गंगोत्पत्ति दिवस है गंगा सप्तमी

  • 2016-05-13 10:30:46.0
  • अशोक “प्रवृद्ध”

गंगोत्पत्ति दिवस है गंगा सप्तमी

मानव जीवन ही नहीं, वरन मानवीय चेतना को भी प्रवाहित करने वाली भारतवर्ष की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण नदी राष्ट्र-नदी गंगा निरन्तर गतिशीला और श्रम का प्रतीक है और अनवरत श्रमशीला बनी रहकर सभी को अथक, अविरल श्रम करने का संदेश देती है। इसीलिए गंगा को जीवन तत्त्व और जीवन प्रदायिनी कहा गया है तथा माता मानकर देवी के समान भारतीय समाज के मानवीय चेतना में पूजी जाती है। गंगा मनुष्य मात्र में कोई भेद नहीं करती इसीलिए गंगा के के महत्व को आर्य-अनार्य, वैष्णव-शैव, साहित्यकार-वैज्ञानिक सबों ने एकस्वर से स्वीकार किया है। गंगा सब मनुष्य को एक सूत्र में पिरोती है और एक सूत्र में बाँधे रखने का संकल्प प्रदान करती है। लोक आस्था के अनुसार जीवन में एक बार भी गंगा में स्नान न कर पाना जीवन की अपूर्णता का द्योतक है। इसलिए सम्पूर्ण भारत में गंगा नदी पवित्र और पूजनीय मानी जाती है।भारतीय पुरातन ग्रन्थ इस सत्य का सत्यापन करते हैं कि गंगा सिर्फ भारतवर्ष की भूमि ही नहीं अपितु आकाश, पाताल और इस पृथ्वी को मिलाती है और मन्दाकिनी, भोगावती और और भागीरथी की संज्ञा को सुशोभित करती है। मान्यता है कि गंगा ऐसी नदी है, जो तीनों लोकों देवलोक, मृत्युलोक और पाताल लोक को अपने पवित्र जल से तृप्त करती है। इसलिए इसे तृप्त गंगा भी कहते हैं। इसके साथ ही गंगा पाताल लोक में भोगवती और पितृलोक में वैतरणी के रुप में जानी जाती है। नारद पुराण के अनुसार गंगा कृष्ण पक्ष के छठे दिन से लेकर अमावस्या तक पृथ्वी पर, शुक्ल पक्ष के पहले दिन से दसवें दिन तक पाताल लोक या रसातल में और शुक्ल पक्ष के ग्यारहवें दिन से लेकर पूर्णिमा और कृष्ण पक्ष के पांचवे दिन तक वह स्वर्ग में वास करती है।

भारत की राष्ट्र-नदी गंगा की भारतीय सभ्यता-संस्कृति में अत्यधिक महता होने के कारण ही ऋग्वेद, महभारत और रामायण तथा अनेक पुराणों में पुण्य सलिला, पाप-नाशिनी, मोक्ष प्रदायिनी, सरित्श्रेष्ठा एवं महानदी कहा गया है।ऋग्वेद में चालीस नदियों तथा हिमालय (हिमवंत) त्रिकोता पर्वत, मूंजवत (हिंदु-कुश पर्वत) का उल्लेख है। आदिग्रंथ ऋग्वेद में स्पष्ट रूप से गंगा नदी का उल्लेख एक बार और यमुना का तीन बार हुआ है। प्राचीनतम् और पवित्रतम् ऋगवेद में गंगा का उल्लेख ऋग्वेद के नदी सूक्त जिसे नादिस्तुति भी कहते हैं,में हुआ है। ॠग्वेद 10/75 में पूर्व से पश्चिम को प्रवाहित होने वाली नदियों का वर्णन अंकित है,जिसमें स्पष्ट रूप से गंगा का उल्लेख हुआ है। ऋगवेद 6/45/31 में भी गंगा का उल्लेख तो मिलता है लेकिन यह स्पष्ट नहीं है कि यह गंगा  नदी के सन्दर्भ में यह उल्लेख है। ऋगवेद 3/58/6 कहताहै कि, हे वीरो तुम्हारा प्राचीन गृह, तुम्हारी भाग्याशाली मित्रता, तुम्हारी सम्पत्ति जावी के तट पर है। ऋगवेद 1/116/18-19 साथ ही कुछ अन्य श्लोक में भी जाह्नवी और गंगोत्री डालफिन का उल्लेख मिलता है।वैदिक ग्रन्थों के अध्ययन से इस सत्य का सत्यापन होता है कि ऋग्वेद में सिन्धु और सरस्वती प्रमुख नदियां थी, किन्तु बाद के तीन वेदों यथा यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद में गंगा को अधिक महत्व दिया गया है।इनके साथ ही शतपथ ब्राह्मण, पंचविश ब्राह्मण, गौपथ ब्राह्मण, ऐतरेय आरण्यक, कौशितकी आरण्यक, सांख्यायन आरण्यक, वाजसनेयी संहिता और महाभारत में गंगा सम्बन्धी विवरण अंकित हैं ।

