गौ हत्या करके केप्सूल बनाये जाते हैं ...

  • 2016-02-28 11:15:11.0
  • अमन आर्य
गौ हत्या करके केप्सूल बनाये जाते हैं ...

मित्रो! आयुर्वेद को छोड़ कर जितनी भी चिकित्सा पद्धतियां है उनमे बनने वाली ओषधियों में बहुत अधिक मांसाहार का प्रयोग होता है आप जितनी भी एलोपैथी ओषधियाँ लेते हैं उनमें जो कैप्सूल होते है वे सब के सब मांसाहारी होते हैं ।
दरअसल कैप्सूल के ऊपर जो कवर होता है उसके अंदर औषधि भरी जाती है वह कवर प्लास्टिक का नहीं होता आपको देखने में जरूर लगेगा कि ये प्लास्टिक है लेकिन वह प्लास्टिक का नहीं है, क्योंकि अगर ये प्लास्टिक का होगा तो आप उसको खाओगे तो अंदर जाकर घुलेगा ही नहीं, क्योंकि प्लास्टिक 400 वर्ष तक घुलता नहीं है वो कैप्सूल ऐसे का ऐसे सुबह टॉइलेट के रास्ते बाहर आ जाएगा। तो मित्रो ये जो कैप्सूल के खाली कवर जिस कैमिकल से बनाये जाते है उसका नाम है-जिलेटिन। जिलेटिन से ये सब के सब कैप्सूल के कवर बनाये जाते है, और जिलेटिन के बारे में आप सब जानते है और बहुत बार आपने मेनका गांधी के मुंह से भी सुना होगा कि जब गाय के बछड़े या गाय को कत्ल किया जाता है उसके बाद उसके पेट की बड़ी आंत से जिलेटिन बनाई जाती है तो ये सब के सब कैप्सूल मांसाहारी होते हैं ।
ऐसी दर्दनाक बातों को सुनकर आपका मन जरूर ही पीड़ा से कराह उठा होगा, परंतु जो लिखा जा रहा है, यह पूर्णत: सत्य है। दुख इस बात का है कि हमारी सरकारों को इन सब तथ्यों की जानकारी है परंतु सब कुछ पता होते हुए भी चाहे किसी प्रदेश की सरकार हो चाहे देश की सरकार हो, इस पर कोई भी ठोस कार्यवाही करने का समय किसी के पास नही है।
मित्रो! आपने एक और बात पर ध्यान दिया होगा कि 90 प्रतिशत एलोपेथी औषधियों पर कोई हरा या लाल निशान नहीं होता । कारण एक ही है इन औषधियों में बहुत अधिक मांसाहार का उपयोग होता है, और कुछ दिन पहले कोर्ट ने कहा था कि औषधियों पर हरा या लाल निशान अनिवार्य होना चाहिए और ये सारी बड़ी एलोपेथी कंपनियाँ अपनी छाती कूटने लग गई थीं। क्योंकि ऐसा करने से उनकी पोल खुलने का डर था।
मित्रो! कैप्सूल के अतिरिक्त एलोपेथी मे गोलियां होती हैं, उनमें से कुछ गोलियां ऐसी होती है कि जिनको आप अपने हाथ पर रगड़ेंगे तो उसमें से पाउडर निकलेगा और आपका हाथ सफ़ेद हो जाएगा, पीला हो जाएगा, यहां तक तो ठीक है, लेकिन कुछ गोलियां ऐसी होती है जिनको हाथ पर घसीटने से कुछ नहीं होता उन सबके ऊपर भी जिलेटिन का कोटिंग किया होता है वो भी कैप्सूल जैसा है। वो भी सब मांस से निर्मित है।
थोड़ी सी कुछ गोलियां ऐसी है जिन पर जिलेटिन का कोटिंग नहीं होता ,लेकिन वो गोलियां इतनी खतरनाक हैं कि आपको कैंसर, शुगर, जैसे 100 रोग कर सकती हैं जैसे एक दवा है पैरासिटामोल इस पर जिलेटिन का कोटिंग नहीं है ,लेकिन ज्यादा प्रयोग किया तो ब्रेन हैमरेज हो जाएगा । ऐसे ही एक सिरदर्द की दवा है उस पर भी जिलेटिन का कोटिंग नहीं ज्यादा प्रयोग किया तो लीवर खराब हो जाएगा , ऐसे ही हार्ट के रोगियों को एक दवा दी जाती है उसमें भी कोटिंग नहीं होता लेकिन उसको ज्यादा खाओ तो किडनी खराब हो जाएगी।
हमें चाहिए कि जिन दवाईयों के ऊपर कोटिंग नहीं है वे सारी की सारी जहर मानकर खरीदी ही न जाएं, जिनके ऊपर कोटिंग है वो दवा मांसाहारी है, तो अब प्रश्न उठता है तो हम खाएं क्या ?
मित्रो! रास्ता एक ही आप अपनी चिकित्सा स्वयं करो अर्थात आपको पुन: आयुर्वेद की ओर लौटना पड़ेगा।
हमें सावधान होकर सोचना होगा कि हमारे देश में गऊ हत्या करने का आखिर वास्तविक उद्देश्य क्या है? मित्रो! दरअसल हमारे देश में गौ ह्त्या मात्र मांस के लिए नहीं की जाती है इसके अतिरिक्त जो खून निकलता है,जो हड्डियों का चूरा होता है ,जो चर्बी से तेल निकलता है ,बड़ी आंत से जिलेटिन निकलती है ,चमड़ा निकलता है इन सब का प्रयोग कोसमेटिक (सौन्दर्य उत्पाद), टूथपेस्ट, नेलपालिश,लिपस्टिक खाने पीने की चीजें, एलोपेथी दवाइयाँ, जूते, बैग आदि बनाने में प्रयोग किया जाता है, जिसे हम सब लोग अपने दैनिक जीवन में बहुत बार प्रयोग में लाते हैं।
ऐसी परिस्थितियों में गौ रक्षा की बात करने से पूर्व हम सबको उन सब वस्तुओं का त्याग करना चाहिए जिनके कारण जीव हत्या होती है , दैनिक जीवन मे प्रयोग होने वाली वस्तुओं की पहले अच्छे से परख करनी चाहिए फिर प्रयोग में लाना चाहिए। (साभार)