलस्तर संकेतों से एक नया डेटाबेस तैयार किया है। इस दौरान उन्होंने पिछले तीन सौ वर्षों के दौरान 66 ज्वार मापन रिकार्ड का भी इस्तेमाल किया।

अध्ययन के मुताबिक पिछली सदियों के दौरान समुद्र का जलस्तर कभी इतना नहीं बढ़ा जितना कि पिछली एक शताब्दी के दौरान बढ़ा है। वर्ष 1900 से 2000 (बीसवीं सदी) के बीच वैश्विक समुद्र जलस्तर (जीएसएल) करीब चौदह सेंटीमीटर या साढ़े पांच इंच बढ़ा है, यानी पिछली सत्ताईस सदियों में सबसे ज्यादा तेजी से। मानवजनित ग्लोबल वार्मिंग इसकी मुख्य वजह है। भारत की तटीय रेखा 7517 किलोमीटर लंबी है, जो गुजरात, महाराष्ट्र, गोवा, कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, ओडि़शा, पश्चिम बंगाल तथा केंद्रशासित प्रदेशों दमन एवं दीव और पुदुच्चेरी तथा बंगाल की खाड़ी में अंडमान निकोबार और अरब सागर में लक्षद्वीप को छूती है। भारत की यह लंबी तटीय रेखा कांदला, मुंबई, नवसेवा, मंगलूर, कोचीन, चेन्नई, तूतीकोरिन, विशाखापट्टनम तथा पारादीप जैसे अनेक महत्त्वपूर्ण बंदरगाहों को भी स्पर्श करती है।

अगर यही रुख जारी रहा तो केरल की शांत समुद्री रेखा और मुंबई जैसे अनेक पश्चिमी तथा पूर्वी तटीय इलाके जलवायु परिवर्तन के कारण समुद्री जलस्तर बढऩे के खतरे के और नजदीक पहुंच जाएंगे। इससे सिंचाई की जमीन तथा आसपास की बसावटों के साथ-साथ पूर्वी तट पर गंगा, कृष्णा,गोदावरी, कावेरी और महानदी के डेल्टा पर भी खतरा मंडरा सकता है। भारत के समुद्री इलाकों में इस तबाही की आहट शुरू हो चुकी है। दस हजार की आबादी वाला भारत का लोहाचार द्वीप 1996 में ही बर्बाद हो गया था। बीते पच्चीस वर्षों में बंगाल की खाड़ी में स्थित घोड़ामारा द्वीप नौ वर्ग किलोमीटर से घट कर 4.7 वर्ग किलोमीटर रह गया है। सुंदरवन खासतौर से बाढ़, तूफान, लवणता और कटाव की बढ़ती समस्याओं से प्रभावित रहा है। यहां पिछले तीस वर्षों में कटाव के चलते सात हजार लोगों को विस्थापन का दंश झेलना पड़ा है। घोरामारा द्वीप (सुंदरवन में सागर ब्लॉक का हिस्सा) आने वाले दशकों में पूरी तरह से जलमग्न हो जाएगा, असम में ब्रह्मपुत्र नदी के बीचोंबीच स्थित दुनिया का सबसे बड़ा नदी-द्वीप माजुली बाढ़ और भूमि कटाव के कारण खतरे में है। इसका क्षेत्रफल 1278 वर्ग किलोमीटर से घट कर केवल 557 वर्ग किलोमीटर रह गया है। इसके तेईस गांवों में तकरीबन डेढ़ लाख लोग रहते हैं।

समुद्र जलस्तर में बढ़ोतरी को लेकर उपजी चिंताओं ने पेरिस जलवायु समझौते जैसे अप्रत्याशित महत्त्वाकांक्षी करार के वजूद में आने में मदद की है। इस करार का उद्देश्य धरती के तापमान में 1.5 डिग्री सेल्सियस तक कमी लाने का है। पेरिस जलवायु करार में उल्लिखित प्रदूषणकारी तत्त्वों में कमी लाने के ताजा लक्ष्यों में कार्बन उत्सर्जन को उस स्तर तक कम करने की बात शामिल है जिससे ग्लोबल वार्मिंग को करीब तीन डिग्री सेल्सियस तक रखा जा सके। इससे समुद्र जलस्तर को छह मीटर तक बढऩे से रोका जा सकता है। जलस्तर में इतनी बढ़ोतरी भारत में रहने वाले 3 करोड़ 40 लाख लोगों के रिहाइश वाले क्षेत्र को डुबोने के लिए काफी है। साथ ही, ग्लोबल वार्मिंग को दो डिग्री सेल्सियस तक सीमित करने से जलमग्न होने की मुसीबत से राहत पाने वाले लोगों की संख्या बढ़ कर तेरह करोड़ हो सकती है।

चीन तटीय जोखिमों के मामले में भी सबसे आगे है, जहां साढ़े चौदह करोड़ लोगों पर खतरा मंडरा रहा है।
-सीमा जावेद