पौराणिक ग्रंथों के अनुसार देवी गंगा का अस्तित्व केवल स्वर्ग में ही माना गया है। तब भगीरथ गंगा की पूजा-तपस्या करके उसे पृथ्वी पर लाये। इसी कारण गंगा को भागीरथी भी कहा जाता है। महाभारत में भी यह कथा अंकित है, परन्तु महाभारत में गंगा प्रमुख चरित्र है और वह महाराजा शान्तनु की पत्नी और भीष्म की माँ है।गंगा नदी के साथ अन्य अनेक पौराणिक कथाएँ भी जुड़ी हुई हैं। एक पौराणिक कथा के अनुसार ब्रह्मा ने विष्णु के पैर के पसीने की बूँदों से गंगा का निर्माण किया। त्रिमूर्ति के दो सदस्यों के स्पर्श के कारण यह पवित्र समझा गया। एक अन्य कथा के अनुसार राजा सगर के साठ हजार मृत पुत्रों के उद्धार के लिए के लिए सागर के वंशज भागीरथ के प्रयत्न से गंगा का धरती पर अवतरण हुआ। इस पौराणिक कथा के अनुसार जब कपिल मुनि के श्राप से सूर्यवंशी राजा सगर के साठ हज़ार पुत्र जल कर भस्म हो गए, तब उनके उद्धार के लिए राजा सगर के पुत्र अंशुमान ने असफल प्रयास किया और बाद में यह प्रयास अंशुमान के पुत्र दिलीप ने भी किया। इस पर दिलीप की दूसरी पत्नी से उत्पन्न पुत्र भगीरथ ने अपने पूर्वजों के उद्धार के लिए गंगा को पृथ्वी पर लाने का प्रण किया जिससे मृत्योपरान्त ढेर के रूप में पड़े पूर्वजों के शव को अंतिम संस्कार कर, उनके राख को गंगाजल में प्रवाहित कर उनको  मुक्ति दिलायी जा सके। भगीरथ ने ब्रह्मा की घोर तपस्या की और ब्रह्मा को प्रसन्न कर गंगा को पृथ्वी पर भेजने के लिये तैयार कर लिया। गंगा को पृथ्वी पर जाने और तत्पश्चात सगर के पत्रों के उद्धार हेतु पाताललोक में जाने का आदेश ब्रह्मा के द्वारा दिए जाने पर गंगा ने कहा कि इतनी ऊँचाई से गिरने पर मेरी वेग को पृथ्वी कैसे सह पाएगी? इस पर भगीरथ ने भगवान शिव से गंगा के प्रवाह के वेग को रोक लेने का निवेदन किया और शिव ने अपनी खुली जटाओं में गंगा के वेग को रोक कर रख लिया। यह घटना गंगा के पृथ्वी पर अवतरण के पूर्व अर्थात गंगावतरण दिवस ज्येष्ठ शुक्ल दशमी के पूर्व बैशाख शुक्ल सप्तमी की है। इसीलिए वैशाख शुक्ल पक्ष की सप्तमी को गंगा सप्तमी कहा जाता है। पौराणिक धर्म ग्रंथों के अनुसार वैशाख मास की इस तिथि को ही गंगा स्वर्ग लोक से भगवान शिव की जटाओं में पहुँची थीं। इसलिए इस दिन को गंगा सप्तमी के रूप में मनाया जाता है। पौराणिक मान्यता के अनुसार जिस दिन गंगा जी की उत्पत्ति हुई, वह बैशाख शुक्ल सप्तमी का दिन था , जिसे  गंगा जयंतीके नाम से जाना जाता है और जिस दिन गंगाजी पृथ्वी पर अवतरित हुईं, वह ज्येष्ठ शुक्ल दशमी का दिन गंगा दशहराके नाम से जाना जाता है। इस दिन माँ गंगा का पूजन किया जाता है। गंगा सप्तमी के अवसर पर गंगा में डुबकी लगाने से मनुष्य के सभी पाप धुल जाते हैं और मनुष्य को मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस पर्व पर  गंगा मंदिरों सहित अन्य मंदिरों पर भी विशेष पूजा-अर्चना और दान - पुण्य की जाती है। कहा जाता है कि गंगा नदी में स्नान करने से दस पापों का हरण होकर अंत में मुक्ति मिलती है। कुछ स्थानों पर इस तिथि को गंगा जन्मोत्सवके नाम से भी पुकारा जाता है। गंगा के शिव के जटा में ही फंस कर रह जाने से अत्यंत चिंतित भगीरथ ने शिव से गंगा को मुक्त कर देने के लिए प्रार्थना की। इस पर शिव ने अपनी जटा कीएक लट खोल दी, जिससे गंगा की अविरल धारा पृथ्वी पर प्रवाहित हुई। वह धारा भगीरथ के पीछे-पीछे गंगा सागर संगम तक गई, जहाँ सगर-पुत्रों का उद्धार हुआ। गंगा के स्पर्श से ही सगर के साठहज़ार पुत्रों का उद्धार होने के कारण ही गंगा को मोक्षदायिनीभी कहा जाता है। शिव के स्पर्श से गंगा और भी पावन हो गयी और पृथ्वी वासियों के लिये बहुत ही श्रद्धा का केन्द्र बन गयीं। पुराणों के अनुसार स्वर्ग में गंगा को मन्दाकिनी और पाताल में भागीरथी कहते हैं।

धार्मिक अवधारणाओं में देवी के रूप में निरुपित गंगा नदी के किनारे वाराणसी और हरिद्वार के साथ ही बहुत से पवित्र तीर्थस्थल बसे हुये हैं। मन्दिरों के शहर के रूप में प्रसिद्ध और गंगा के साथ निकट सम्बन्ध रखने वाले प्राचीन नगर वाराणसी में गंगा के किनारे-किनारे बसे इस शहर में अनेक मन्दिर स्थापित हैं। लोक मान्यतानुसार गंगा में स्नान करने से पापों से मुक्ति होती है तथा मनुष्य मोक्ष प्राप्त करता है। कतिपय अवसरों पर तो इसमें स्नान की महता और बढ़ जाती है।